नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
by देवर्षि नारद
Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)
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Read in contextमनीषियों और विधिवेत्ताओं के अनुसार माता, पत्नी तथा पुत्री आदि स्त्रियों
को विशेषतः घर और क्षेत्र आदि के दान, विक्रय तथा बन्धक रखने का कोई
अधिकार नहीं है। इनके द्वारा इस प्रकार किये गये अनुबन्ध अवैध एवं अप्रामाणिक
हो जाते हैं।
अभिप्राय यह है कि नारी को केवल असामान्य स्थिति में और वह भी छोटे-
मोटे ऋण लेने की छूट है, अन्यथा उसे चल-अचल सम्पत्ति के साथ छेड़-छाड़
करने का कोई अधिकार नहीं है। उनके साथ किये गये सौदे निरस्त माने जाते हैं।
एतान्येव प्रमाणानि भर्त्ता यद्यनुमन्यते ।
पुत्रः पत्युरभावे च राजा च पतिपुत्रयोः ॥ 27 ॥
पति की अथवा पति के अभाव में पुत्र की और दोनों के अभाव में राजा
(शासन) की अनुमति प्राप्त होने पर स्त्रियों द्वारा सम्पत्ति के क्रय-विक्रय सम्बन्धी
किये गये सौदे वैध एवं प्रामाणिक माने जाते हैं।
अभिप्राय यह है कि विदेश में होने के कारण अथवा चिकित्सालय में प्रविष्ट
होने के कारण अथवा अन्य किसी कारणवश पति अथवा पुत्र लेन-देन के लिए
सभा में उपस्थित नहीं हो सकते और पत्नी या माता को अधिकृत कर देते हैं
(Power of Attorny दे देते हैं), तो स्त्री द्वारा किये गये सौदे उसके पति-पुत्र द्वारा
किये गये माने जायेंगे, इस प्रकार उनकी वैधता अक्षुण्ण होगी। इसी प्रकार पति-
पुत्रविहीना स्त्री द्वारा प्रशासन से हरी झण्डी (Clearance) लेने के उपरान्त ही किये
गये सौदे मान्य होते हैं।
भर्त्रा प्रीतेन यद्दत्तं स्त्रियै तस्मिन् मृतेऽपि तत् ।
सा यथाकाममश्नीयाद्दद्याद्वा स्थावरादृते ॥ 28 ॥
पति ने प्रसन्न होकर स्वेच्छा से जो कुछ अपनी पत्नी को दे दिया है, पति की
मृत्यु के उपरान्त भी पतिप्रदत्त उस सम्पत्ति पर पत्नी का अधिकार अक्षुण्ण बना
रहता है, उसे कोई छीन नहीं सकता। वह अचल सम्पत्ति को छोड़कर चल
सम्पत्ति-स्वर्ण, नक़दी, आभूषण, वस्त्र एवं सब प्रकार के सामान-का यथेष्ट
उपयोग करने को स्वतन्त्र है।
टिप्पणी - 'मदनरत्नम्' ग्रन्थकार के अनुसार-भर्तृ दत्तस्थावरोपभोगमात्र-
मेवस्त्रीभिर्मृताविभक्तपतिकाभिः कर्त्तव्यम्, न तु दानादिकमित्यर्थः । अर्थात्
पति द्वारा प्रीतिवश दी गयी स्थावर सम्पत्ति का उपयोग स्त्री पति के जीवनकाल में
तथा उसके मरणोपरान्त परिवार के सदस्यों के विभक्त अथवा अविभक्त रहते करने
को तो स्वतन्त्र है, परन्तु उसे किसी को वह सम्पत्ति दान में देने, बेचने अथवा
बन्धक रखने का कोई अधिकार नहीं है।
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