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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

चतुर्थ अध्याय

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चतुर्थ अध्याय
ऋणं देयमदेयं च येन यत्र यथा च यत्।
दानग्रहणधर्माभ्यामृणादानमिति स्मृतम्॥ 1 ॥
धर्मशास्त्र में विवेचनीय विषयों के अन्तर्गत सुप्रसिद्ध - ऋण के लेन-देन की
प्रक्रिया-स्थान, समय, निर्धारित अवधि, ब्याज, लिखा-पढ़ी, साक्ष्य तथा शर्तों
आदि का, अर्थात् ऋणदान सम्बन्धी क़ानून का वर्णन इस प्रकरण में किया जा रहा
है।
टिप्पणी - यहां ऋण शब्द रूढ़ अर्थ लिये हुए है। जब व्यक्ति अपनी किसी
आवश्यकता की पूर्ति अपने साधनों से करने में असमर्थ होता है और वह आवश्यकता
इस प्रकार से अपरिहार्य-अनिवार्य होती है कि उसे टाला नहीं जा सकता, और
ऐसी स्थिति में जब किसी दूसरे व्यक्ति से प्रत्यावर्तनीय सहायता ली जाती है, तो
वह सहायता 'ऋण' कहलाती है। ऐसी सहायता मौखिक, लिखित, अनुबन्धित
तथा प्रतिबन्धित रूप से ब्याज पर अथवा बिना ब्याज के एक निश्चित अवधि तक
के लिए ली जाती है। यही ऋण के लेन-देन के विवेच्य विषय हैं और यह प्रकरण
इन्हीं के वर्णन से सम्बन्धित है।
पित्र्युपरते पुत्रा ऋणं दद्युर्यथांशतः।
विभक्ता अविभक्ता वा यो वा तामुद्धरेद्धुरम्॥ 2 ॥
पिता के परलोकगामी हो जाने पर उसके द्वारा लिये गये ऋण को उसके
सभी विभक्त अथवा अविभक्त पुत्रों द्वारा समान रूप से चुकता करना होता है;
क्योंकि सभी पुत्रों पर परिवार का समान दायित्व होता है, अतः ऋण का परिशोधन
भी सब का समान दायित्व है।
अपने जीवनकाल में लिये गये ऋण के भुगतान का दायित्व तो पिता का होता
है, परन्तु उसकी मृत्यु के उपरान्त यह दायित्व पुत्रों का हो जाता है। यदि सभी पुत्र
संयुक्त परिवार के रूप में रहते हैं, तो संयुक्त खाते से ऋण का भुगतान करना होता
है और यदि भाई अलग हो गये हैं, तो उन्हें अपने-अपने भाग का भुगतान करना
चाहिए। इस सम्बन्ध में स्मृतिकार की एक अन्य व्यवस्था यह है कि जो परिवार के
दायित्व को संभाले, अर्थात् पिता का उत्तराधिकारी बने, वही ऋण का भुगतान भी
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करे। उदाहरणार्थ, यदि पिता की मृत्यु के उपरान्त ज्येष्ठ पुत्र पिता का उत्तराधिकारी
बनता है, तो ऋण चुकाने का दायित्व भी उसी का बनता है और यदि वह किसी
असाध्य रोग से ग्रस्त है, विदेश में रहता है अथवा अन्य किसी कारण से अयोग्य
अथवा असमर्थ है और इस दायित्व को द्वितीय अथवा तृतीय स्थानीय पुत्र संभालता
है, तो पिता के ऋण का भुगतान उसे ही करना होता है।
अभिप्राय यह है कि अधमर्ण की मृत्यु के उपरान्त उत्तमर्ण को चिन्ता नहीं
करनी होती। वह अपने ऋण की वसूली अधमर्ण के पुत्रों से कर सकता है। पुत्र
अपने पिता के ऋण के भुगतान के लिए बाध्य हैं।
पितृव्येणाविभक्तेन भ्रात्रा वा यहृणं कृतम्।
मात्रा वा यत् कुटुम्बार्थे दद्युस्तद्रिक्थिनोऽखिलम् ॥ ३ ॥
संयुक्त परिवार के सदस्य के रूप में चाचा (पिता के भाई), भाई अथवा
माता द्वारा परिवार की किसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए लिये गये ऋण का
भुगतान परिवार की सम्पत्ति के सभी अंशभागियों के विभक्त होने पर उन्हें अनिवार्यतः
करना होता है।
अविभक्त (संयुक्त रूप से) रहने वाले भाइयों को साझा खाते से तथा विभक्त
भाइयों को अपने-अपने अंश के बराबर ऋण का भुगतान करना होता है।
क्रमाद्व्याहतं प्राप्तं पुत्रैर्ऋणमुद्धृतम्।
दद्युः पैतामहं पौत्रास्तच्चतुर्थान्निवर्तते ॥ ४ ॥
पितामह द्वारा लिये गये ऋण का भुगतान सर्वप्रथम तो सम्बद्ध व्यक्ति को
अपने जीवनकाल में ही करना चाहिए, परन्तु यदि असामान्य परिस्थितियों के
कारण वह ऐसा नहीं कर पाता, तो यह दायित्व उसके पुत्र को निभाना चाहिए। पुत्र
द्वारा ऋण को चुकता न कर पाने की स्थिति में यह दायित्व पोते पर आ पड़ता है।
उसे परिवार के भरण-पोषण के लिए पितामह द्वारा लिये ऋण का भुगतान करना
चाहिए। पोते द्वारा अपने जीवनकाल में दादा पर चढ़े ऋण का भुगतान न किये जाने
पर उत्तमर्ण प्रपौत्र-पोते के पुत्र-से ऋण वसूली का तकाज़ा नहीं कर सकता।
तीन पीढ़ियों-दादा, उसका पुत्र और उसका पौत्र-तक न वसूल किये गये ऋण
को बट्टे खाते में गया समझना चाहिए।
टिप्पणी-विष्णुस्मृतिकार ऋण की देनदारी चार पीढ़ियों तक मानते हैं;
क्योंकि उनके अनुसार पिता, पितामह और प्रपितामह को पिण्डदान तथा तर्पण
आदि किया जाता है। अतः प्रपौत्र तक पिता, दादा और परदादा के ऋण को उतारना
उचित है-मन्मते तु त्रयाणामुदकं कार्यं त्रिषु पिण्डः प्रवर्त्तते इति न्यायेन
पितृपितामहप्रपितामहेभ्यः पिण्डं दद्यात्, दद्यात् पिण्डं हरेद्धनमिति न्यायेन च
तेषां धनं प्राप्नुयात् अतः तत्कृतं ऋणं शोधयितुमर्हेदिति सिद्धम्।
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इच्छन्ति पितरः पुत्रान् स्वार्थहेतोर्यतस्ततः ।
उत्तमर्णाधमर्णेभ्यो मामयं मोचयिष्यति ॥ ५॥
यास्काचार्य ने अपने 'निरुक्त' ग्रन्थ में पुत्र शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार से
की है—'पु नाम नरकः ततः त्रायते इति पुत्रः।' नरक का अर्थ है- नरकं न्यरकं
नीचैर्गमनम्। इस प्रकार अपने पिता, पितामह को अधोगति, पतन, अर्थात् दुःख,
कष्ट, संकट तथा बाधा आदि से निवृत्ति दिलाने वाला ही पुत्र कहलाने का अधिकारी
है। ऋण भी तो एक प्रकार का कष्ट और संकट है। यूं तो शास्त्रकार ऋणकर्ता पिता
को पुत्र का शत्रु बताने के रूप में ऋण न लेने का पक्ष लेते हैं। निस्सन्देह ऋण न
लेना आदर्श स्थिति है, परन्तु प्रायः परिस्थितियों—सम्पत्ति, विशेषतः आवास खरीदना,
पुत्री का विवाह निपटाना अथवा परिवार के किसी सदस्य के रोग का उपचार
अथवा झंझट से निवृत्ति आदि—की विवशता से ऋण लेना ही पड़ जाता है। पिता,
दादा की इस विवशता में उनका साथ देना पुत्र-पौत्र आदि का कर्तव्य-कर्म हो
जाता है। इसी सन्दर्भ में नारदजी का कथन है—
पितरों की पुत्र-प्राप्ति की उत्कट इच्छा का एक कारण जहां पिण्डदान और
तर्पण आदि द्वारा अपने उद्धार की व्यवस्था करना है, वहां एक अन्य कारण उनका
स्वार्थ—साहूकार से लिये ऋण से उन्हें मुक्त करना—भी है। शास्त्र की मान्यता के
अनुसार अधमर्ण जब तक उत्तमर्ण के ऋण का भुगतान नहीं करता, तब तक उसका
