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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

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करे। उदाहरणार्थ, यदि पिता की मृत्यु के उपरान्त ज्येष्ठ पुत्र पिता का उत्तराधिकारी
बनता है, तो ऋण चुकाने का दायित्व भी उसी का बनता है और यदि वह किसी
असाध्य रोग से ग्रस्त है, विदेश में रहता है अथवा अन्य किसी कारण से अयोग्य
अथवा असमर्थ है और इस दायित्व को द्वितीय अथवा तृतीय स्थानीय पुत्र संभालता
है, तो पिता के ऋण का भुगतान उसे ही करना होता है।
अभिप्राय यह है कि अधमर्ण की मृत्यु के उपरान्त उत्तमर्ण को चिन्ता नहीं
करनी होती। वह अपने ऋण की वसूली अधमर्ण के पुत्रों से कर सकता है। पुत्र
अपने पिता के ऋण के भुगतान के लिए बाध्य हैं।
पितृव्येणाविभक्तेन भ्रात्रा वा यहृणं कृतम्।
मात्रा वा यत् कुटुम्बार्थे दद्युस्तद्रिक्थिनोऽखिलम् ॥ ३ ॥
संयुक्त परिवार के सदस्य के रूप में चाचा (पिता के भाई), भाई अथवा
माता द्वारा परिवार की किसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए लिये गये ऋण का
भुगतान परिवार की सम्पत्ति के सभी अंशभागियों के विभक्त होने पर उन्हें अनिवार्यतः
करना होता है।
अविभक्त (संयुक्त रूप से) रहने वाले भाइयों को साझा खाते से तथा विभक्त
भाइयों को अपने-अपने अंश के बराबर ऋण का भुगतान करना होता है।
क्रमाद्व्याहतं प्राप्तं पुत्रैर्ऋणमुद्धृतम्।
दद्युः पैतामहं पौत्रास्तच्चतुर्थान्निवर्तते ॥ ४ ॥
पितामह द्वारा लिये गये ऋण का भुगतान सर्वप्रथम तो सम्बद्ध व्यक्ति को
अपने जीवनकाल में ही करना चाहिए, परन्तु यदि असामान्य परिस्थितियों के
कारण वह ऐसा नहीं कर पाता, तो यह दायित्व उसके पुत्र को निभाना चाहिए। पुत्र
द्वारा ऋण को चुकता न कर पाने की स्थिति में यह दायित्व पोते पर आ पड़ता है।
उसे परिवार के भरण-पोषण के लिए पितामह द्वारा लिये ऋण का भुगतान करना
चाहिए। पोते द्वारा अपने जीवनकाल में दादा पर चढ़े ऋण का भुगतान न किये जाने
पर उत्तमर्ण प्रपौत्र-पोते के पुत्र-से ऋण वसूली का तकाज़ा नहीं कर सकता।
तीन पीढ़ियों-दादा, उसका पुत्र और उसका पौत्र-तक न वसूल किये गये ऋण
को बट्टे खाते में गया समझना चाहिए।
टिप्पणी-विष्णुस्मृतिकार ऋण की देनदारी चार पीढ़ियों तक मानते हैं;
क्योंकि उनके अनुसार पिता, पितामह और प्रपितामह को पिण्डदान तथा तर्पण
आदि किया जाता है। अतः प्रपौत्र तक पिता, दादा और परदादा के ऋण को उतारना
उचित है-मन्मते तु त्रयाणामुदकं कार्यं त्रिषु पिण्डः प्रवर्त्तते इति न्यायेन
पितृपितामहप्रपितामहेभ्यः पिण्डं दद्यात्, दद्यात् पिण्डं हरेद्धनमिति न्यायेन च
तेषां धनं प्राप्नुयात् अतः तत्कृतं ऋणं शोधयितुमर्हेदिति सिद्धम्।
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