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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)

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DevanagariHindipublished178 pages

About this granth

Prem Darshan (प्रेम-दर्शन) is Hanuman Prasad Poddar's detailed Hindi commentary on the Narada Bhakti Sutra. The sutra, a short text of eighty-four aphorisms attributed to the sage Narada, defines bhakti as supreme love for God ("sa tvasmin paramapremarupa"). Poddar (1892–1971), known as Bhaiji, was the founding editor of the magazine Kalyan and a central figure of the Gita Press.

The commentary groups the sutras into four sections: the nature and marks of supreme devotion; the means to devotion, giving up ego and the value of holy company; the indescribable nature of loving devotion and the difference between secondary and primary bhakti; and the eleven forms of attachment to God and the pre-eminence of bhakti. Opening essays introduce Narada, the nature of devotion as love, and single-minded love, and Poddar draws often on the gopis and the saints to illustrate the sutras.

This is the Gita Press, Gorakhpur edition; the copy records its fortieth reprint in Samvat 2077. At about 178 pages, it is an accessible guide for readers on the path of devotion.

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१०६ प्रेम-दर्शन
निश्चय करके भगवान्‌के अनन्य स्मरणका अभ्यास किसी भी
अवस्थामें बालक, वृद्ध, युवा, स्त्री, पुरुष, ब्राह्मण, शूद्र कोई भी
कर सकता है। इसमें न कुछ छोड़ना है और न ग्रहण करना है।
सदा सबपर भगवत्कृपा होनेपर भी हमें जो विश्वास नहीं है, बस,
उस विश्वासको स्थिर कर लेना है। फिर भक्तिकी प्राप्तिके सभी
साधन अपने-आप सहज ही सिद्ध हो जायेंगे—(‘तस्याहं सुलभः
पार्थ’—गीता ८।१४)। भक्ति किसी और साधनसे नहीं मिलती,
यह भजनसे ही मिलती है।
प्रमाणान्तरस्यानपेक्षत्वात् स्वयंप्रमाणत्वात् ॥ ५९ ॥
५९-क्योंकि भक्ति स्वयं प्रमाणरूप है, इसके लिये अन्य
प्रमाणकी आवश्यकता नहीं है।
भक्तिके मार्गपर चलनेवाले पुरुषोंको भक्तिसुखका प्रमाण
अपने-आप ही मिलता रहता है। उन्हें स्वयमेव अनुभव होता
रहता है, दूसरे किसी प्रमाणकी इसमें आवश्यकता नहीं है।
पतिसुखके आनन्दका अनुभव भार्या बननेपर ही मिल सकता है;
यह कुमारी कन्याको समझानेकी बात नहीं है। इसी प्रकार
भक्तिसुखका अनुभव भक्तोंको ही होता है, यह कहकर बतलानेकी
बात नहीं है। जो पुण्यात्मा महानुभाव सब कामनाओंका त्याग कर
एकमात्र भगवत्प्रेमकी कामनासे ही भगवत्कृपाका आश्रय लेकर
भगवान्‌का सदा-सर्वदा प्रेमपूर्वक पुलकित चित्तसे भजन करते हैं
वे ही भक्तिसुखका अनुभव करते हैं।
शान्तिरूपात्परमानन्दरूपाच्च ॥ ६० ॥
६०-भक्ति शान्तिरूपा और परमानन्दरूपा है।
शान्ति और परम आनन्द साक्षात् भगवान्‌का स्वरूप है। अपने
प्रेमरूपमें स्वयं भगवान् ही अवतीर्ण होते हैं, इसलिये यह भगवत्प्रेम
भी शान्ति और परमानन्दस्वरूप ही है। आनन्दमय भगवान् स्वयं ही

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भक्तिकी सुलभता और महत्ता १०७
अपनी ह्लादिनी नाम्नी आनन्दशक्तिको निमित्त बनाकर प्रेम और
प्रेमिकाके रूपमें प्रकट होते हैं और स्वयं ही प्रेमास्पद बनकर अपने
आनन्दका आप ही उपभोग करते हैं। यही उनकी आनन्दलीला है।
यहाँपर यह समझ लेना चाहिये कि जिन भगवान्की भक्ति या प्रेम
शान्तिरूप और परमानन्दरूप है, वे भगवान् निर्गुणवादियोंद्वारा माने
हुए प्रकृतिसम्भव सत्त्व, रज, तमरूप त्रिगुणोंसे युक्त ‘सगुण ब्रह्म’
नहीं हैं। भगवान्का दिव्य तनु उनके अपने आनन्दांश, अपनी योगमायाके
निमित्तसे नित्य ही प्रकट है। इसीलिये आत्माराम, मुनि, जीवन्मुक्त
महापुरुष, व्यास, नारद, शुकदेव, जनक, सनकादि महात्मा उनके
एक-एक दिव्य गुण, दिव्य आभूषण, दिव्य गन्ध, दिव्य मुरली-
ध्वनि और दिव्य सौन्दर्यपर मुग्ध हो जाते हैं। यदि भगवान्में इस
जगत्-प्रसविनी, आवरण करनेवाली मलिना मायाके ही गुणोंका
विकास होता, या इसीसे निर्मित उनका शरीर होता तो मायाकी
ग्रन्थिको काटे हुए ब्रह्मस्वरूप महात्माओंका उनकी ओर इतना
आकर्षण कभी नहीं होता। निर्गुणवादी जिस भगवत्स्वरूपको शुद्ध
सच्चिदानन्दघन ब्रह्म कहते हैं और वेद जिसे ‘नेति-नेति’ कहकर
संकेतसे समझाना चाहते हैं, वही मायातीत विज्ञानानन्दघन परमात्मा
भक्तोंके प्रियतम भगवान् हैं। उनको शान्ति और आनन्दके समुद्र
कहनेसे भी उनका यथार्थ वर्णन नहीं होता। उनका जो प्रेम है, वही
परम शान्ति और परमानन्दस्वरूप है। इसी प्रेमका वर्णन देवर्षि
नारदजी इस सूत्रमें कर रहे हैं।
☐ ☐

