Skip to content
SarvaKosh
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

Page 76 of 304

Read in context
Page 76

कामक्रोधाभिभूतार्तभयव्यसनपीडिताः ।
रागद्वेषपरीताश्च श्रेयास्त्वप्रकृतिं गताः ॥ 40 ॥
निम्नोक्त स्थितियों के प्राणियों को अस्वस्थ और उनके द्वारा किये गये व्यवहार
को भी अप्रामाणिक एवं असिद्ध मानना चाहिए—(1) काम और क्रोध से अभिभूत,
(2) आर्त-संकटग्रस्त, (3) भयग्रस्त, (4) व्यसन-पीडित तथा (5) राग द्वेष में
आसक्त।
ऐसे प्राणी व्यवहार में अपने विवेक का प्रयोग-उपयोग नहीं कर पाते। वे
भावना एवं आवेश के वशीभूत होकर ग़लत-सही का निर्णय नहीं कर सकते। यही
कारण है कि क़ानून इनके व्यवहार को मान्यता नहीं देता।
स्वतन्त्रोऽपि हि यत्कार्यं कुर्यादप्रकृतिं गतः ।
अकृतं तदपि प्राहुरस्वातन्त्र्यस्य हेतुतः ॥ 41 ॥
स्वतन्त्र, अर्थात् सभी प्रकार के व्यवहार करने में सक्षम एवं पूर्ण अधिकार-
सम्पन्न व्यक्ति के भी प्रकृतिस्थ न रहने की स्थिति में किये गये व्यवहार को अकृत
ही समझना चाहिए; क्योंकि मदिरा, द्यूत तथा दारागमन आदि दुर्व्यसनों के अधीन
व्यक्ति कभी स्वतन्त्र एवं विवेक से कार्य करने वाला हो ही नहीं सकता।
अभिप्राय यह है कि व्यक्ति वयस्क और अपनी सम्पत्ति का सार्वभौम स्वामी
होने के नाते लेन-देन करने को स्वतन्त्र एवं समर्थ अवश्य होता है, परन्तु यदि
उसने मदिरापान कर रखा है अथवा द्यूत-क्रीड़ा तथा व्यभिचार आदि व्यसनों का
शिकार है, तो निश्चित है कि अपने दुर्व्यसनों में ग्रस्त ऐसा व्यक्ति अपनी सम्पत्ति
को औने-पौने दामों में भी बेचने को विवश हो जायेगा; क्योंकि उत्कट वासना-
पूर्ति की इच्छा ने उस पर अधिकार कर रखा है और उसकी सद्बुद्धि एवं विवेक-
शक्ति को कुण्ठित कर दिया है। अतः ऐसे व्यक्ति द्वारा किये गये व्यवहार को
निरस्त मानना सर्वथा उचित ही है।
कुले ज्येष्ठस्तथा श्रेष्ठः प्रकृतिस्थश्च यो भवेत् ।
तत्कृतं तु कृतं प्राहुर्वा स्वतन्त्रकृतं कृतम् ॥ 42 ॥
वास्तव में परिवार में आयु की दृष्टि से ज्येष्ठ तथा गुण, विद्या एवं आचार की
दृष्टि से श्रेष्ठ होने के अतिरिक्त पूर्ण स्वस्थ, अर्थात् मदिरा आदि के नशे से मुक्त तथा
किसी विषय-वासना एवं व्यसन आदि के वश में न रहने वाले, पूर्ण स्वतन्त्र व्यक्ति
द्वारा सम्पन्न किया गया व्यवहार ही सिद्ध एवं प्रामाणिक होता है। परतन्त्र--मदिरा
के नशे में धुत, उद्दाम वासना से पीड़ित, द्यूत में हारा और खेलने के लिए उन्मत्त-
व्यक्ति तो कभी सही निर्णय ले ही नहीं सकता। इस प्रकार व्यसनों के दास द्वारा
गया किया कार्य अप्रामाणिक ही होता है।
टिप्पणी—असहाय भाष्यकार के अनुसार भूत-प्रेतादि का शिकार बने,
74 / नारदस्मृति