उद्धार नहीं हो पाता। इसका अर्थ है—अपने जीवनकाल में ऋण का भुगतान न कर
सकने अथवा न करने वाले का भटकते रहना अथवा भूत-प्रेत आदि योनि प्राप्त
करना। पुत्र-पौत्र आदि द्वारा स्वयं के द्वारा न लिये अथवा स्वयं के लिए अज्ञात,
परन्तु लिखित प्रमाण से सत्यभूत पिता, पितामह आदि के ऋण को चुकता करने पर
उनकी मुक्ति होती है—इस सम्भावना एवं आशा से प्रेरित होकर ही पूर्वज पुत्र-
लाभ की कामना करते हैं। अतः पूर्वजों की इस आशा एवं अपेक्षा की पूर्ति करना
पुत्र-पौत्रादि का धर्म एवं कर्तव्य-कर्म है। इसी से उनके पुत्र-पौत्रत्व की सार्थकता है।
टिप्पणी-स्मृतिचन्द्रिकाकार के अनुसार—'जायमानो वै ब्राह्मणस्त्रिभिः ऋणवान्
जायते।' उत्पन्न होने वाले प्रत्येक बालक को तीन-देव, आचार्य और पितृ-
ऋणों से मुक्त होना होता है। सन्तानोत्पत्ति के अतिरिक्त पितरों का उद्धार भी पितृ-
ऋण से मुक्त होना है।
पूजनीयास्त्रयोऽतीता उपजीव्यास्त्रयोऽग्रतः ।
एतत्पुरुषसन्तानमृणयोः स्याच्चतुर्थके ॥ ६ ॥
पिछली तीन पीढ़ियों के पूर्वज—पिता, पितामह तथा प्रपितामह—पूजनीय हैं
और अगली तीन पीढ़ियों के सम्बन्धी—पुत्र, पौत्र तथा प्रपौत्र—सहायता पाने के
अधिकारी हैं। मध्य के चतुर्थ व्यक्ति को पूर्वजों का अर्चन-पूजन करना है तथा
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परिजनों का पालन-पोषण करना है। इस प्रकार दोनों वर्गों-पूर्ववर्ग तथा परवर्ग-
की सेवा-शुश्रूषा से ही ऋणमुक्त होना है; क्योंकि ये एक ही कुल के भीतर आते हैं
और पिण्ड लेने के अधिकारी हैं।
याच्यमानं न दीयेत ऋणं वापि प्रतिग्रहः।
तद्धनं वर्धते तावद्यावत्कोटिशतं भवेत् ॥ ७॥
ऋणदाता द्वारा ऋणकर्ताओं से अपने ऋण की मांग किये जाने पर तथा धरोहर
के स्वामी द्वारा धरोहर रखने वाले से अपनी धरोहर की वापसी की मांग किये जाने
पर आनाकानी अथवा टाल-मटोल करने पर सम्बद्ध व्यक्ति पर देय पदार्थ का भार
सौ गुना बढ़ जाता है, अर्थात् सौ रुपया दस हज़ार बन जाता है।
टिप्पणी—स्मृतिचन्द्रिकाकार के अनुसार-सौ गुना बढ़ने का अर्थ न चुकाने
की निन्दा करना है और ऋण के परिशोधन की आवश्यकता पर बल देना है।
'मन्मते तु तद्धनं वर्धते इति ऋणवृद्धिसूचनया निन्दार्थवादेन ऋणस्यावश्य
परिशोध्यत्वमिति।'
कोटिशते तु सम्पूर्णे जायते तस्य वेश्मनि।
ऋणसंशोधनार्थाय दासो जन्मनि जन्मनि ॥ ८॥
मांगने पर न चुकाये गये ऋण का ब्याज बढ़ते-बढ़ते जब मूल-धन सौ
करोड़ की राशि का हो जाता है, तो उस धन (ऋण) को चुकता करने के लिए
अधमर्ण व्यक्ति उत्तमर्ण के घर में दास (अश्व, गर्दभ अथवा शूद्र आदि के रूप में)
बनकर उत्पन्न होता है। जब तक ऋण का पूरा भुगतान नहीं हो जाता, तब तक उसे
सेवा-कार्य के लिए उसके घर विविध योनियों में जन्मते-मरते रहना पड़ता है।
तपस्वी चाग्निहोत्री च ऋणवान् म्रियते यदि ।
तपश्चैवाग्निहोत्रं च सर्वं तद्धनिनां धनम् ॥ ९॥
अग्निहोत्री-यज्ञ-यागादि सम्पन्न करने वाला अथवा तपस्वी के ऋण का
परिशोधन किये बिना ही प्राण त्याग देने पर उसके पुण्य कर्मों—यज्ञ-यागादि तथा
तपस्या आदि-का फल स्वयं उसे न मिल कर उत्तमर्ण (धनदाता) को चला जाता
है।
न पुत्रर्णं पिता दद्याद्दद्यात् पुत्रस्तु पैतृकम् ।
कामक्रोधसुराद्यूतप्रातिभाव्यकृतं विना ॥ १० ॥
निम्नोक्त पांच व्यसनों के लिए पिता अथवा पुत्र द्वारा लिये ऋण के भुगतान
का दायित्व पुत्र अथवा पिता पर नहीं होता। पिता के दुर्व्यसनों के कारण पुत्र को
और पुत्र के दुर्व्यसनों के कारण उसके पुत्र को संकट में डालना कदापि उचित
नहीं-(1) कामवासना की तृप्ति के लिए वेश्यागमन अथवा परदारागमन अथवा
किसी की बहू-बेटी का अपहरण अथवा किसी की बहू बेटी की सहमति से
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उसके साथ स्वच्छन्द विहार अथवा बलात्कार ! (2) क्रोध के कारण किसी का
सिर-फोड़ देना, किसी की हत्या कर देना, दंगा-फ़साद करना, किसी सम्मानित
व्यक्ति का अपमान करना, किसी की सम्पत्ति पर अनुचित रूप से अधिकार करना
आदि। इन सबके कारण पुलिस, न्यायालय के निरन्तर चक्कर काटते रहने को
विवश होना। (3) मदिरा-पान का आदी हो जाना, (4) द्यूत-क्रीड़ा की लत का
लग जाना तथा (5) किसी मित्र, सम्बन्धी का ज़ामिन (उसके द्वारा न चुकाये जाने
वाले) ऋण को स्वयं चुकाने का दायित्व (जिम्मा लेना) बनकर उसे ऋण दिलाना
और फिर उसके द्वारा न चुका पाने अथवा न चुका सकने की स्थिति में उसके ऋण
को चुकता करने के लिए स्वयं को ऋणजाल में फंसाना।
इन पांचों आवश्यकताओं का परिवार के भरण-पोषण से अथवा परिवार के
हित-संरक्षण से कोई सम्बन्ध नहीं। अतः परिवार के किसी भी सदस्य द्वारा लिया
गया ऋण उसका निजी मामला होता है। परिवार के दूसरे सदस्यों का उससे कुछ
लेना-देना नहीं होता।
पितुरेव नियोगाद्यः कुटुम्बभरणाय वा।
ऋणं वा यत्कृतं कृच्छ्रे दद्यात् पुत्रस्य तत्पिता ॥ 11 ॥
निम्नोक्त परिस्थितियों में पुत्र द्वारा उत्तमर्ण से लिये धन का पिता को भुगतान
करना चाहिए—(1) स्वयं पिता की आज्ञा, अनुमति, सहमति से लिया गया ऋण,
(2) पिता की जानकारी अथवा अजानकारी में परिवार के भरण-पोषण के लिए
लिया गया ऋण तथा (3) परिवारजनों के किसी कष्ट, संकट आदि में ग्रस्त हो जाने
पर निष्कृति के लिए उठाया गया ऋण।
परिवार की आवश्यकता की पूर्ति के लिए लिये गये ऋण और उसी प्रयोजन
पर खर्च किये गये धन के औचित्य-अनौचित्य के झंझट में व व्यय के ढंग आदि
के विवाद में न पड़कर ऋण को लौटाने का दायित्व लेना चाहिए।
शिष्यान्तेवासिदासस्त्री वैयावृत्त्यकरैश्च यत्।
कुटुम्बहेतोःक्षिप्तं दातव्यं तत्कुटुम्बिना ॥ 12 ॥
परिवार के मुखिया की अनुमति, सहमति तथा जानकारी में अथवा इन सब
के अभाव में परिवार की किसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए निम्नोक्तों—
(1) शिष्य, (2) अन्तेवासी (गुरुकुल में रहने वाला, आज की भाषा में छात्रावास
या होस्टल में रहने वाला), (3) घर में उत्पन्न अथवा क्रीत दास, (4) माता,
बहिन, पुत्री अथवा पत्नी, भाभी आदि निकट सम्बन्ध की स्त्री तथा (5) व्यापार
करने की प्रवृत्ति वाले किसी सदस्य—द्वारा लिये गये ऋण का भुगतान परिवार के
मुखिया को करना ही चाहिए।
ग्राहको यदि नष्टः स्यात् कुटुम्बे च कृतो व्ययः।
दातव्यं ज्ञातिभिस्तस्य विभक्तैरपि तदृणम् ॥ 13 ॥