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भक्तिके साधन और अन्तराय
लोकहानौ चिन्ता न कार्या निवेदितात्मलोकवेदत्वात्१ ॥ ६१ ॥
६१-लोकहानिकी चिन्ता ( भक्तको ) नहीं करनी चाहिये,
क्योंकि वह ( भक्त ) अपने-आपको और लौकिक, वैदिक
( सब प्रकारके ) कर्मोंको भगवान्‌के अर्पण कर चुका है।
भक्त सब कुछ भगवान्‌के अर्पण कर चुकता है, इसलिये
उनके सम्बन्धमें किसी प्रकारकी चिन्ता करनेकी उसे क्या
आवश्यकता है ? उसको तो केवल एक प्रियतम भगवान्‌के
चिन्तनकी ही चिन्ता रहनी चाहिये। स्त्री, पुत्र, धन, जन, मानादि
पदार्थ रहें या चले जायँ, उसे इनकी कोई परवा नहीं; क्योंकि
वह तो इन्हें पहले ही भगवान्‌के समर्पण करके सर्वथा अकिंचन
हो चुका है। फिर उसके पास इनकी चिन्ता करनेके लिये समय
और चिन्ता करनेवाला चित्त भी कहाँ है ? उसके चित्तको तो
एकमात्र चिन्ताहरण चिन्तामणिकी चिन्ताने चुरा लिया है। वे
चतुर चौरचूडामणि कभी उसके चित्तको वापस देना ही नहीं
चाहते, फिर वह चित्तके अभावमें किसी हानिकी चिन्ता ही कैसे
करे ? अतएव इस पथके पथिकको लोकहानिकी कोई चिन्ता
नहीं करनी चाहिये। उसे तो सबके सार अर्थ श्रीभगवान्‌का ही
चिन्तन करना चाहिये। और भक्तके हृदयमें ऐसा ही होता भी है।
न तदसिद्धौ२ लोकव्यवहारो हेयः किन्तु फलत्यागस्तत्-
साधनं च कार्यमेव ॥ ६२ ॥
१. पाठभेद 'लोकवेदशीलत्वात्' ।
२. पाठभेद 'तत्सद्धौ' है।

३. तृतीय प्रकरण: प्रेमाभक्ति की अनिर्वचनीयता एवं गौणी-मुख्या भेद (सूत्र ५१-७३)

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भक्तिके साधन और अन्तराय १०९
६२-(परन्तु) जबतक भक्तिमें सिद्धि न मिले तबतक
लोकव्यवहारका त्याग नहीं करना चाहिये, किन्तु फल त्यागकर
( निष्कामभावसे ) उस भक्तिका साधन करना चाहिये।
प्रेमकी प्राप्ति होनेपर लौकिक (और वैदिक) कर्म छूट
जाते हैं, जान-बूझकर उनका स्वरूपसे त्याग नहीं करना
पड़ता। समर्पणका अर्थ उनका मनसे समर्पण ही है। फिर
जब प्रेमकी उच्च दशा प्राप्त होती है तब विधि-निषेधके परे
पहुँच जानेके कारण ये सब कर्म स्वतः ही उसे विधिके
बन्धनसे मुक्त कर अलग हो जाते हैं। उस स्थितिका यही
नियम है। परन्तु जो जान-बूझकर प्रेमके नामपर शास्त्रविधिका
त्याग करता है, उसे भक्तिकी सिद्धि सहजमें नहीं होती।
इसलिये सूत्रकार कहते हैं कि लोकव्यवहारका त्याग जान-
बूझकर मत करो। फलकी कामना छोड़कर कर्म करते रहो।
निष्काम कर्म करनेवाला स्वयमेव ही लोकहानिकी चिन्तासे
छूट जाता है और उसके वे भगवत्प्रीत्यर्थ निष्कामभावसे
किये हुए लौकिक कर्म भक्तिकी प्राप्तिमें साधक बन
जाते हैं।
स्त्रीधननास्तिकवैरिचरित्रं* न श्रवणीयम् ॥ ६३ ॥
६३-स्त्री, धन, नास्तिक और वैरीका चरित्र नहीं सुनना
चाहिये।
६२ वें सूत्रमें लोकव्यवहारका त्याग नहीं करनेकी आज्ञा दी
गयी है, अतएव लोकव्यवहार तो करना चाहिये; परन्तु प्रेमपथके
पथिकको लोकव्यवहारमें भी स्त्री, धन, नास्तिक और शत्रुके
चरित्र-श्रवणसे तो बचना ही चाहिये।

  • पाठभेद 'स्त्रीधननास्तिकचरित्रं'।
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११० प्रेम-दर्शन
(१) जिसका मन स्त्रीकी चिन्तामें लग गया, वह भगवान्‌की
चिन्ता किसी प्रकार नहीं कर सकता। स्त्रीकी चिन्तासे कामकी
उत्पत्ति होती है और काम प्रेममार्गमें सबसे बड़ा बाधक है।
स्त्रीसम्बन्धी बातोंके सुनने, पढ़ने और देखनेसे ही स्त्रीचिन्तन
होता है। अतएव साधकको चाहिये कि स्त्रीसम्बन्धी बातचीत न
करे, स्त्रीसम्बन्धी बात या गान न सुने, स्त्रीसम्बन्धी चित्र न
देखे, स्त्रीसम्बन्धी पुस्तक या अन्य साहित्य न पढ़े, नाटक,
सिनेमा आदि न देखे, स्त्रीचरित्रपर कुछ भी आलोचना न
करे, स्त्रियोंके सम्बन्धमें लेखादि न लिखे, स्त्रियोंमें रहे नहीं
और स्त्रियोंसे अनावश्यक मिले नहीं। जो साधक गृहस्थ हों,
उन्हें अपनी विवाहिता पत्नीके सिवा यथासाध्य अन्य
स्त्रियोंसे मिलनेसे बचना चाहिये। स्त्रीसम्बन्धी चर्चा करना-
सुनना, चित्रादि देखना तो सभीके लिये हानिकारक है।
श्रीमद्भागवतमें तो कहा है—
न तथास्य भवेन्मोहो बन्धश्चान्यप्रसंगतः।
योषित्संगाद्यथा पुंसो यथा तत्संगिसंगतः॥
(३।३१।३५)
'स्त्रियोंके संगसे और स्त्रियोंका संग करनेवालोंके संगसे
मनुष्यको जैसा मोह और बन्धन प्राप्त होता है वैसा अन्य
किसीके भी संगसे नहीं होता।' आगे चलकर पंचम स्कन्धमें
स्त्रियासक्त पुरुषोंकी संगतिको 'नरकका द्वार' बतलाया है। जैसे
पुरुषोंके लिये स्त्रीका संग त्याज्य है, इसी प्रकार स्त्रियोंके लिये
भी पुरुषोंका संग सर्वथा त्याज्य है।
(२) धनके चिन्तनसे लोभकी उत्पत्ति होती है। जहाँ चित्तमें
धनका लोभ जागृत हुआ, वहीं न्यायान्यायकी बुद्धि मारी जाती
है और मनुष्य सत्पथको त्यागकर अन्यायके मार्गपर चलने लगता

