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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

Page 80 of 304

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  1. पशु-पालन-दूध, दही, मक्खन, घी आदि की बिक्री-से प्राप्त धन तथा
  2. व्यापार से अर्जित लाभ।
    इसी प्रकार तीनों वर्णों के लोगों द्वारा अपनी प्रसन्नता से शूद्र को दिया गया
    धन भी शुद्ध होता है।
    सर्वेषामेव वर्णानामेव धर्म्यो धनागमः।
    विपर्ययादधर्म्यः स्यान्न चेदापद् गरीयसी ॥ 55 ॥
    सभी वर्णों के लोगों द्वारा धर्मसम्मत साधनों से अर्जित धन को शुक्ल धन
    समझना चाहिए। धर्म विरुद्ध साधनों से अर्जित धन ही काला धन है। आपत्काल
    को छोड़कर कभी अनुचित साधनों से धन के अर्जन की नहीं सोचना चाहिए।
    आपत्ति में जीवन की रक्षा का प्रश्न प्रमुख हो जाता है, अतः उस समय की छूट को
    अपवाद ही समझना चाहिए।
    आपत्स्वनन्तरा वृत्तिर्ब्राह्मणस्य विधीयते।
    वैश्यवृत्तिस्ततश्चोक्ता न जघन्या कथञ्चन ॥ 56 ॥
    आपत्काल में ब्राह्मण को अपनी वृत्ति से निर्वाह न होने पर क्षत्रियों द्वारा
    अपनायी जाने वाली वृत्ति को और उससे भी निर्वाह सम्भव न होने पर वैश्यवृत्तियों
    को अपनाना चाहिए, परन्तु किसी भी स्थिति में शूद्रवृत्ति को कभी नहीं अपनाना
    चाहिए; क्योंकि ब्राह्मण के लिए शूद्रवृत्ति अत्यन्त निकृष्ट है।
    न कथञ्चन कुर्वीत ब्राह्मणः कर्म वार्षलम्।
    वृषलः कर्म न ब्राह्मं पतनीये हि ते तयोः ॥ 57 ॥
    जिस प्रकार ब्राह्मण के लिए शूद्रकर्म सर्वथा वर्जनीय है, उसी प्रकार शूद्र के
    लिए ब्राह्मणवृत्ति भी सर्वथा अनुचित है। इन दोनों के लिए एक-दूसरे की वृत्ति को
    अपनाना दोनों के पतन का कारण बनता है।
    उत्कृष्टं चापकृष्टं च तयोः कर्म न विद्यते।
    मध्यमे कर्मणी हित्वा सर्वसाधारणे हि ते ॥ 58 ॥
    संकटकाल में शूद्र के लिए क्षत्रियवृत्ति को तथा ब्राह्मण के लिए वैश्यवृत्ति
    अपनाने को न तो उत्कृष्ट स्थिति कहा जा सकता है और न ही निकृष्ट स्थिति कहा
    जा सकता है; क्योंकि इससे नीचे उतरना तो किसी प्रकार उचित ही नहीं है, अर्थात्
    ब्राह्मण शूद्रवृत्ति को तो किसी भी रूप में नहीं अपना सकता और न ही शूद्र के लिए
    ब्राह्मणवृत्ति को अपनाना उचित है। अभिप्राय यह है कि पहले तो आवश्यकता
    पड़ने पर भी ब्राह्मण को क्षत्रियवृत्ति तक सीमित रहना चाहिए, परन्तु उतने से काम
    न चलने पर विवशता की स्थिति में वैश्यवृत्ति को अपनाना उचित है। इसी प्रकार
    शूद्र को प्रथम तो वैश्यवृत्ति और इससे काम न चलने पर क्षत्रियवृत्ति को अपनाना
    चाहिए। इस प्रकार ये दोनों स्थितियां-ब्राह्मण का वैश्यवृत्ति को अपनाना तथा शूद्र
    78 / नारदस्मृति