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कुटुम्ब की आवश्यकता के लिए ऋण लेने वाले व्यक्ति के मर जाने पर
अथवा विदेश चले जाने पर अथवा किसी रोगादि के कारण अथवा व्यापार आदि
में घाटा आ जाने के कारण असमर्थ असहाय हो जाने पर अविभक्त अथवा विभक्त
हो गये जाति बन्धुओं—सगे भाइयों अथवा चचेरे भाइयों—को उत्तमर्ण को उसके
धन का भुगतान करना ही होता है।
अभिप्राय यह है कि परिवार की पैतृक सम्पत्ति के उत्तराधिकारियों पर देय
ऋण आदि को चुकाने का दायित्व है।
यहां यह उल्लेखनीय है कि उत्तराधिकार में भले ही कुछ न मिला हो, फिर
भी ऋण के भुगतान का दायित्व उत्तराधिकारियों का ही होता है; क्योंकि यदि
सम्पत्ति होती, तो उस पर उनका ही अधिकार होता। यदि नहीं है, तो उनका भाग्य।
इस 'नहीं' के कारण वे अपने दायित्व से मुक्त नहीं हो सकते।
नार्वाक् संवत्सराद् विंशात् पितरि प्रेषिते सुतः।
ऋणं दद्यात् पितृव्ये वा ज्येष्ठे भ्रातर्यथापि वा॥ 14॥
पिता, चाचा तथा ज्येष्ठ भ्राता द्वारा ऋण लेने के उपरान्त विदेश चले जाने पर
अथवा अपहृत हो जाने पर अथवा गिरफ़्तारी आदि से बचने आदि किसी कारणवश
छिप जाने पर, बीस वर्षों के बीतने के उपरान्त, अर्थात् बीस वर्षों तक उनका पता
न लगने के बाद ही पुत्र पर उस ऋण के भुगतान का दायित्व आता है।
अभिप्राय यह है कि बीस वर्षों तक ऋणदाता अपने ऋण की वसूली के लिए
ऋणकर्ता के पुत्र पर दबाव नहीं डाल सकता। हां, बीस वर्षों की प्रतीक्षा के उपरान्त
भी ऋणकर्ता की खोज-ख़बर न मिलने पर पिता, चाचा और ज्येष्ठ भ्राता द्वारा
पारिवारिक आवश्यकता के लिए उठाये गये ऋण की मांग उनके पुत्र से की जा
सकती है।
दाप्यः परर्णमेकोऽपि जीवत्स्ववियुतैः कृतम्।
प्रेतेषु न तु तत्पुत्रः परर्णं दातुमर्हति ॥ 15 ॥
अविभक्त अथवा संयुक्त परिवार में ऋण लेने के उपरान्त संयोगवश एक
एक करके, अनेक अथवा सभी असम्बद्ध व्यक्तियों के मृत्युग्रस्त हो जाने पर
अवशिष्ट जीवित व्यक्ति को समूचे ऋण का परिशोधन करना पड़ता है। हां, ऋण का
भुगतान किये बिना उसके भी मर जाने पर, उसके पुत्र को अपने भाग के अनुसार—
यदि पिता के चार पुत्र थे और तीन पहले ही मर चुके थे और अब ऋण के भुगतान
का दायित्व एकमात्र जीवित चतुर्थ पुत्र पर था, जो दुर्भाग्यवश ऋण चुकाये बिना ही
मर गया, तो अब उसके पुत्र/पुत्रों को ऋण के चतुर्थांश का ही भुगतान करना होगा।
इसी प्रकार पुत्रों की संख्या के अनुपात में ही पुत्रों के पुत्रों पर आंशिक भुगतान का
दायित्व आयेगा—ही ऋण का अंश देना होगा।
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न स्त्री पतिकृतं दद्यादृणं पुत्रकृतं तथा।
अभ्युपेतादृते यद्वा सह पत्या कृतं भवेत् ॥ 16 ॥
यदि प्रतिज्ञा-पत्र में पहले से ही पति द्वारा लिये ऋण का उसकी पत्नी द्वारा
तथा पुत्र द्वारा लिये गये ऋण का उसकी माता द्वारा भुगतान का प्रावधान नहीं किया
गया, तो ऋण लेने वाले पति के मर जाने पर उसकी पत्नी पर पति के ऋण को तथा
ऋणकर्ता पुत्र के मर जाने पर उसकी माता पर पुत्र के ऋण को चुकाने की कोई
ज़िम्मेदारी नहीं। ऐसे ऋण को नष्ट हुआ ही समझना चाहिए। हां, यदि पत्नी अथवा
माता ने अपने पति अथवा पुत्र के ऋण में सहभागिनी होने की शपथ ली हुई है, तो
उन्हें उस ऋण का भुगतान करना ही होता है।
दद्यादपुत्रविधवा नियुक्ता वा मुमूर्षुणा।
यो वा तद्रिक्थमादत्ते यतो रिक्थमृणं ततः॥ 17 ॥
यदि पति ने मरते समय किसी से लिये ऋण के भुगतान का निर्देश पत्नी को
दिया है, तो पुत्र-हीना विधवा को वह ऋण अवश्य ही चुकाना पड़ता है अथवा यह
ऋण उत्तराधिकारी बनने वाले सम्बन्धी को चुकाना पड़ता है; क्योंकि वास्तव में
देय और ग्राह्य (Liability and Assets) का अभिन्न सम्बन्ध है। सम्पत्ति लेने वाले
को देनदारी भी निभानी पड़ती है। इसी तथ्य को 'विष्णुस्मृति' में भी स्वीकार किया
गया है—
य एवं रिक्थं गृह्णाति स एव ऋणं ददाति। यतो रिक्थं सञ्चरति तत
ऋणमपीत्युक्तम्।
न च भार्याकृतमृणं पत्युर्वापि कथं भवेत्।
आपत्कृतादृते पुंसां कुटुम्बार्थो हि दुस्तरः ॥ 18 ॥
पति के किसी दूर स्थान को चले जाने के कारण असहाय हो जाने पर
आपत्काल—परिवार के किसी दायित्व—लड़की का विवाह, रोग-उपचार, बच्चे
की उच्च शिक्षा तथा मकान की मरम्मत आदि—के निर्वाह आदि परिस्थिति में पत्नी
द्वारा लिये ऋण को चुकाने को तो पति बाध्य है, परन्तु सामान्य स्थिति में पत्नी द्वारा
लिये ऋण के भुगतान का पति पर कोई दायित्व नहीं।
टिप्पणी—यदि सामान्य स्थिति में पत्नी ऋण लेती है, तो वह उसका उपयोग
अपनी विलासिता आदि किसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए करती है। अतः पति
को उसकी भरपाई नहीं करनी पड़ती है, परन्तु हां, असामान्य स्थिति में ऋण लेना
तो उसकी विवशता है। पति द्वारा आवश्यकता की पूर्ति के लिए धन उपलब्ध न
कराने पर ही उसे किसी दूसरे के आगे हाथ पसारना पड़ता है। अतः उस ऋण को
चुकाने का दायित्व पुरुष (पति) पर डालना सर्वथा न्यायसंगत ही है।
नारदस्मृति / 67

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अन्यत्र रजकव्याधगोपशौण्डिकयोषिताम्।
तेषां तत्प्रत्यया वृत्तिः कुटुम्बं च तदाश्रयम् ॥ १९॥
धोबी, बहेलिया, ग्वाला और नट, नर्तक आदि की स्त्रियों द्वारा लिये गये
ऋण को चुकाना पतियों का कर्तव्य-कर्म है; क्योंकि ऋणदाता स्त्रियों को इस
विश्वास पर ही ऋण देता है कि परिवार के भरण-पोषण का दायित्व इनके पतियों
पर है, तो वे अपने पतियों की ओर से ऋण ले रही हैं। अतः पुरुषों पर कुटुम्ब की
निर्भरता ही ऋण चुकाने का आधार है।
पुत्रिणी तु समुत्सृज्य पुत्रं स्त्री यान्यमाश्रयेत्।
तस्या द्रव्यं हरेत् सोऽन्यो निःस्वायाः पुत्र एव तु ॥ २० ॥
यदि पुत्रवती विधवा स्त्री अपने पुत्र को छोड़कर अन्य पुरुष का वरण कर
लेती है, तो उसके स्त्रीधन पर उसके नये पति का अधिकार होता है। पुत्र उसकी
मांग नहीं कर सकता। यदि स्त्रीधन नहीं है, तो पुनर्विवाह करने वाली स्त्री अपने
पूर्वपति की चल-अचल सम्पत्ति को अपने साथ नहीं ले जा सकती। उस सम्पत्ति
पर उसका कोई अधिकार ही नहीं रह जाता, उस पर केवल उसके पुत्र का ही
अधिकार होता है।
अभिप्राय यह है कि स्त्रीधन पर केवल स्त्री का और पितृधन पर केवल पुत्र
का ही एकाधिकार होता है। पुनर्विवाह करने वाली स्त्री अपने स्त्रीधन को अपने