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भक्तिके साधन और अन्तराय १११
है। अतएव धन और धनियोंकी भोग और गर्वभरी बातें नहीं
सुननी-देखनी चाहिये।
(३) जिनका ईश्वर और शास्त्रोंपर विश्वास नहीं है, वे
ही नास्तिक हैं। ईश्वरका अस्तित्व न माननेवाले नास्तिकोंके
समान जगत्के जीवोंका शत्रु शायद ही कोई है। 'इसमें क्या
रखा है? उसमें क्या है? ईश्वर केवल ढोंग है, किसने
ईश्वरको देखा है? आत्मा तो कल्पनामात्र है।' ऐसी बातें
बकनेवाले और ईश्वर तथा शास्त्रोंकी निन्दा करनेवाले कुतर्कियोंका
संग करने तथा उनके चरित्र सुननेसे ईश्वरमें अश्रद्धा पैदा
होती है और ईश्वरमें अश्रद्धाके समान पतनका साधन और
कोई-सा भी नहीं है। अतएव नास्तिकोंसे सदा बचना चाहिये।
(४) वास्तवमें भक्तके मन उसका कोई भी शत्रु नहीं है। जो
सब जगत्में अपने प्राणाराम परमात्माको व्याप्त देखता है, जो
जगत्को श्रीकृष्णमय देखता है, वह कैसे किसको अपना वैरी
मान सकता है। देवदेव श्रीमहादेवजीने कहा है—
उमा जे राम चरन रत बिगत काम मद क्रोध।
निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध॥
परन्तु जबतक भक्तिकी सिद्धि न हो, तबतक साधकको ऐसी
भावना करनी चाहिये और मन-ही-मन यह निश्चय करना
चाहिये कि सब कुछ मेरे प्रभुका ही स्वरूप है। ऐसी अवस्थामें
यदि कोई दूसरा मनुष्य भ्रमवश साधकसे द्वेष या वैर रखे तो
उसकी उन वैरसम्बन्धी बातोंको, जहाँतक हो, सुनना ही नहीं
चाहिये। क्योंकि उनके सुननेसे क्रोध उत्पन्न होनेकी सम्भावना
रहती है। अतएव अपनी ओरसे तो अपने न जीते हुए मनके
सिवा किसीको शत्रु माने ही नहीं और दूसरा कोई शत्रुता रखता
हो तो उसपर भी विचार न करे।

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११२ प्रेम-दर्शन
स्त्रीके चिन्तनसे काम, धनके चिन्तनसे लोभ, नास्तिकके
चिन्तनसे ईश्वरमें अविश्वास और वैरीके चिन्तनसे क्रोध
उत्पन्न होता है। अतएव इन चारोंके चरित्रोंको यथासाध्य
सुनना ही नहीं चाहिये।
अभिमानदम्भादिकं त्याज्यम् ॥ ६४ ॥
६४-अभिमान, दम्भ आदिका त्याग करना चाहिये।
इससेके पहले सूत्रमें स्त्री, धन, नास्तिक, वैरीका चरित्र
न सुननेका आदेश दिया गया है। परन्तु वैसा करके यह नहीं
मान लेना चाहिये कि मैं कामिनी-कांचनका त्यागी हूँ, मैं
परम आस्तिक हूँ, मैं अजातशत्रु हूँ। अभिमान सर्वथा पतनका
हेतु है। सम्पत्ति, सन्तति, शक्ति, स्वास्थ्य, विद्या, बुद्धि, कुल,
वर्ण, आश्रम, आचार, रूप, पद, पुरुषार्थ आदि किसी भी
वस्तुका अभिमान नहीं होना चाहिये। जो कुछ सद्वस्तु या
सद्गुण प्राप्त हों अथवा साधन ठीक चलता रहे तो उसमें
भगवान्‌की कृपाको ही कारण समझना चाहिये। अभिमानसे
बहुत बड़ी हानि होती है। अतएव अभिमानका सर्वथा त्याग
करना चाहिये। यहाँतक कि निरभिमानताके अभिमानको भी
छोड़ देना चाहिये। अभिमाननाशका एक उत्तम उपाय दीनता,
विनय और नम्रता है। नमनभक्तिसे भी अभिमानका नाश
होता है। इसी प्रकार दम्भका भी त्याग करना चाहिये।
अपनेमें जो गुण न हों, धनमानके लोभसे या स्वभावदोषसे
उन गुणोंको दिखानेकी चेष्टा करना; बाहरसे धर्मात्मा, भक्त,
त्यागी बननेका ढोंग करना दम्भ कहलाता है। दाम्भिक पुरुषका
साधनपथ बहुत बुरी तरहसे रुक जाता है। वह ऊपरसे अपना
कपटवेश बनाये रखनेमें ही अपनी समस्त विद्या, बुद्धि और
क्रियाकुशलताको समाप्त कर देता है। निरभिमानता और

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सरलता ये दो भक्तिके साधनमें परम सहायकरूप हैं और
अभिमान एवं दम्भ महान् बाधक। ये दोनों आसुरी सम्पदाके
दुर्गुण हैं। इनके साथ 'आदि' शब्द जोड़कर सूत्रकारने आसुरी
सम्पदाके* अन्यान्य दुर्गुणोंकी तरफ इशारा किया है। अतएव
सभी आसुरी दुर्गुणोंका त्याग करना चाहिये।

