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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

Page 77 of 304

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तथा द्यूत आदि व्यसनों में फंसे व्यक्ति को स्वभाव (प्रकृति) से परित्यक्त ही
समझना चाहिए। इस प्रकार के कारणों से स्वतन्त्र व्यक्ति भी स्वतन्त्र निर्णय लेने में
असमर्थ हो जाता है। इसी कारण उसके द्वारा किये गये कार्यों—दान, क्रय-विक्रय
तथा बन्धक आदि—को नशे में किये कार्यों के रूप में—असिद्ध ही मानना चाहिए—
भूतगृहीतो वा द्यूतादिव्यसनगृहीतो वा स्वभावप्रकृतिपरित्यक्तः। अनेन हेतुना
स्वतन्त्रोऽपि अस्वतन्त्रः सहेतुकः।
धनमूलाः क्रिया सर्वा यत्नस्तत्साधने मतः।
रक्षणं वर्धनं भोग इति तस्य विधिः क्रमात् ॥ 43 ॥
संसार के व्यक्तियों द्वारा किये जाने वाले सभी कार्यों का प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष
सम्बन्ध धन से है। धन ही वह केन्द्रबिन्दु है, जिसके चारों ओर सभी कार्य चक्कर
काटते रहते हैं। अतः सभी व्यक्तियों को धन की प्राप्ति के लिए उद्यम करना
चाहिए। इस उद्यम के तीन उपाय अथवा प्रकार हैं—प्रथम, उपार्जित धन की
सुरक्षा, द्वितीय, सुरक्षित धन का वर्द्धन करना और तृतीय, वर्द्धित धन का भोग,
अर्थात् सदुपयोग करना।
टिप्पणी—धर्मशास्त्र की मान्यता है कि धन के दो ही उपयोग हैं—दान तथा
भोग, अर्थात् स्वयं खाना अथवा दूसरों को खिलाना। इन दोनों कार्यों—स्वयं भी न
खाना और दूसरों को भी न खिलाना—में न आने वाले धन की तीसरी गति, उसका
नाश होना है।
दानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य।
यो न ददाति न भुंक्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति॥
अतः यहां धन के रक्षण और वर्द्धन के उपरान्त तीसरे स्थान पर उसके
यथोचित उपभोग का उल्लेख किया गया है।
तत्पुनस्त्रिविधं ज्ञेयं शुक्लं शबलमेव च।
कृष्णं च तस्य विज्ञेयः प्रभेदः सप्तधा पृथक् ॥ 44 ॥
धन के तीन प्रकार-भेद हैं—शुक्ल, शबल और कृष्ण। इन तीनों के पुनः
सात-सात भेद होते हैं।
श्रुतशौर्यतपः कन्याशिष्ययाज्यान्वयागतम्।
धनं सप्तविधं शुक्लमुद्योगस्तस्य तद्विधः ॥ 45 ॥

  1. विद्या (अध्यापन), 2. शौर्य (युद्ध, पौरुष), 3. कठोर श्रम (तपस्या),
  2. शिष्य (दक्षिणा-रूप में), 5.पौरोहित्य (यज्ञादि सम्पन्न कराने पर प्राप्त दान-
    दक्षिणा), 6. कन्या (कन्या के विवाह के बदले प्राप्त) तथा 7. दाय भाग (उत्तराधिकार
    में प्राप्त पैतृक सम्पत्ति) आदि सात प्रकार के धन शुक्ल (White Money) कहलाते
    हैं। इन साधनों से धन की प्राप्ति के लिए किया जाने वाला उद्योग भी सात्त्विक होता
    नारदस्मृति / 75