साथ ले जा सकती है और विवाह के पश्चात् स्त्री के उस धन पर उसके नये पति
का अधिकार हो जाता है।
या तु सप्रधनैव स्त्री सापत्या चान्यमाश्रयेत्।
सोऽस्या दद्यादृणं भर्तुरुत्सृजेद्वा तथैव ताम् ॥ २१ ॥
अपने पुत्र तथा पति द्वारा लिये गये ऋण को अपने ऊपर ओढ़कर दूसरे पुरुष
से विवाह करने वाली विधवा स्त्री के नये पति को उसके पूर्वपति तथा पुत्र के ऋण
को चुकता करके उसे उऋण करना ही पड़ता है, अर्थात् इसे विवाह की एक
आवश्यक शर्त मानकर चलना होता है। यदि पुरुष उस ऋण को चुकाने में असमर्थ
है, तो उसे विवाह ही नहीं करना चाहिए।
अधनस्य ह्यपुत्रस्य मृतस्योपैति यः स्त्रियम्।
स आभजेदृणं वोढुः सैव तस्य धनं यतः ॥ २२ ॥
किसी निर्धन एवं पुत्रहीन, परन्तु ऋणग्रस्त पुरुष के मर जाने पर उसकी
विधवा एवं अपुत्रवती स्त्री से विवाह करने वाले पुरुष को उस स्त्री के पूर्वपति के
ऋण को चुकता करना होता है; क्योंकि इस स्थिति में मृतपुरुष की पत्नी ही उसका
रिक्थ (धन) है और यह नियम है कि जो रिक्थ को ग्रहण करता है, देनदारी का
वहन भी उसे ही करना होता है। अतः मृत पुरुष की पत्नी के पाणिग्रहण करने वाले
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को कर्तव्य-रूप से एवं तदर्थ-भाव से उसके ऋण का भुगतान करना पड़ता है।
धनस्त्रीहारिपुत्राणामृणभाग् यो धनं हरेत्।
पुत्रोऽसतोः स्त्रीधनिनोः स्त्रीहारी धनिपुत्रयोः ॥ 23 ॥
ऋणग्रस्त धनहीन व्यक्ति के मर जाने पर, यदि उसका पुत्र अपने पिता के
ऋण को चुकाने में अपने को असमर्थ पाकर अपने पिता के नाम-मात्र (थोड़े-
बहुत) रिक्थ को भी लेने से इनकार कर देता है, तो उस रिक्थ को लेने के लिए
आगे आने वाले व्यक्ति को ऋणशोधन करना चाहिए। यदि कोई भी ऋण चुकाने
और रिक्थ संभालने को उद्यत नहीं होता और उसकी विधवा स्त्री किसी दूसरे पुरुष
से विवाह कर लेती है, तो उस स्त्री का हरण अथवा वरण करने वाले पुरुष को
उसके पूर्वपति के ऋण को चुकाना होता है; क्योंकि यहां स्त्री ही रिक्थ है और
रिक्थ के साथ ऋणशोधन भी जुड़ा हुआ है।
अन्तिमा स्वैरिणीनां या उत्तमा च पुनर्भूवाम्।
ऋणं तयोः पतिकृतं दद्याद्यस्ते समश्नुते ॥ 24 ॥
स्त्री भले ही उत्तम कोटि की पुनर्भू-छोटी आयु में पति से वियुक्त अथवा
सन्तानहीन अथवा पति के परिवारजनों का दबाव अथवा पितृपक्ष में आत्मीयता का
अभाव-सौतेली मां, मां का न होना, भाई-बहिनों का न होना अथवा निर्धन होना
अथवा अपेक्षावृत्ति का होना-आदि कारणों से पुनर्विवाह के लिए उद्यत होने वाली
हो अथवा स्वैरिणी-प्रबल कामवासना के कारण पर-पुरुष की अपेक्षा रखने
वाली-हो, तो उससे विवाह करने वाले पुरुष को उसके पूर्वपति द्वारा उठाये ऋण
का भुगतान करना ही होता है।
भार्या स्नुषा च भृत्या च भार्यायाश्च परिग्रहः।
एतावद्भिश्चर्णं देयं भूमिं यश्चोपजीवति ॥ 25 ॥
परिवार के भरण-पोषण के अथवा परिवार पर आयी किसी विपत्ति-रोग,
मृत्यु, राजा का कोप (Police harassment) तथा विवाह आदि-के उद्धार के
लिए निम्नोक्त सभी सदस्यों द्वारा किसी धनिक से लिये गये ऋण का भुगतान
परिवार के मुखिया अथवा अभिभावक बने सदस्य अथवा सदस्यों को करना होता
है-(1) पत्नी, (2) पुत्रवधू तथा (3) गृहसेविका-वेतन पर कार्य करने वाली
तथा पत्नी पर आश्रित रहने वाली महिला-उसकी बहिन अथवा अन्य निकट
सम्बन्धिनी, जिसे उसने अपने घर में प्रश्रय दे रखा है।
यहां यह उल्लेखनीय है कि स्त्रियों को साधारण लेन-देन का ही अधिकार
है, अचल सम्पत्ति के सम्बन्ध में उनके द्वारा किया गया लेन-देन अवैध होता है।
स्त्रीकृतान्यप्रमाणानि कार्याण्याहुर्मनीषिणः।
विशेषतो गृहक्षेत्रदानाधमनविक्रया ॥ 26 ॥
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मनीषियों और विधिवेत्ताओं के अनुसार माता, पत्नी तथा पुत्री आदि स्त्रियों
को विशेषतः घर और क्षेत्र आदि के दान, विक्रय तथा बन्धक रखने का कोई
अधिकार नहीं है। इनके द्वारा इस प्रकार किये गये अनुबन्ध अवैध एवं अप्रामाणिक
हो जाते हैं।
अभिप्राय यह है कि नारी को केवल असामान्य स्थिति में और वह भी छोटे-
मोटे ऋण लेने की छूट है, अन्यथा उसे चल-अचल सम्पत्ति के साथ छेड़-छाड़
करने का कोई अधिकार नहीं है। उनके साथ किये गये सौदे निरस्त माने जाते हैं।
एतान्येव प्रमाणानि भर्त्ता यद्यनुमन्यते ।
पुत्रः पत्युरभावे च राजा च पतिपुत्रयोः ॥ 27 ॥
पति की अथवा पति के अभाव में पुत्र की और दोनों के अभाव में राजा
(शासन) की अनुमति प्राप्त होने पर स्त्रियों द्वारा सम्पत्ति के क्रय-विक्रय सम्बन्धी
किये गये सौदे वैध एवं प्रामाणिक माने जाते हैं।
अभिप्राय यह है कि विदेश में होने के कारण अथवा चिकित्सालय में प्रविष्ट
होने के कारण अथवा अन्य किसी कारणवश पति अथवा पुत्र लेन-देन के लिए
सभा में उपस्थित नहीं हो सकते और पत्नी या माता को अधिकृत कर देते हैं
(Power of Attorny दे देते हैं), तो स्त्री द्वारा किये गये सौदे उसके पति-पुत्र द्वारा
किये गये माने जायेंगे, इस प्रकार उनकी वैधता अक्षुण्ण होगी। इसी प्रकार पति-
पुत्रविहीना स्त्री द्वारा प्रशासन से हरी झण्डी (Clearance) लेने के उपरान्त ही किये
गये सौदे मान्य होते हैं।
भर्त्रा प्रीतेन यद्दत्तं स्त्रियै तस्मिन् मृतेऽपि तत् ।
सा यथाकाममश्नीयाद्दद्याद्वा स्थावरादृते ॥ 28 ॥
पति ने प्रसन्न होकर स्वेच्छा से जो कुछ अपनी पत्नी को दे दिया है, पति की
मृत्यु के उपरान्त भी पतिप्रदत्त उस सम्पत्ति पर पत्नी का अधिकार अक्षुण्ण बना
रहता है, उसे कोई छीन नहीं सकता। वह अचल सम्पत्ति को छोड़कर चल
सम्पत्ति-स्वर्ण, नक़दी, आभूषण, वस्त्र एवं सब प्रकार के सामान-का यथेष्ट
उपयोग करने को स्वतन्त्र है।
टिप्पणी - 'मदनरत्नम्' ग्रन्थकार के अनुसार-भर्तृ दत्तस्थावरोपभोगमात्र-
मेवस्त्रीभिर्मृताविभक्तपतिकाभिः कर्त्तव्यम्, न तु दानादिकमित्यर्थः । अर्थात्
पति द्वारा प्रीतिवश दी गयी स्थावर सम्पत्ति का उपयोग स्त्री पति के जीवनकाल में
तथा उसके मरणोपरान्त परिवार के सदस्यों के विभक्त अथवा अविभक्त रहते करने
को तो स्वतन्त्र है, परन्तु उसे किसी को वह सम्पत्ति दान में देने, बेचने अथवा
बन्धक रखने का कोई अधिकार नहीं है।
70 / नारदस्मृति

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यथा दासकृतं कार्यमकृतं परिचक्षते।