  • श्रीमद्भगवद्गीताके १६ वें अध्यायमें श्लोक ७ से २० तक श्रीभगवान्ने आसुरी
    सम्पत्तिका जो वर्णन किया है उसका भावार्थ इस प्रकार है—
    आसुरी मनुष्य धर्माधर्मविषयक प्रवृत्ति और निवृत्तिको नहीं जानते, इसलिये
    उनमें न पवित्रता है, न आचार है और न सत्य ही रहता है। वे आसुरी मनुष्य कहते
    हैं कि यह जगत् असत्य, अप्रतिष्ठ (धर्माधर्मव्यवस्थासे रहित), ईश्वररहित और
    अन्योन्यसम्भूत है अर्थात् स्त्री-पुरुष-मिथुनजनित है। इस जगत्का और कोई कारण
    नहीं, यह केवल स्त्री-पुरुषके कामजनित संयोगसे ही उत्पन्न है। वे सब अल्पबुद्धि
    मनुष्य इस प्रकारकी दृष्टिका आश्रय करके मलिनचित्त, उग्रकर्मा और अहितकारी
    होकर जगत्के विनाशके लिये ही जन्म ग्रहण करते हैं। वे दुष्पूरणीय (किसी प्रकारसे
    भी पूरी न हो ऐसी) कामनाओंका आश्रय करके दम्भ, अभिमान और मदके वशीभूत
    हो मोहवश असदाग्रह (इस षड्यन्त्रसे अमुक मनोरथ पूर्ण हो जायगा ऐसी वेदशास्त्रविरुद्ध
    दुराशा) स्वीकार कर अपवित्र व्रत (मद्यमांसादि तथा चोरी, झूठ, कपटादिद्वारा
    सम्पादित नरकादि-उत्पादक कुव्रतोंको) धारणकर शास्त्रविरुद्ध कर्मों—पापकर्मोंमें
    प्रवृत्त होते हैं। अन्तिम श्वासतक अपार विषयचिन्ताओंसे घिरे हुए वे 'कामोपभोग' ही
    परम पुरुषार्थ है, इस प्रकार स्थिर निश्चय करके सैकड़ों प्रकारकी आशाओंकी
    फाँसियोंसे बँधे हुए कामक्रोधपरायण होकर कामभोगके लिये अन्यायपूर्वक (चोरी,
    विश्वासघात आदिके द्वारा) धन संचय करनेकी चेष्टा करते हैं। आज मैंने यह पाया,
    यह मनोरथ भी पूरा होगा; यह धन मेरा है, फिर वह धन भी प्राप्त होगा। मैंने अमुक
    शत्रुको मार डाला; अब उन शत्रुओंको भी मारूँगा। मैं ईश्वर (के समान सर्वशक्तिमान्)-
    हूँ, मैं भोगी हूँ, मैं सिद्ध हूँ, मैं बलवान् हूँ, मैं सुखी हूँ, मैं धनी हूँ, मैं बड़े कुलवाला
    हूँ, मेरे समान और कौन है, मैं यज्ञ करूँगा, मैं (नाम, यश या स्वार्थके लिये) दान
    करूँगा, मैं मौज करूँगा—इस प्रकार अज्ञानसे मोहित होकर वे अनेकों विषयोंके
    चिन्तनमें लगे हुए विभ्रान्त चित्तवाले, मोहजालसे ढके हुए कामभोगमें आसक्त होकर
    महान् क्लेशदायक अपवित्र नरकोंमें पड़ते हैं। वे अभिमानी स्वयं अपनेको श्रेष्ठ समझते
    हैं (अपनेमें पूज्यबुद्धि रखते हैं), अकड़े रहते हैं, धन, मान और मदके नशेमें चूर हुए
    वे केवल दम्भपूर्वक लोगोंको धर्मात्मापनका स्वाँग दिखानेके लिये (ईश्वरप्रीत्यर्थ श्रद्धा-
    विश्वासपूर्वक नहीं) अविधिपूर्वक नाममात्रका यज्ञ करते हैं। अहंकार, बल, घमण्ड,
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११४ प्रेम-दर्शन
तदर्पिताखिलाचारः सन् कामक्रोधाभिमानादिकं तस्मिन्नेव
करणीयम् ॥ ६५॥
६५-सब आचार भगवान्‌के अर्पण कर चुकनेपर यदि
काम, क्रोध, अभिमानादि हों तो उन्हें भी उस (भगवान्)-के
प्रति ही करना चाहिये।
जब सब कुछ भगवान्‌के अर्पण कर दिया तो फिर काम,
क्रोधादिका अर्पण दूसरे किसको किया जाय। प्रियतम भगवान्
जैसे अपने प्रेमी भक्तके प्रेमके पात्र हैं, वैसे ही उसके काम,
क्रोधादिके पात्र भी वही हैं। दूसरा तो कोई उसके मन है ही नहीं,
तब इनका पात्र और कौन हो? इसका अर्थ यह नहीं कि
भगवान्‌के प्रेमी भक्तोंमें भी विषयी पुरुषों-जैसे ही काम, क्रोध,
अभिमान रहते हैं। आसुरी सम्पदाके दुर्गुणस्वरूप काम, क्रोध,
अभिमानादिके त्यागकी बात तो पहले ही कही जा चुकी है। फिर
प्रेमी भक्त महात्माओंमें यह दूषित काम कहाँ। उनमें विषयासक्ति,
हिंसा, द्वेष और क्रोध कहाँ। उन अमानियोंमें मानकी गन्ध भी
कहाँ। इनका तो उनमें बीज ही नहीं है। अपने सुखकी जब कोई
वासना ही नहीं, तब ये दोष कहाँसे आवें ? उन भक्तोंके जीवनका
उद्देश्य तो बस एक प्रियतमको सुखी करना ही है—‘कृष्णसुखैक-
तात्पर्य गोपीभाववर्य।’ उनके चित्तमें जगत्का संस्कार ही नहीं

क्रोधका आश्रय लिये हुए वे अपने तथा दूसरोंके शरीरमें (आत्मारूपसे) स्थित मुझ-
(भगवान्-) से द्वेष करते हैं और सत्यमार्गपर चलनेवाले साधुओंमें दोषारोपण करते हैं।
मैं उन मेरे द्वेषी, क्रूर, नराधम और पापी मनुष्योंको संसारमें बार-बार आसुरी योनियोंमें
ही पटकता हूँ। हे अर्जुन! वे मूर्ख इस प्रकार जन्म-जन्ममें बार-बार आसुरी योनिको
प्राप्त होकर मुझको (भगवान्‌को) न पाकर (मुझको पाना तो दूर रहा, मेरी प्राप्तिके
योग्य मनुष्य-शरीरको भी न पाकर) और भी नीची योनियोंको प्राप्त होते हैं।

