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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

Page 68 of 304

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Page 68

कुटुम्ब की आवश्यकता के लिए ऋण लेने वाले व्यक्ति के मर जाने पर
अथवा विदेश चले जाने पर अथवा किसी रोगादि के कारण अथवा व्यापार आदि
में घाटा आ जाने के कारण असमर्थ असहाय हो जाने पर अविभक्त अथवा विभक्त
हो गये जाति बन्धुओं—सगे भाइयों अथवा चचेरे भाइयों—को उत्तमर्ण को उसके
धन का भुगतान करना ही होता है।
अभिप्राय यह है कि परिवार की पैतृक सम्पत्ति के उत्तराधिकारियों पर देय
ऋण आदि को चुकाने का दायित्व है।
यहां यह उल्लेखनीय है कि उत्तराधिकार में भले ही कुछ न मिला हो, फिर
भी ऋण के भुगतान का दायित्व उत्तराधिकारियों का ही होता है; क्योंकि यदि
सम्पत्ति होती, तो उस पर उनका ही अधिकार होता। यदि नहीं है, तो उनका भाग्य।
इस 'नहीं' के कारण वे अपने दायित्व से मुक्त नहीं हो सकते।
नार्वाक् संवत्सराद् विंशात् पितरि प्रेषिते सुतः।
ऋणं दद्यात् पितृव्ये वा ज्येष्ठे भ्रातर्यथापि वा॥ 14॥
पिता, चाचा तथा ज्येष्ठ भ्राता द्वारा ऋण लेने के उपरान्त विदेश चले जाने पर
अथवा अपहृत हो जाने पर अथवा गिरफ़्तारी आदि से बचने आदि किसी कारणवश
छिप जाने पर, बीस वर्षों के बीतने के उपरान्त, अर्थात् बीस वर्षों तक उनका पता
न लगने के बाद ही पुत्र पर उस ऋण के भुगतान का दायित्व आता है।
अभिप्राय यह है कि बीस वर्षों तक ऋणदाता अपने ऋण की वसूली के लिए
ऋणकर्ता के पुत्र पर दबाव नहीं डाल सकता। हां, बीस वर्षों की प्रतीक्षा के उपरान्त
भी ऋणकर्ता की खोज-ख़बर न मिलने पर पिता, चाचा और ज्येष्ठ भ्राता द्वारा
पारिवारिक आवश्यकता के लिए उठाये गये ऋण की मांग उनके पुत्र से की जा
सकती है।
दाप्यः परर्णमेकोऽपि जीवत्स्ववियुतैः कृतम्।
प्रेतेषु न तु तत्पुत्रः परर्णं दातुमर्हति ॥ 15 ॥
अविभक्त अथवा संयुक्त परिवार में ऋण लेने के उपरान्त संयोगवश एक
एक करके, अनेक अथवा सभी असम्बद्ध व्यक्तियों के मृत्युग्रस्त हो जाने पर
अवशिष्ट जीवित व्यक्ति को समूचे ऋण का परिशोधन करना पड़ता है। हां, ऋण का
भुगतान किये बिना उसके भी मर जाने पर, उसके पुत्र को अपने भाग के अनुसार—
यदि पिता के चार पुत्र थे और तीन पहले ही मर चुके थे और अब ऋण के भुगतान
का दायित्व एकमात्र जीवित चतुर्थ पुत्र पर था, जो दुर्भाग्यवश ऋण चुकाये बिना ही
मर गया, तो अब उसके पुत्र/पुत्रों को ऋण के चतुर्थांश का ही भुगतान करना होगा।
इसी प्रकार पुत्रों की संख्या के अनुपात में ही पुत्रों के पुत्रों पर आंशिक भुगतान का
दायित्व आयेगा—ही ऋण का अंश देना होगा।
66 / नारदस्मृति