अन्यत्र स्वामिसन्देशान्न दासः प्रभुरात्मनः ॥ २९ ॥
स्त्रियों के समान ही दासों के द्वारा भी स्वामी द्वारा अनुमत कार्य को सम्पन्न
करने पर मान्यता है। स्वामी से अनुमति प्राप्त किये बिना स्वेच्छा से दास द्वारा किये
किसी भी कार्य का दायित्व स्वामी का नहीं होता। सेवक को सदैव यह स्मरण
रखना चाहिए कि वह सेवक है, स्वामी नहीं, अर्थात् उसे निर्णय लेने का कोई
अधिकार नहीं, उसका कर्तव्य कर्म तो केवल स्वामी के आदेश का पालन करना है।
सेवक के साथ व्यवहार करने वालों को भी सेवक की सीमा और उसके
कार्यक्षेत्र को ध्यान में रखना चाहिए, अन्यथा उनका दुखी होना स्वाभाविक ही है।
पुत्रेणापि कृतं कार्यं यत्स्यादच्छन्दतः पितुः।
तदप्यकृतमेवाहुर्दासः पुत्रश्च तत्समौ ॥ ३० ॥
दास के समान ही पिता के जीवित होने पर उसकी अनुमति के बिना पुत्र द्वारा
किया गया व्यवहार—लेन-देन—भी अप्रामाणिक हो जाता है; क्योंकि पुत्र सम्पत्ति
का स्वामी ही नहीं बना। स्वामित्व और अधिकार-पत्र (Power of Attorny) के
अभाव में किया गया व्यवहार तो वैध हो ही नहीं सकता।
अभिप्राय यह है कि पुत्र के साथ व्यवहार करने वालों का हित इसी में है कि
वे यह निश्चित कर लें कि विचारणीय सम्पत्ति पुत्र के स्वामित्व की अथवा पिता
द्वारा अनुमत है अथवा नहीं। इस तथ्य की निश्चित जानकारी प्राप्त किये बिना
सहसा व्यवहार करने वालों को प्रायः पछताना ही पड़ता है। स्मृतिकार के अनुसार
दास और पुत्र एक समान ही हैं। दोनों स्वामी नहीं, अपितु स्वामी अथवा पिता के
आदेश-वाहक हैं। अन्तर केवल इतना ही है कि सेवक वेतनभोगी है और पुत्र
दाय-भागी है। मूल अधिकार तो पिता के पास सुरक्षित है।
अप्राप्तव्यवहारश्चेत् स्वतन्त्रोऽपि हि नर्णभाक्।
स्वातन्त्र्यं हि स्मृतं ज्येष्ठे ज्यैष्ठ्यं गुणवयः कृतम् ॥ ३१ ॥
पिता की मृत्यु हो जाने पर भी अवयस्क व्यवहार करने में अकुशल पुत्र को
परिवार की सम्पत्ति को बन्धक रखने का और उस पर ऋण लेने का अधिकार नहीं,
बेचने का तो प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता। हां, इस स्थिति में ज्येष्ठ पुत्र को अवश्य
यह सब करने—आवश्यकता के अनुसार सम्पत्ति को बेचने अथवा बन्धक रखने—
का अधिकार है, परन्तु ज्येष्ठता के दो आधार हैं—आयु तथा गुण।
गुण को ज्येष्ठता का आधार मानने का अर्थ है कि यदि ज्येष्ठ भ्राता ज्येष्ठ तो है,
परन्तु श्रेष्ठ नहीं, अर्थात् अग्रज होने पर भी द्वितीय अथवा तृतीय भाई (अनुज) से
बुद्धि में पिछड़ा हुआ है, तो पैतृक सम्पत्ति के हस्तान्तरण का अधिकार गुणहीन से
छिनकर गुणवान् के पास चला जायेगा। हां, बौद्धिक उत्कर्ष में समानता होने पर
आयु को गौरव मिलेगा।
नारदस्मृति / 71

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त्रयः स्वतन्त्रा लोकेऽस्मिन् राजाचार्यस्तथैव च।
प्रतिवर्णं च सर्वेषां वर्णानां स्वे गृहे गृही ॥ 32 ॥
इस संसार में तीन व्यक्ति ही स्वतन्त्र हैं—राजा, आचार्य तथा अपने वर्ण में
स्थित घर का मुखिया। ये तीनों जो कुछ भी करना चाहें, कर सकते हैं। इन्हें अपने
अपने क्षेत्र—राजा को राज्य में, आचार्य को गुरुकुल अथवा आश्रम में तथा गृहपति
को अपने घर-परिवार—में कुछ करने के लिए किसी की अनुमति नहीं लेनी
पड़ती।
अस्वतन्त्राः प्रजाः सर्वाः स्वतन्त्रः पृथिवीपतिः।
अस्वतन्त्रः स्मृतः शिष्यः आचार्ये तु स्वतन्त्रता ॥ 33 ॥
इसी तथ्य की आवृत्ति करते हुए स्मृतिकार का कथन है—राजा स्वतन्त्र है
और उसके द्वारा शासित एवं उसके अधीनस्थ प्रजा परतन्त्र है; क्योंकि प्रजा राजा के
आदेश-निर्देश का पालन करने को बाध्य है। आचार्य स्वतन्त्र है और उससे शिक्षा
ग्रहण करने वाला एवं उसके आश्रम में रहने वाला छात्र परतन्त्र है; क्योंकि उसे गुरु
के आदेश से अथवा उनके द्वारा निर्धारित नियमों के अनुसार ही अपनी दिनचर्या
बनानी पड़ती है।
अस्वतन्त्रा स्त्रियः पुत्रा दासादिश्च परिग्रहः।
स्वतन्त्रस्तत्र तु गृही यस्य यत् स्यात् क्रमागतम् ॥ 34 ॥
इसी प्रकार गृहस्वामी स्वतन्त्र है और अपने भरण-पोषण के लिए उस पर
आश्रित स्त्रियां, पुत्र, दास-दासियां तथा अन्य सम्बन्धी परतन्त्र हैं; क्योंकि कुल-
परम्परा से प्राप्त सम्पत्ति की रक्षा और वृद्धि तथा नयी सम्पत्ति के अर्जन के साथ-
साथ परिवार के सभी सदस्यों के भरण-पोषण का व उनकी आवश्यकताओं की
पूर्ति का सारा दायित्व गृहस्वामी का ही है।
गर्भस्थसदृशो ज्ञेयः अष्टमाद् वत्सराच्छिशुः।
बाल आषोडशाद् वर्षात् पोगण्ड इति शस्यते ॥ 35 ॥
आठ वर्ष की आयु तक के बालक को गर्भस्थ बालक के समान समझना
चाहिए, अर्थात् उससे किसी प्रकार का व्यवहार करने की अपेक्षा नहीं करनी
चाहिए। सत्य तो यह है कि जब तक बालक सोलह वर्ष का नहीं हो जाता, तब तक
उसे पोगण्ड (अनाड़ी) ही समझना चाहिए।
वस्तुतः यह आयु तो बालक के खेलने-कूदने और मौज-मस्ती करने की
होती है। इस आयु में उसे किसी प्रकार का कोई दायित्व सौंपना, उसके बचपन की
हत्या करना ही है।
टिप्पणी—मनु ने भी पांच वर्ष तक बालक को लाड़-प्यार करने का और
72 / नारदस्मृति

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दस वर्षों तक प्रशिक्षित करने का विधान किया है। बालक के सोलह वर्षों का होने
पर उसके साथ मित्रवत् व्यवहार करने का निर्देश किया है, जिसका अर्थ है कि
बालक सोलह वर्षों की आयु में ही समझदार हो पाता है—
लालयेत् पञ्चवर्षाणि दश वर्षाणि ताडयेत्।
प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रं मित्रवदाचरेत्॥
परतो व्यवहारज्ञः स्वतन्त्रः पितरौ बिना।
जीवतोरस्वतन्त्रः स्याज्जरयापि समन्वितः ॥ 36 ॥
सोलह वर्ष से ऊपर की आयु का होने पर बालक को व्यवहारकुशल समझना
चाहिए और तब वह माता-पिता की अनुमति अथवा सहमति के बिना भी व्यवहार
करने को स्वतन्त्र हो जाता है।
इस प्रकार पुत्र को अपने व्यवहारकुशल हो जाने पर और माता-पिता के
वृद्ध, रोगग्रस्त और असमर्थ हो जाने पर भी उनके जीवनकाल तक अपने को उनके
अधीन-अस्वतन्त्र मानकर ही चलना चाहिए।
तयोरपि पिता श्रेयान् बीजप्राधान्यदर्शनात्।
अभावे बीजिनो माता तदभावे तु पूर्वजः ॥ 37 ॥
पुत्र के लिए माता और पिता दोनों ही समान रूप से आदरणीय हैं, परन्तु फिर
भी माता की अपेक्षा पिता का महत्त्व कहीं अधिक है; क्योंकि योनि (धरती) की
अपेक्षा वीर्य (बीज) की प्रधानता सर्वसम्मत है।