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भक्तिके साधन और अन्तराय ११५
है; वे तो लज्जा, घृणा, कुल, शील, मान, देह, गेह, भोग, मोक्ष
सबकी सुधि भुलाकर केवल अपने प्रियतम भगवान्‌पर ही न्योछावर
हो चुके हैं। अतएव जैसे ये भक्त स्वयं दिव्य भाववाले होते
हैं, वैसे ही इनके काम, क्रोध, अभिमान भी दिव्य होते हैं।
इसीलिये परम विरागी जीवन्मुक्त मुनियोंने इस प्रकारके भगवत्-
रंग-रँगीले प्रेमियोंकी ऐसी लीलाएँ गाने और सुननेमें अपनेको
कृतार्थ माना है। जिनका चित्त सब ओरसे हट गया है, एकमात्र
भगवान् ही जिनकी कामनाकी वस्तु रह गये हैं, वे भक्त
अपने उन भगवान्‌के दर्शनकी कामनाके वेगसे पीड़ित होकर रो-
रोकर पुकारते हैं—
हे देव हे दयित हे भुवनैकबन्धो
हे कृष्ण हे चपल हे करुणैकसिन्धो।
हे नाथ हे रमण हे नयनाभिराम
हा हा कदा नु भवितासि पदं दृशोर्मे ॥
( श्रीकृष्णकर्णामृत)
'हे देव! हे प्रियतम! हे विश्वके एकमात्र बन्धु! हे हमारे
मनोंको अपनी ओर बरबस खींचनेवाले! हे चपल! हे करुणाके
एकमात्र सिन्धु! हे नाथ! हे रमण! हे नयनाभिराम! हा! हा! तुम
कब हमारे दृष्टिगोचर होओगे?'
श्रीकृष्णगतप्राणा श्रीरुक्मिणीजी कहती हैं—
श्रुत्वा गुणान् भुवनसुन्दर शृण्वतां ते
निर्विश्य कर्णविवरैर्हरतोऽङ्गतापम् ।
रूपं दृशां दृशिमतामखिलार्थलाभं
त्वय्यच्युताविशति चित्तमपत्रपं मे॥
का त्वा मुकुन्द महती कुलशीलरूप-
विद्यावयोद्रविणधामभिरात्मतुल्यम् ।

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११६ प्रेम-दर्शन
धीरा पतिं कुलवती न वृणीत कन्या
काले नृसिंह नरलोकमनोऽभिरामम्॥
यस्याङ्घ्रिपंकजरजःस्नपनं महान्तो
वाञ्छन्त्युमापतिरिवात्मतमोऽपहत्यै ।
यर्ह्यम्बुजाक्ष न लभेय भवत्प्रसादं
जह्यामसून् व्रतकृशाञ्छतजन्मभिः स्यात् ॥
(श्रीमद्भा० १०।५२।३७, ३८, ४३)
'हे अच्युत! हे त्रिभुवनसुन्दर! जो कानोंके द्वारा हृदयमें
प्रवेश करके सुननेवालोंके अंगतापको हरण कर लेते हैं, वे
आपके दिव्य गुण और जो नेत्रधारियोंकी दृष्टिका सबसे
परम लाभ है वह आपका दिव्य रूप, इनकी प्रशंसा सुनकर
मेरा चित्त सारी लोक-लाजको छोड़कर आपपर अत्यन्त
आसक्त हो गया है। हे मुकुन्द! कुल, शील, रूप, विद्या,
वय, द्रव्य और प्रभावमें आपके समान बस आप ही हैं। हे
पुरुषोत्तम! आप नरलोकके मनको मोहनेवाले हैं। हे पुरुषसिंह!
विवाहकाल (आपसे मिलनका अवसर) उपस्थित होनेपर ऐसी
(कौन प्रेमी भक्तरूपी) कुलवती, गुणवती और बुद्धिमती
कन्या है जो आपके साथ गँठजोड़ी करनेकी इच्छा न करेगी ?
हे कमललोचन! उमापति शंकरके समान महान् देव अपने
हृदयका तम दूर करनेके लिये आपकी जिस चरणधूलिमें
स्नान करनेकी प्रार्थना करते रहते हैं, यदि वह चरणधूलि
मुझे प्रसादरूपमें नहीं मिली तो यह निश्चय समझिये कि मैं
व्रतादिके द्वारा शरीरको सुखाकर इन व्याकुल प्राणोंको त्याग
दूँगी और ऐसे करते-करते कभी सौ जन्मोंमें तो आपका
प्रसाद मुझको प्राप्त होगा ही।'
भगवान् श्रीकृष्णकी पटरानियाँ द्रौपदीसे कहती हैं—

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भक्तिके साधन और अन्तराय ११७
न वयं साध्वि साम्राज्यं स्वाराज्यं भौज्यमप्युत।
वैराज्यं पारमेष्ठ्यं च आनन्त्यं वा हरेः पदम्॥
कामयामह एतस्य श्रीमत्पादरजः श्रियः।
कुचकुंकुमगन्धाढ्यं मूर्ध्ना वोढुं गदाभृतः ॥
(श्रीमद्भागवत १०।८३।४१-४२)
'हे साध्वी! हमें पृथ्विके साम्राज्य, इन्द्रके राज्य, भौज्यपद,
सिद्धियाँ, ब्रह्माके पद, मोक्ष या वैकुण्ठकी भी इच्छा नहीं है।
हम तो केवल यही चाहती हैं कि भगवान् श्रीकृष्णकी
कमलाकुच-कुंकुमकी सुगन्धसे युक्त चरणधूलिको ही सदा
अपने मस्तकोंपर लगाती रहें।' मुक्ति तो ऐसे भक्तोंके चरणोंपर
लोटा करती है—
यदि भवति मुकुन्दे भक्तिरानन्दसान्द्रा
विलुठति चरणाग्रे मोक्षसाम्राज्यलक्ष्मीः ॥
'जिसकी श्रीमुकुन्दके चरणोंमें परमानन्दरूपा भक्ति होती है,
मोक्षसाम्राज्यश्री उसके चरणोंमें लोटती हैं।'
आदर्श प्रेममयी भक्तशिरोमणि गोपियाँ प्रियतम भगवान्के
आँखोंसे ओझल हो जानेपर विलाप करती हुई कहती हैं—
विरचिताभयं वृष्णिधुर्य ते चरणमीयुषां संसृतेर्भयात्।
करसरोरुहं कान्त कामदं शिरसि धेहि नः श्रीकरग्रहम्॥
व्रजजनार्तिहन् वीर योषितां निजजनस्मयध्वंसनस्मित।
भज सखे भवत्किंकरीः स्म नो जलरुहाननं चारु दर्शय ॥
प्रणतकामदं पद्मजार्चितं धरणिमण्डनं ध्येयमापदि।
चरणपंकजं शन्तमं च ते रमण नः स्तनेष्वर्पयाधिहन् ॥
(श्रीमद्भागवत १०।३१।५-६, १३)
'हे यदुकुलशिरोमणि! जो लोग संसारके भयसे तुम्हारे
चरणोंकी शरण लेते हैं, तुम्हारे करसरोज उन्हें अभय देकर उनकी

