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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

by देवर्षि नारद

Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished304 pages

Page 73 of 304

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Page 73

यथा दासकृतं कार्यमकृतं परिचक्षते।
अन्यत्र स्वामिसन्देशान्न दासः प्रभुरात्मनः ॥ २९ ॥
स्त्रियों के समान ही दासों के द्वारा भी स्वामी द्वारा अनुमत कार्य को सम्पन्न
करने पर मान्यता है। स्वामी से अनुमति प्राप्त किये बिना स्वेच्छा से दास द्वारा किये
किसी भी कार्य का दायित्व स्वामी का नहीं होता। सेवक को सदैव यह स्मरण
रखना चाहिए कि वह सेवक है, स्वामी नहीं, अर्थात् उसे निर्णय लेने का कोई
अधिकार नहीं, उसका कर्तव्य कर्म तो केवल स्वामी के आदेश का पालन करना है।
सेवक के साथ व्यवहार करने वालों को भी सेवक की सीमा और उसके
कार्यक्षेत्र को ध्यान में रखना चाहिए, अन्यथा उनका दुखी होना स्वाभाविक ही है।
पुत्रेणापि कृतं कार्यं यत्स्यादच्छन्दतः पितुः।
तदप्यकृतमेवाहुर्दासः पुत्रश्च तत्समौ ॥ ३० ॥
दास के समान ही पिता के जीवित होने पर उसकी अनुमति के बिना पुत्र द्वारा
किया गया व्यवहार—लेन-देन—भी अप्रामाणिक हो जाता है; क्योंकि पुत्र सम्पत्ति
का स्वामी ही नहीं बना। स्वामित्व और अधिकार-पत्र (Power of Attorny) के
अभाव में किया गया व्यवहार तो वैध हो ही नहीं सकता।
अभिप्राय यह है कि पुत्र के साथ व्यवहार करने वालों का हित इसी में है कि
वे यह निश्चित कर लें कि विचारणीय सम्पत्ति पुत्र के स्वामित्व की अथवा पिता
द्वारा अनुमत है अथवा नहीं। इस तथ्य की निश्चित जानकारी प्राप्त किये बिना
सहसा व्यवहार करने वालों को प्रायः पछताना ही पड़ता है। स्मृतिकार के अनुसार
दास और पुत्र एक समान ही हैं। दोनों स्वामी नहीं, अपितु स्वामी अथवा पिता के
आदेश-वाहक हैं। अन्तर केवल इतना ही है कि सेवक वेतनभोगी है और पुत्र
दाय-भागी है। मूल अधिकार तो पिता के पास सुरक्षित है।
अप्राप्तव्यवहारश्चेत् स्वतन्त्रोऽपि हि नर्णभाक्।
स्वातन्त्र्यं हि स्मृतं ज्येष्ठे ज्यैष्ठ्यं गुणवयः कृतम् ॥ ३१ ॥
पिता की मृत्यु हो जाने पर भी अवयस्क व्यवहार करने में अकुशल पुत्र को
परिवार की सम्पत्ति को बन्धक रखने का और उस पर ऋण लेने का अधिकार नहीं,
बेचने का तो प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता। हां, इस स्थिति में ज्येष्ठ पुत्र को अवश्य
यह सब करने—आवश्यकता के अनुसार सम्पत्ति को बेचने अथवा बन्धक रखने—
का अधिकार है, परन्तु ज्येष्ठता के दो आधार हैं—आयु तथा गुण।
गुण को ज्येष्ठता का आधार मानने का अर्थ है कि यदि ज्येष्ठ भ्राता ज्येष्ठ तो है,
परन्तु श्रेष्ठ नहीं, अर्थात् अग्रज होने पर भी द्वितीय अथवा तृतीय भाई (अनुज) से
बुद्धि में पिछड़ा हुआ है, तो पैतृक सम्पत्ति के हस्तान्तरण का अधिकार गुणहीन से
छिनकर गुणवान् के पास चला जायेगा। हां, बौद्धिक उत्कर्ष में समानता होने पर
आयु को गौरव मिलेगा।
नारदस्मृति / 71