पिता अथवा पति के न रहने पर माता और माता के न रहने पर ज्येष्ठ पुत्र
(भाइयों के हिसाब से अग्रज अथवा ज्येष्ठ भ्राता) स्वतन्त्र है। पति के जीवनकाल
में पत्नी की और माता के जीवनकाल में पुत्रों की परतन्त्रता निश्चित है।
स्वतन्त्राः सर्व एवैते परतन्त्रेषु सर्वदा।
अनुशिष्टौ विसर्गे च विक्रये चेश्वरा मताः ॥ 38 ॥
उपर्युक्त राजा, आचार्य और गृहपति अपने परतन्त्र विषयों—प्रजा, शिष्य तथा
आश्रित सदस्य—के सन्दर्भ में ही स्वतन्त्र हैं। राजा प्रजा के, आचार्य शिष्य के तथा
गृहपति परिवारजनों के अनुशासन में तथा अपनी सम्पत्ति के दान एवं विक्रय में
स्वतन्त्र एवं सम्प्रभुता प्राप्त हैं।
यद्बालः कुरुते कार्यमस्वतन्त्रस्तथैव च।
अकृतं तदिति प्राहुर्धर्मशास्त्रविदो जनाः ॥ 39 ॥
जिस प्रकार बालक द्वारा किये गये व्यवहार को अमान्य एवं अप्रामाणिक
माना जाता है, उसी प्रकार स्वतन्त्रों के स्थान पर परतन्त्रों द्वारा, अर्थात् राजा के
स्थान पर प्रजाजनों द्वारा, आचार्य के स्थान पर शिष्य द्वारा तथा गृहपति के स्थान पर
आश्रितों द्वारा किये गये कार्य को भी सर्वथा अप्रामाणिक एवं असिद्ध ही मानना
चाहिए।
नारदस्मृति / 73

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कामक्रोधाभिभूतार्तभयव्यसनपीडिताः ।
रागद्वेषपरीताश्च श्रेयास्त्वप्रकृतिं गताः ॥ 40 ॥
निम्नोक्त स्थितियों के प्राणियों को अस्वस्थ और उनके द्वारा किये गये व्यवहार
को भी अप्रामाणिक एवं असिद्ध मानना चाहिए—(1) काम और क्रोध से अभिभूत,
(2) आर्त-संकटग्रस्त, (3) भयग्रस्त, (4) व्यसन-पीडित तथा (5) राग द्वेष में
आसक्त।
ऐसे प्राणी व्यवहार में अपने विवेक का प्रयोग-उपयोग नहीं कर पाते। वे
भावना एवं आवेश के वशीभूत होकर ग़लत-सही का निर्णय नहीं कर सकते। यही
कारण है कि क़ानून इनके व्यवहार को मान्यता नहीं देता।
स्वतन्त्रोऽपि हि यत्कार्यं कुर्यादप्रकृतिं गतः ।
अकृतं तदपि प्राहुरस्वातन्त्र्यस्य हेतुतः ॥ 41 ॥
स्वतन्त्र, अर्थात् सभी प्रकार के व्यवहार करने में सक्षम एवं पूर्ण अधिकार-
सम्पन्न व्यक्ति के भी प्रकृतिस्थ न रहने की स्थिति में किये गये व्यवहार को अकृत
ही समझना चाहिए; क्योंकि मदिरा, द्यूत तथा दारागमन आदि दुर्व्यसनों के अधीन
व्यक्ति कभी स्वतन्त्र एवं विवेक से कार्य करने वाला हो ही नहीं सकता।
अभिप्राय यह है कि व्यक्ति वयस्क और अपनी सम्पत्ति का सार्वभौम स्वामी
होने के नाते लेन-देन करने को स्वतन्त्र एवं समर्थ अवश्य होता है, परन्तु यदि
उसने मदिरापान कर रखा है अथवा द्यूत-क्रीड़ा तथा व्यभिचार आदि व्यसनों का
शिकार है, तो निश्चित है कि अपने दुर्व्यसनों में ग्रस्त ऐसा व्यक्ति अपनी सम्पत्ति
को औने-पौने दामों में भी बेचने को विवश हो जायेगा; क्योंकि उत्कट वासना-
पूर्ति की इच्छा ने उस पर अधिकार कर रखा है और उसकी सद्बुद्धि एवं विवेक-
शक्ति को कुण्ठित कर दिया है। अतः ऐसे व्यक्ति द्वारा किये गये व्यवहार को
निरस्त मानना सर्वथा उचित ही है।
कुले ज्येष्ठस्तथा श्रेष्ठः प्रकृतिस्थश्च यो भवेत् ।
तत्कृतं तु कृतं प्राहुर्वा स्वतन्त्रकृतं कृतम् ॥ 42 ॥
वास्तव में परिवार में आयु की दृष्टि से ज्येष्ठ तथा गुण, विद्या एवं आचार की
दृष्टि से श्रेष्ठ होने के अतिरिक्त पूर्ण स्वस्थ, अर्थात् मदिरा आदि के नशे से मुक्त तथा
किसी विषय-वासना एवं व्यसन आदि के वश में न रहने वाले, पूर्ण स्वतन्त्र व्यक्ति
द्वारा सम्पन्न किया गया व्यवहार ही सिद्ध एवं प्रामाणिक होता है। परतन्त्र--मदिरा
के नशे में धुत, उद्दाम वासना से पीड़ित, द्यूत में हारा और खेलने के लिए उन्मत्त-
व्यक्ति तो कभी सही निर्णय ले ही नहीं सकता। इस प्रकार व्यसनों के दास द्वारा
गया किया कार्य अप्रामाणिक ही होता है।
टिप्पणी—असहाय भाष्यकार के अनुसार भूत-प्रेतादि का शिकार बने,
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तथा द्यूत आदि व्यसनों में फंसे व्यक्ति को स्वभाव (प्रकृति) से परित्यक्त ही
समझना चाहिए। इस प्रकार के कारणों से स्वतन्त्र व्यक्ति भी स्वतन्त्र निर्णय लेने में
असमर्थ हो जाता है। इसी कारण उसके द्वारा किये गये कार्यों—दान, क्रय-विक्रय
तथा बन्धक आदि—को नशे में किये कार्यों के रूप में—असिद्ध ही मानना चाहिए—
भूतगृहीतो वा द्यूतादिव्यसनगृहीतो वा स्वभावप्रकृतिपरित्यक्तः। अनेन हेतुना
स्वतन्त्रोऽपि अस्वतन्त्रः सहेतुकः।
धनमूलाः क्रिया सर्वा यत्नस्तत्साधने मतः।
रक्षणं वर्धनं भोग इति तस्य विधिः क्रमात् ॥ 43 ॥
संसार के व्यक्तियों द्वारा किये जाने वाले सभी कार्यों का प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष
सम्बन्ध धन से है। धन ही वह केन्द्रबिन्दु है, जिसके चारों ओर सभी कार्य चक्कर
काटते रहते हैं। अतः सभी व्यक्तियों को धन की प्राप्ति के लिए उद्यम करना
चाहिए। इस उद्यम के तीन उपाय अथवा प्रकार हैं—प्रथम, उपार्जित धन की
सुरक्षा, द्वितीय, सुरक्षित धन का वर्द्धन करना और तृतीय, वर्द्धित धन का भोग,
अर्थात् सदुपयोग करना।
टिप्पणी—धर्मशास्त्र की मान्यता है कि धन के दो ही उपयोग हैं—दान तथा
भोग, अर्थात् स्वयं खाना अथवा दूसरों को खिलाना। इन दोनों कार्यों—स्वयं भी न
खाना और दूसरों को भी न खिलाना—में न आने वाले धन की तीसरी गति, उसका
नाश होना है।
दानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य।
यो न ददाति न भुंक्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति॥
अतः यहां धन के रक्षण और वर्द्धन के उपरान्त तीसरे स्थान पर उसके
यथोचित उपभोग का उल्लेख किया गया है।
तत्पुनस्त्रिविधं ज्ञेयं शुक्लं शबलमेव च।
कृष्णं च तस्य विज्ञेयः प्रभेदः सप्तधा पृथक् ॥ 44 ॥
धन के तीन प्रकार-भेद हैं—शुक्ल, शबल और कृष्ण। इन तीनों के पुनः
सात-सात भेद होते हैं।
श्रुतशौर्यतपः कन्याशिष्ययाज्यान्वयागतम्।
धनं सप्तविधं शुक्लमुद्योगस्तस्य तद्विधः ॥ 45 ॥

  1. विद्या (अध्यापन), 2. शौर्य (युद्ध, पौरुष), 3. कठोर श्रम (तपस्या),
  2. शिष्य (दक्षिणा-रूप में), 5.पौरोहित्य (यज्ञादि सम्पन्न कराने पर प्राप्त दान-
    दक्षिणा), 6. कन्या (कन्या के विवाह के बदले प्राप्त) तथा 7. दाय भाग (उत्तराधिकार
    में प्राप्त पैतृक सम्पत्ति) आदि सात प्रकार के धन शुक्ल (White Money) कहलाते