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११८ प्रेम-दर्शन
अभिलाषाओंको पूर्ण करते हैं। हे प्रियतम ! अपने उन्हीं
करकमलोंको, जिनसे आपने लक्ष्मीका हाथ पकड़ा है, हमारे
सिरपर रखिये। हे व्रजवासियोंके दुःखोंको हरनेवाले वीर !
आपकी मन्द मधुर मुसकान भक्तोंके गर्वको हरनेवाली है। हे
सखे ! हम आपकी किंकरी हैं, कृपा करके हमें स्वीकार कीजिये
और अपना सुन्दर मुखकमल हमें दिखाइये। हे रमण ! हे
आर्तिनाशन ! तुम्हारे चरणारविन्द प्रणत जनोंकी कामना पूरी
करनेवाले हैं, लक्ष्मीजीके द्वारा सदा सेवित हैं, पृथ्वीके आभूषण
हैं, विपत्तिकालमें ध्यान करनेसे कल्याण करनेवाले हैं, हे
प्रियतम ! उन परम कल्याणमय सुशीतल चरणोंको हमारे तप्त
हृदयपर स्थापित कीजिये।'
इस प्रकार प्रेमी भक्त श्रीकृष्णके कामसे पीड़ित हुए
सदा उन्हींके लिये रोया करते हैं और उन्हें पुकारा करते हैं;
और आँखमिचौनीकी-सी लीला करनेवाले लीलाविहारी
भगवान् जब उनकी प्रेम-पुकार सुनकर त्रिभुवन-कमनीय,
योगिजनदुर्लभ, देवदेवप्रत्याशित, ऋषि-महर्षि-महापुरुषचित्ताकर्षक,
निखिलसौन्दर्यमाधुर्य-रसामृतसारभूत, आनन्दकन्द मदनमोहन
मन्मथमन्मथरूपमें मन्द-मन्द मुसकाते हुए और मुरलीमें अपना
दिव्य मोहन सुर भरते हुए सहसा प्रकट होकर अपनी
प्रेमानन्दरसमाधुरी चारों ओर बिखेर देते हैं, जब अपने
सौन्दर्यमाधुर्यसुधासुशीतल वदनविधुकी शुभ्र ज्योत्स्ना चारों ओर
छिटका देते हैं, तब वहाँ उन भाग्यवान् दिव्यचक्षु दिव्यभावापन्न
भक्त महात्माओंके चित्तोंकी क्या अवस्था होती है, इसका
वर्णन करनेकी शक्ति किसीमें भी नहीं है। यह अनिर्वचनीय
रहस्य है।
उस समय भक्तका अपना सब कुछ उनके चरणोंमें स्वयमेव

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भक्तिके साधन और अन्तराय १११
न्योछावर हो जाता है और वह आनन्दोल्लासमें मत्त होकर सारे
जगत्‌की परवा छोड़कर पुकार उठता है—
घर तजौं, बन तजौं, नागर नगर तजौं,
वंसीबट-तट तजौं, काहूपै न लजिहौं।
देह तजौं, गेह तजौं, नेह कहो कैसे तजौं,
आज राजकाज सब ऐसे साज सजिहौं॥
बावरो भयो है लोक बावरी कहत मोकौं,
बावरी कहेते मैं काहू ना बरजिहौं।
कहैया सुनैया तजौं, बाप और भैया तजौं,
दैया तजौं मैया! पै कन्हैया नाहिं तजिहौं॥
जीना और मरना तुम्हारे ही लिये होगा और तुम्हारे ही चरणोंमें
होगा। मेरे हृदयकी यही एकमात्र कामना है। जब सब कुछ न्योछावर
हो गया तो फिर मरनेके बाद शरीरके ये पाँचों भूत अलग-अलग
बिखरकर भी तुम्हारी ही सेवा करेंगे।
कहीं ये पंचभूत जब मुझे छोड़कर अलग हों तब प्रियतमकी
सेवासे हट न जायँ, इसीलिये विह्वलचित्तसे भक्त विधातासे प्रार्थना
करता है—
पंचत्वं तनुरेतु भूतनिवहाः स्वांशे विशन्तु स्फुटं
धातारं प्रणिपत्य हन्त शिरसा तत्रापि याचे वरम्।
तद्वापीषु पयस्तदीयमुकुरे ज्योतिस्तदीयांगन-
व्योम्नि व्योम तदीयवर्त्मनि धरा तत्तालबृन्तेऽनिलः॥
इसीका अनुवाद करते हुए एक कविने कहा है—
मरिबे डरौं न बिधिहिं बस, पंचभूत करि बास।
पी-बापी, मारग, मुकुर, बीजन, अँगन अकास॥
पाँचों तत्त्व तो अलग-अलग होंगे ही, हे प्रभो! आप इतना
कर दीजिये कि जलका भाग उस कुएँमें जाकर मिल जाय

