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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

Page 71 of 304

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को कर्तव्य-रूप से एवं तदर्थ-भाव से उसके ऋण का भुगतान करना पड़ता है।
धनस्त्रीहारिपुत्राणामृणभाग् यो धनं हरेत्।
पुत्रोऽसतोः स्त्रीधनिनोः स्त्रीहारी धनिपुत्रयोः ॥ 23 ॥
ऋणग्रस्त धनहीन व्यक्ति के मर जाने पर, यदि उसका पुत्र अपने पिता के
ऋण को चुकाने में अपने को असमर्थ पाकर अपने पिता के नाम-मात्र (थोड़े-
बहुत) रिक्थ को भी लेने से इनकार कर देता है, तो उस रिक्थ को लेने के लिए
आगे आने वाले व्यक्ति को ऋणशोधन करना चाहिए। यदि कोई भी ऋण चुकाने
और रिक्थ संभालने को उद्यत नहीं होता और उसकी विधवा स्त्री किसी दूसरे पुरुष
से विवाह कर लेती है, तो उस स्त्री का हरण अथवा वरण करने वाले पुरुष को
उसके पूर्वपति के ऋण को चुकाना होता है; क्योंकि यहां स्त्री ही रिक्थ है और
रिक्थ के साथ ऋणशोधन भी जुड़ा हुआ है।
अन्तिमा स्वैरिणीनां या उत्तमा च पुनर्भूवाम्।
ऋणं तयोः पतिकृतं दद्याद्यस्ते समश्नुते ॥ 24 ॥
स्त्री भले ही उत्तम कोटि की पुनर्भू-छोटी आयु में पति से वियुक्त अथवा
सन्तानहीन अथवा पति के परिवारजनों का दबाव अथवा पितृपक्ष में आत्मीयता का
अभाव-सौतेली मां, मां का न होना, भाई-बहिनों का न होना अथवा निर्धन होना
अथवा अपेक्षावृत्ति का होना-आदि कारणों से पुनर्विवाह के लिए उद्यत होने वाली
हो अथवा स्वैरिणी-प्रबल कामवासना के कारण पर-पुरुष की अपेक्षा रखने
वाली-हो, तो उससे विवाह करने वाले पुरुष को उसके पूर्वपति द्वारा उठाये ऋण
का भुगतान करना ही होता है।
भार्या स्नुषा च भृत्या च भार्यायाश्च परिग्रहः।
एतावद्भिश्चर्णं देयं भूमिं यश्चोपजीवति ॥ 25 ॥
परिवार के भरण-पोषण के अथवा परिवार पर आयी किसी विपत्ति-रोग,
मृत्यु, राजा का कोप (Police harassment) तथा विवाह आदि-के उद्धार के
लिए निम्नोक्त सभी सदस्यों द्वारा किसी धनिक से लिये गये ऋण का भुगतान
परिवार के मुखिया अथवा अभिभावक बने सदस्य अथवा सदस्यों को करना होता
है-(1) पत्नी, (2) पुत्रवधू तथा (3) गृहसेविका-वेतन पर कार्य करने वाली
तथा पत्नी पर आश्रित रहने वाली महिला-उसकी बहिन अथवा अन्य निकट
सम्बन्धिनी, जिसे उसने अपने घर में प्रश्रय दे रखा है।
यहां यह उल्लेखनीय है कि स्त्रियों को साधारण लेन-देन का ही अधिकार
है, अचल सम्पत्ति के सम्बन्ध में उनके द्वारा किया गया लेन-देन अवैध होता है।
स्त्रीकृतान्यप्रमाणानि कार्याण्याहुर्मनीषिणः।
विशेषतो गृहक्षेत्रदानाधमनविक्रया ॥ 26 ॥
नारदस्मृति / 69