    हैं। इन साधनों से धन की प्राप्ति के लिए किया जाने वाला उद्योग भी सात्त्विक होता
    नारदस्मृति / 75
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है। यहां किसी प्रकार के दुराव-छिपाव के लिए अवकाश ही नहीं है।
कुसीदकृषिवाणिज्यशुल्कशिल्पानुवृत्तिभिः ।
कृतोपकारादाप्तं च शबलं समुदाहृतम् ॥ 46 ॥
निम्नोक्त सात साधनों से प्राप्त धन शबल—न शुक्ल, न श्याम (Neither
White, nor black)—मध्यम कोटि का कहलाता है—1. ब्याज, 2. कृषि,
3. व्यापार, 4. शुल्क—काम करने का निर्धारित एवं निश्चित पारिश्रमिक (Fee),
5. शिल्प -मूर्ति, चित्र तथा स्थापत्य आदि उपयोगी कलाओं के विक्रय से प्राप्त धन,
6. सेवा-चाकरी तथा 7. उपकृत व्यक्ति द्वारा उऋण होने के लिए उपहार के रूप में
समर्पित धन।
उत्कोचद्यूतदौत्यर्तिप्रतिरूपकसाहसैः ।
व्याजेनोपार्जितं यच्च कृष्णं हि तदुदाहृतम् ॥ 47 ॥
निम्नोक्त सात साधनों द्वारा प्राप्त धन काला धन कहलाता है—1. घूस,
2. द्यूतक्रीड़ा, 3. दूतकर्म, 4. दूसरों का मन दुखाकर एवं उन्हें पीड़ा पहुंचाकर
उनसे बलपूर्वक छीना गया, 5. चोरी, 6. डकैती तथा 7. छल-कपट, धोखाधड़ी।
तेन क्रयो विक्रयश्च दानं ग्रहणमेव च।
विविधाश्च प्रवर्त्तन्ते क्रियाः सम्भोग एव च ॥ 48 ॥
संसार में सभी कार्य—क्रय-विक्रय, दान-प्रतिग्रह के अतिरिक्त अन्यान्य नाना
प्रकार के उपभोग—इन्हीं तीन शुक्ल, शबल तथा श्याम प्रकार के धनों से ही
सम्पन्न होते हैं।
यथाविधेन द्रव्येण यत्किञ्चित् कुरुते नरः ।
तथाविधमवाप्नोति सफलं प्रेत्य चेह च ॥ 49 ॥
इन तीनों—शुक्ल, शबल और कृष्ण—प्रकार के धनों में जिस प्रकार के धन
से व्यक्ति शुभाशुभ कार्य करता है, उसे इस लोक में तथा परलोक में उसी प्रकार का
फल मिलता है। अभिप्राय यह है कि शुद्ध ढंग से कमाये धन से शुभकर्मों का उत्तम
फल और दूसरे धनों से किये कर्मों का मध्यम या अधम फल मिलता है।
तत्पुनर्द्वादशविधं प्रतिवर्णाश्रयात्स्मृतम् ।
साधारणं स्यात्त्रिविधं शेषं नवविधं विदुः ॥ 50 ॥
धन के ये तीनों—शुक्ल, शबल और कृष्ण—रूप चारों—ब्राह्मण, क्षत्रिय,
वैश्य और शूद्र—वर्णों के सन्दर्भ में बारह प्रकार के हो जाते हैं। धन के उपर्युक्त
तीन रूप-भेद तो सामान्य हैं, अर्थात् चारों वर्णों के लोग सामान्य रूप से धन के
अर्जन में शुक्ल, शबल और कृष्ण साधनों का प्रयोग-उपयोग करते हैं। अतः धन
के ये तीन सामान्य अथवा साधारण रूप भेद हैं, परन्तु नौ रूपों में दो की विशेष
स्थिति है। उदाहरणार्थ, सामान्यतः ब्राह्मण और क्षत्रिय केवल शुक्ल धन को, वैश्य
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शुक्ल और शबल धन को और शूद्र शुक्ल, शबल तथा कृष्ण धन को अर्जित करते
हैं। इसके अतिरिक्त इन चारों वर्णों में उत्तम, मध्यम और अधम प्रकृति के प्राणी
पाये जाते हैं। उत्तम प्रकृति के प्राणी शुक्ल धन को, मध्यम प्रकृति के व्यक्ति शबल
धन को तथा अधम प्रकृति के प्राणी कृष्ण धन को वरीयता देते हैं तथा इनके अर्जन
में प्रवृत्त होते हैं। इस प्रकार धन के बारह रूप-भेद-चारों वर्णों के उत्तम, मध्यम
प्रकृति के प्राणी-हो जाते हैं।
क्रमागतं प्रीतिदायः प्राप्तं च सहभार्यया।
अविशेषेष वर्णानां सर्वेषां त्रिविधं शुभम् ॥ 51 ॥
तीन प्रकार के सामान्य अथवा साधारण धन का परिचय स्मृतिकार के अनुसार
इस प्रकार है-निम्नोक्त तीनों धन सभी वर्णों और जातियों के लोगों के लिए समान
रूप से शुद्ध हैं-

  1. उत्तराधिकार के रूप में पितामह-पिता आदि से प्राप्त धन।
  2. किसी भी सम्बन्धी, मित्र अथवा राजा (प्रशासन) द्वारा अपनी प्रसन्नता से
    दान, उपहार, पुरस्कार व पारितोषिक आदि के रूप में प्रदत्त धन तथा
  3. विवाह के समय पत्नी के साथ दहेज के रूप में प्राप्त धन।
    वैशेषिकं धनं ज्ञेयं ब्राह्मणस्य शुभं त्रिधा।
    प्रतिग्रहेण यल्लब्धं याज्यतः शिष्यतस्तथाः ॥ 52 ॥
    विशेष रूप से ब्राह्मण के लिए निम्नोक्त तीन प्रकार का धन शुद्ध कहलाता है।
  4. दान से प्राप्त धन।
  5. पौरोहित्य-यज्ञ-यागादि सम्पन्न कराने पर दक्षिणा के रूप में प्राप्त धन
    तथा
  6. अध्यापन-कार्य से वेतन, शुल्क अथवा गुरुदक्षिणा के रूप में प्राप्त धन।
    त्रिविधं क्षत्रियस्यापि शुद्धं वैशेषिकं धनम्।
    कराद् युद्धोपलब्धं च दण्डाश्च व्यवहारतः ॥ 53 ॥
    क्षत्रिय (राजा) का भी निम्नोक्त तीन साधनों से प्राप्त धन शुद्ध होता है।
  7. कर वसूली से प्राप्त धन।
  8. युद्ध में विजय होने पर हस्तगत शत्रु की सम्पत्ति तथा
  9. नियम का अतिक्रमण करने वाले एवं व्यवहार में पराजित होने वालों को
    अनुशासित करने के लिए उन पर लगाये अर्थ-दण्ड की वसूली से प्राप्त धन।
    वैशेषिकं धनं ज्ञेयं वैश्यस्यापि त्रिधा शुभम्।
    कृषिगोरक्षवाणिज्यैः शूद्रस्यैषामनुग्रहात् ॥ 54 ॥
    वैश्य का भी निम्नोक्त तीन साधनों से प्राप्त धन शुद्ध कहलाता है।
  10. कृषि द्वारा-अनाज, फल, सब्जी, आदि की बिक्री से-अर्जित धन।
    नारदस्मृति / 77
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  1. पशु-पालन-दूध, दही, मक्खन, घी आदि की बिक्री-से प्राप्त धन तथा
  2. व्यापार से अर्जित लाभ।
    इसी प्रकार तीनों वर्णों के लोगों द्वारा अपनी प्रसन्नता से शूद्र को दिया गया
    धन भी शुद्ध होता है।
    सर्वेषामेव वर्णानामेव धर्म्यो धनागमः।
    विपर्ययादधर्म्यः स्यान्न चेदापद् गरीयसी ॥ 55 ॥
    सभी वर्णों के लोगों द्वारा धर्मसम्मत साधनों से अर्जित धन को शुक्ल धन
    समझना चाहिए। धर्म विरुद्ध साधनों से अर्जित धन ही काला धन है। आपत्काल
    को छोड़कर कभी अनुचित साधनों से धन के अर्जन की नहीं सोचना चाहिए।
    आपत्ति में जीवन की रक्षा का प्रश्न प्रमुख हो जाता है, अतः उस समय की छूट को
    अपवाद ही समझना चाहिए।
    आपत्स्वनन्तरा वृत्तिर्ब्राह्मणस्य विधीयते।
    वैश्यवृत्तिस्ततश्चोक्ता न जघन्या कथञ्चन ॥ 56 ॥
    आपत्काल में ब्राह्मण को अपनी वृत्ति से निर्वाह न होने पर क्षत्रियों द्वारा
    अपनायी जाने वाली वृत्ति को और उससे भी निर्वाह सम्भव न होने पर वैश्यवृत्तियों
    को अपनाना चाहिए, परन्तु किसी भी स्थिति में शूद्रवृत्ति को कभी नहीं अपनाना
    चाहिए; क्योंकि ब्राह्मण के लिए शूद्रवृत्ति अत्यन्त निकृष्ट है।