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१२० प्रेम-दर्शन
जिसके जलको मेरे प्रियतम नहाने और पीनेके काममें लेते हों,
अग्नितत्त्व उस दर्पणमें जा मिले जिसमें प्रियतम अपना मुख
देखते हों, पृथ्वीतत्त्व उस मार्गमें मिल जाय जिस मार्गसे प्रियतम
आते-जाते हों, वायुतत्त्व उस भाग्यवान् पंखेमें जा मिले जिससे
प्रियतम हवा लेते हों और आकाशतत्त्व उस आँगनमें जाकर मिल
जाय जिसमें प्रियतम बैठते हों।
और जीव ? वह तो प्रभुके चरणोंसे कभी अलग हो ही नहीं
सकता। उसको तो वे अपने हृदयमें ही छिपा रखेंगे! यह है
भक्तोंके 'काम' का एक छोटा-सा दृश्य! अब उनका क्रोध
देखिये।
एक दिन श्रीकृष्णकी किसी खिझानेवाली चालसे श्रीराधाजी
खीझ गयीं, सखी समझाने लगीं तो वे क्रोधमें भरकर कहने
लगीं— तू उनका नाम भी मेरे सामने मत ले; उनकी तो
बात ही क्या है, मैं काले रंगकी चीजमात्रका त्याग कर
दूँगी। जीवनभर उनके विरहतापसे जलती रहूँगी, परन्तु उनसे
मिलूँगी नहीं।
मिलौं न तिनसों भूल, अब जौलौं जीवन जियौं।
सहौं बिरहको सूल, बरु ताकी ज्वाला जरौं॥
मैं अब अपने मन यह ठानी। उनके पंथ पिऊँ नहिं पानी॥
कबहुँ नैन न अंजन लाऊँ । मृगमद भूलि न अंग चढ़ाऊँ॥
सुनौं न स्त्रवननि अलि पिकबानी । नील जलज परसौ नहिं पानी ॥
जरा ध्यान देकर देखिये, इस खीझमें कितनी रीझ भरी है!
एक दिन लीलामयने भक्त सखाओंके प्रणयकोपका आनन्द
लूटनेके लिये खेलमें गड़बड़ मचाकर सखाओंको खिझा दिया।
सखाओंने मिलकर निश्चय किया कि इस नटखटको खेलसे
अलग कर दो। श्यामसुन्दरका वियोग तो क्षणभरके लिये भी

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भक्तिके साधन और अन्तराय १२१
सहनेको उनमेंसे एक भी तैयार नहीं था, क्योंकि उसे अलग
करते ही प्राण अलग हो जाते हैं; परन्तु ऊपरसे बात गाँठकर
उन्होंने कहा—'कृष्ण! तुम खुद ही गड़बड़ मचाते हो और
फिर तनकर रूठ जाते हो; हटो यहाँसे, हम तुम्हें अपने साथ
नहीं खेलने देंगे।' बस, जहाँ फटकार मिली कि प्राणधन
श्यामसुन्दर ढीले पड़ गये। लगे पैरों पड़ने और शपथ खा-
खाकर क्षमा माँगने। सूरदासजीने गाया है—
खेलनमें को काको गुस्सैयाँ।
हरि हारे जीते श्रीदामा, बरबस ही कत करत रुसैयाँ॥
जाति पाँति हमते बड़ नाहीं, ना हम बसत तुम्हारी छैयाँ।
अति अधिकार जनावत ताते, जाते अधिक तुम्हारे गैयाँ॥
रूठ करे ता सँग को खेलै, हा हा खात परत तब पैयाँ।
'सूरदास' प्रभु खेल्यो ही चाहें, दाँव दियो करि नंद दुहैयाँ॥
यह है उनका क्रोध।
अब रही मानकी बात, सो दूषणरहित मान तो इस
प्रेमाभक्तिका एक भूषण ही है। एक समय श्रीराधारानी रूठ गयीं,
मान कर बैठीं और सखियोंसे बोलीं—
सखि नँदलाल न आवन पावैं।
भीतर चरन धरन जिन दीजो, चाहे जिते ललचावैं॥
ऐसनको बिस्वास कहा री कपट बैन बतियावैं।
'नरायन' इक मेरे भवन तजि अनत चहे जहँ जावैं॥
भगवान् मनाते-मनाते थक गये और शेषमें बोले—
इतो श्रम नाहिंन तबहुँ भयो।
सुनु राधिका! जितो श्रम मोकौं ते यह मानु दयो॥
धरनीधर बिधि बेद उधारो, मधु सो सत्रु हयो।
द्विज नृप किए दुसह दुख मेटे, बलिको राज लयो॥

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१२२ प्रेम-दर्शन
तोर्यो धनुष सुयंबर कीनो, रावन अजित जयो।
अघ बक बच्छ अरिष्ट केसि मथि दावानल अँचयो ॥
तिय बपु धर्यो असुर सुर मोहे, को जग जो न द्रयो।
गुरुसुत मृतक ज्यायबे कारन सागर सोध लयो॥
जानौं नाहिं कहा या रसमें सहजहि होत नयो।
'सूरस्याम' बल तोहि मनावत मोहि सब बिसरि गयो ॥
धन्य तेरा मान! बड़े-बड़े काम किये, कहीं हार नहीं
मानी, कहीं थकावट नहीं प्रतीत हुई। आज तुझे मनानेमें मेरा
सारा बल बिला गया। यह भक्तोंकी और भगवान्‌की प्रणय-
लीला है—इस लीलामें राग, काम, क्रोध, मान सभी हैं;
परन्तु सभी दूसरे रूपमें हैं। सभी पवित्र प्रेमके नामान्तरमात्र
हैं, यहाँका यह सर्वधर्मत्याग ही परम धर्म है। यहाँकी अविधि
ही सर्वोपरि प्रेमकी विधि है।
यह तो हुई सिद्ध भक्तोंकी बात। भक्तिके साधनमें भी यदि
काम, क्रोध, लोभ कभी सतावें तो उनको भगवान्‌के प्रति ही
लगा देना चाहिये। जो बातें हमारे मार्गमें बाधक होती हैं, वे ही
भगवान्‌के प्रति प्रयुक्त होनेपर साधक बन जाती हैं। यह निश्चय
रखना चाहिये।
श्रीमद्भागवतमें परमहंसश्रेष्ठ श्रीशुकदेवजीके वचन हैं—
कामं क्रोधं भयं स्नेहमैक्यं सौहृदमेव च।
नित्यं हरौ विदधतो यान्ति तन्मयतां हि ते॥
(१०। २९। १५)
'काम, क्रोध, भय, स्नेह, तादात्म्य एवं मित्रता, सभी कुछ
जो श्रीहरिके प्रति ही करते हैं वे अवश्य ही भगवान्‌के साथ
तन्मय हो जाते हैं।'