    न कथञ्चन कुर्वीत ब्राह्मणः कर्म वार्षलम्।
    वृषलः कर्म न ब्राह्मं पतनीये हि ते तयोः ॥ 57 ॥
    जिस प्रकार ब्राह्मण के लिए शूद्रकर्म सर्वथा वर्जनीय है, उसी प्रकार शूद्र के
    लिए ब्राह्मणवृत्ति भी सर्वथा अनुचित है। इन दोनों के लिए एक-दूसरे की वृत्ति को
    अपनाना दोनों के पतन का कारण बनता है।
    उत्कृष्टं चापकृष्टं च तयोः कर्म न विद्यते।
    मध्यमे कर्मणी हित्वा सर्वसाधारणे हि ते ॥ 58 ॥
    संकटकाल में शूद्र के लिए क्षत्रियवृत्ति को तथा ब्राह्मण के लिए वैश्यवृत्ति
    अपनाने को न तो उत्कृष्ट स्थिति कहा जा सकता है और न ही निकृष्ट स्थिति कहा
    जा सकता है; क्योंकि इससे नीचे उतरना तो किसी प्रकार उचित ही नहीं है, अर्थात्
    ब्राह्मण शूद्रवृत्ति को तो किसी भी रूप में नहीं अपना सकता और न ही शूद्र के लिए
    ब्राह्मणवृत्ति को अपनाना उचित है। अभिप्राय यह है कि पहले तो आवश्यकता
    पड़ने पर भी ब्राह्मण को क्षत्रियवृत्ति तक सीमित रहना चाहिए, परन्तु उतने से काम
    न चलने पर विवशता की स्थिति में वैश्यवृत्ति को अपनाना उचित है। इसी प्रकार
    शूद्र को प्रथम तो वैश्यवृत्ति और इससे काम न चलने पर क्षत्रियवृत्ति को अपनाना
    चाहिए। इस प्रकार ये दोनों स्थितियां-ब्राह्मण का वैश्यवृत्ति को अपनाना तथा शूद्र
    78 / नारदस्मृति
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द्वारा क्षत्रियवृत्ति को अपनाना—विवशता की और अस्थायी स्थितियां हैं। अतः न
तो ब्राह्मण द्वारा अपनायी वैश्यवृत्ति को निकृष्ट और शूद्र द्वारा अपनायी क्षात्रवृत्ति को
उत्कृष्ट माना जा सकता है।
आपदं ब्राह्मणस्तीर्त्वा क्षत्रवृत्त्यर्जितैर्धनैः ।
उत्सृजेत् क्षत्रवृत्तिं तां कृत्वा पावनमात्मनः ॥ 59 ॥
संकट के दूर होते ही ब्राह्मण को अस्थायी रूप से अपनायी क्षात्रवृत्ति का
तत्काल परित्याग कर देना चाहिए। इतना ही नहीं, इसके लिए ब्राह्मण को प्रायश्चित्त
भी करना चाहिए। प्रायश्चित्त करने पर ही ब्राह्मण पवित्र होता है।
तस्यामेव तु यो वृत्तौ ब्राह्मणो रमते सदा।
काण्डपृष्ठश्च्युतो मार्गादपाङ्क्तेयः प्रकीर्त्तितः ॥ 60 ॥
संकट के टल जाने पर भी लोभवश क्षात्रवृत्ति अथवा वैश्यवृत्ति से चिपटा
रहने वाला ब्राह्मण 'काण्डपृष्ठ' कहलाता है। ऐसा ब्राह्मण आचारभ्रष्ट माना जाता हैं
और ब्राह्मणों की पंक्ति में बैठने के अधिकार से च्युत हो जाता है।
वैश्यवृत्त्या चाविक्रेयं ब्राह्मणस्य पयो दधि।
घृतं मधु मधुच्छिष्टं लाक्षाक्षाररसासवाः ॥ 61 ॥
मांसौदनतिलक्षौमसोमपुष्पफलोपलाः ।
मनुष्यविषशस्त्राम्बुलवणापूपवीरुधः ॥ 62 ॥
चैलकौशेयचर्मास्थिकुतवैकशफा मृदः।
उदश्वित्कुशपिण्याकशाकार्द्रौषधयस्तथा ॥ 63 ॥
विशेष संकट की स्थिति में वैश्यवृत्ति को अपनाने को विवश हुए ब्राह्मण को
निम्नोक्त वस्तुओं का क्रय-विक्रय कभी नहीं करना चाहिए—दूध, दही, घृत, मधु,
सोम, लाख, गुड़, क्षार, सुरा, मांस, अन्न, तिल, कौशेय वस्त्र, पुष्प, फल, रत्न
आदि पाषाण, मनुष्य (दास), विष, शस्त्र, जल, नमक, जड़ी-बूड़ी, वस्त्र, चर्म,
अस्थि, कम्बल, एक खुर वाले पशु—अश्व, गर्दभ आदि—मिट्टी के बरतन, मट्ठा,
कुश, खली तथा गीली औषधि आदि।
ब्राह्मणस्य तु विक्रेयं शुष्कं दारु तृणानि च।
गन्धद्रव्यैरकावेत्रतूलमूलकुशादृते ॥ 64 ॥
वैश्यवृत्ति को अपनाने वाले ब्राह्मण को सुगन्धित द्रव्य, एरका घास, बेंत, तूल
(कपास), मूल (मूली, आलू, गाजर आदि) और कुश आदि का क्रय विक्रय भी
नहीं करना चाहिए। हां, वह सूखी लकड़ियों और घास को बेचने को अवश्य
स्वतन्त्र है।
स्वयं शीर्णं च विदलं फलानां बदरेङ्गुदे।
रज्जु कार्पासिकं सूत्रं तच्चेदविवृतं भवेत् ॥ 65 ॥
नारदस्मृति / 79

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संकटकाल में वैश्यवृत्ति को अपनाने को विवश हुआ ब्राह्मण निम्नोक्त पदार्थों
का क्रय-विक्रय कर सकता है—1. शीर्ण होने से स्वयं वृक्ष से पतित पत्र, 2. बेर,
3. इंगुदिका नामक फल, 4. रज्जु तथा 5. खादी से बुने गये सूती वस्त्र आदि।
अशक्तौ भेषजस्यार्थे यज्ञहेतोस्तथैव च।
यद्यवश्यं तु विक्रेयास्तिला धान्येन तत्समाः ॥ 66 ॥
संकटकाल में वैश्यवृत्ति को अपनाने को बाध्य बाह्मण उपर्युक्त पदार्थों के
अतिरिक्त किसी असमर्थ रोगी के उपचार के लिए उपेक्षित जड़ी-बूटी अथवा उनसे
तैयार लेप, चूर्ण, रस आदि तथा यज्ञ-यागादि के लिए अपेक्षित तिल, धान्य आदि
अथवा अन्य यज्ञ-सामग्री—इन पदार्थों को अवश्य ही बेचना चाहिए। इसमें उसे
किसी प्रकार की लज्जा-संकोच आदि का अनुभव नहीं करना चाहिए।
अविक्रेयाणि विक्रीणन् ब्राह्मणः प्रच्युतः पथः ।
मार्गे पुनरवस्थाप्यो राज्ञा दण्डेन भूयसा ॥ 67 ॥
न बेचने योग्य वस्तुओं को लोभवश बेचने को प्रस्तुत ब्राह्मण अपने ब्राह्मणत्व
से पतित हो जाता है। राजा को ऐसे पथभ्रष्ट, आचार -च्युत ब्राह्मण को अपने वर्ण-
जाति एवं वृत्ति में पुनः प्रतिष्ठित करने के लिए यथोचित रूप से प्रचुर दण्ड देने में
भी संकोच नहीं करना चाहिए।
सामान्यतः ब्राह्मण राजा के दण्ड-विधान की परिधि से बाहर है, अर्थात् राजा
के लिए ब्राह्मण को दण्डित करना निषिद्ध है, परन्तु आचारभ्रष्ट ब्राह्मण ब्राह्मण ही
नहीं रहता। पतित, भ्रष्ट व्यक्ति तो शूद्र ही होता है, अतः ऐसे ब्राह्मण को राजा द्वारा
दण्ड देना शास्त्रसम्मत है। यह तो धर्म और न्याय की रक्षा करने के समान पवित्र
कार्य है।
प्रमाणानि प्रमाणस्थैः परिकल्प्यानि यत्नतः।
सौदन्ति हि प्रमेयाणि प्रमाणैरव्यवस्थितैः ॥ 68 ॥
पथभ्रष्ट ब्राह्मण को अनुशासित करने के लिए राजा द्वारा दण्ड देने के औचित्य
के सम्बन्ध में स्मृतिकार की मान्यता है कि यदि इस सम्बन्ध में शास्त्रीय प्रमाण
उपलब्ध न भी हो, तो भी ऐसा करने के लिए प्रमाणों की योजना कर लेनी चाहिए;
क्योंकि प्रमाणों के अभाव की दुहाई देकर अनुशासन और व्यवस्था की उपेक्षा
करना बुद्धिमत्तापूर्ण कार्य नहीं माना जाता। इससे व्यवस्था दूषित हो जाती है और
समाज को ग़लत संकेत मिलने लगते हैं। अतः औचित्य की स्थापना के लिए
प्रमाणों की उपेक्षा करना अथवा प्रमाणों के अभाव में सुधार का प्रयास न करना
बुद्धिमत्तापूर्ण कार्य नहीं।
लिखितं साक्षिणो भुक्तिः प्रमाणं त्रिविधं स्मृतम् ।
धनस्त्रीकरणे येन धनी धनमवाप्नुयात् ॥ 69 ॥
80 / नारदस्मृति