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भक्तिके साधन और अन्तराय १२३
तीव्र काम उसी वस्तुके लिये उत्पन्न होता है जो सबसे
श्रेष्ठ हो, अखिल ऐश्वर्यमय हो, महान् माधुर्यसे पूर्ण हो,
सर्वांगसुन्दर हो, आनन्दमय हो; भगवान्में यह सब कुछ है।
यह सोचकर सदा-सर्वदा एकमात्र श्रीकृष्णमिलनकी कामनासे
पीड़ित रहे और यह कामवासना उत्तरोत्तर बढ़ती ही जाय।
प्रेमभरा क्रोध इस प्रकार करे कि 'तुम बड़े निठुर हो, इतना
पुकारनेपर भी नहीं आते; याद रखो अभी तो मैं पुकारता
हूँ—पीछे तुम्हें पीछे-पीछे भटकना पड़ेगा।' आठों पहर चिन्तनमें
लगे रहकर प्रेमभरा मान इस प्रकार करे कि 'मेरे पास तो
अटूट चिन्तन-धन है, मैं तुम्हारी कोई गरज नहीं रखता; तुम्हें
सौ बार गरज हो तो आना।' इत्यादि।
भगवान्के प्रति काम, क्रोध और अभिमान कैसे किया
जा सकता है, इसका एक और सुन्दर उदाहरण मातृपरायण
शिशु है। छोटे बच्चेको आप बहुमूल्य रत्न दीजिये, उसे
बढ़िया-बढ़िया चीजें खानेको दीजिये, उसका खूब सम्मान
कीजिये, उसका यश गाइये, उसे स्वर्ग-मोक्ष मिलनेकी बात
कहिये, वह माता और मातृस्तनोंको छोड़कर और कुछ भी
नहीं चाहता। चाहे क्या, वह और किसी वस्तुको जानता ही
नहीं, उसके लिये जाननेकी और चाहनेकी एकमात्र वस्तु माँ
है। माँके बदलेमें वह किसी वस्तुसे भी सन्तुष्ट नहीं हो
सकता। इसी प्रकार भक्तकी कामना केवल भगवान्के लिये
ही होनी चाहिये। एकमात्र भगवान् ही उसके काम्य होने
चाहिये।
बच्चा कुछ बड़ा हुआ; इधर-उधर कुछ चलने लगा, चलते-
चलते ठोकर खाकर गिर पड़ा, रोने लगा। बच्चेका रोना सुनकर

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१२४ प्रेम-दर्शन
माँ दौड़ी आयी। बच्चा खीझ गया; पड़ा स्वयं, परन्तु क्रोध
उसका मातापर हुआ। वह अपनी तोतली बोलीमें बार-बार
कहता है, तू मुझे अकेला छोड़ क्यों गयी ? फिर अभिमान करके
रूठ जाता है। कहता है, 'जा मैं तुझसे नहीं बोलूँगा। तेरी गोदी
नहीं आऊँगा।' माँ मनाती है, गोद लेना चाहती है, स्तन पिलाना
चाहती है, वह रोता हुआ आगे-आगे भागता है। वह ऐसा क्यों
करता है, इसीलिये कि वह स्वाभाविक ही मातापर अपना
अधिकार समझता है। माताको ही अपनी सब कुछ समझता है।
वह भूखा रहे तो माँका दोष, वह गिर जाय तो माँका अपराध,
वह सो न सके तो माताका अपराध और अपराधका दण्ड
खीझना और रूठना—क्रोध और अभिमान ! इसी प्रकार निर्भर
भक्त भी अपने भगवान्‌के प्रति काम, क्रोध और अभिमानादि
कर सकता है।
🔲 🔲

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प्रेमी भक्तोंकी महिमा
त्रिरूपभंगपूर्वकं नित्यदासनित्यकान्ताभजनात्मकं वा
प्रेमैव कार्यम्, प्रेमैव कार्यम्॥ ६६॥
६६-तीन (स्वामी, सेवक और सेवा) रूपोंको भंगकर
नित्य दासभक्तिसे या नित्य कान्ताभक्तिसे प्रेम ही करना
चाहिये, प्रेम ही करना चाहिये।
स्वामी, सेवक और सेवा; अथवा पति, पत्नी और पतिसेवा—
इन तीन-तीन रूपोंको मिटाकर नित्य दास्यभक्तिके द्वारा अथवा
कान्ताभक्तिके द्वारा भगवान्‌से प्रेम ही करना चाहिये। दास्यभाव
और कान्ताभाव इन दोनोंमें ही आगे चलकर भगवान्‌के साथ
तन्मयता हो जाती है। निष्कामभावसे शरीर, मन, वाणी, सब
कुछ स्वामीके अर्पण कर, एक अपने स्वामीको छोड़कर
जगत्‌में दूसरे किसीको भी न जानना—यह दास्यभक्तिका
आदर्श है। और पति ही मेरा तन, मन, धन, गति, मति,
आश्रय, जीवन, प्राण, धर्म, मोक्ष और भगवान् है; एक
पतिके सिवा अन्य कोई पुरुष ही जगत्‌में नहीं है; पतिका
धन मेरा धन, पतिका तन मेरा तन, पतिका मन मेरा मन,
पतिकी सेवा मेरी सेवा, पतिका ऐश्वर्य मेरा ऐश्वर्य, पतिका
मान मेरा मान, पतिका अपमान मेरा अपमान, पतिके प्राण
मेरे प्राण—इस प्रकार एकमात्र पतिपरायणा पतिगत-प्राणा होकर
निष्काम अनन्यभावसे निरन्तर सेवामें लगे रहना, यह कान्ताभक्तिका
आदर्श है। वास्तवमें दोनों एक ही हैं। दोनोंमें ही समता है।
दोनोंमें ही अभिन्नता है। दास्यभक्तिमें भी सेवक अपना सब
कुछ भुलाकर स्वामीके नाम-गोत्रवाला बन जाता है और
कान्ताभक्तिमें तो अपने नाम-गोत्रको पतिके नाम-गोत्रमें मिलानेपर