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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)

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DevanagariHindipublished178 pages

Page 108 of 178

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Page 108

१०६ प्रेम-दर्शन
निश्चय करके भगवान्‌के अनन्य स्मरणका अभ्यास किसी भी
अवस्थामें बालक, वृद्ध, युवा, स्त्री, पुरुष, ब्राह्मण, शूद्र कोई भी
कर सकता है। इसमें न कुछ छोड़ना है और न ग्रहण करना है।
सदा सबपर भगवत्कृपा होनेपर भी हमें जो विश्वास नहीं है, बस,
उस विश्वासको स्थिर कर लेना है। फिर भक्तिकी प्राप्तिके सभी
साधन अपने-आप सहज ही सिद्ध हो जायेंगे—(‘तस्याहं सुलभः
पार्थ’—गीता ८।१४)। भक्ति किसी और साधनसे नहीं मिलती,
यह भजनसे ही मिलती है।
प्रमाणान्तरस्यानपेक्षत्वात् स्वयंप्रमाणत्वात् ॥ ५९ ॥
५९-क्योंकि भक्ति स्वयं प्रमाणरूप है, इसके लिये अन्य
प्रमाणकी आवश्यकता नहीं है।
भक्तिके मार्गपर चलनेवाले पुरुषोंको भक्तिसुखका प्रमाण
अपने-आप ही मिलता रहता है। उन्हें स्वयमेव अनुभव होता
रहता है, दूसरे किसी प्रमाणकी इसमें आवश्यकता नहीं है।
पतिसुखके आनन्दका अनुभव भार्या बननेपर ही मिल सकता है;
यह कुमारी कन्याको समझानेकी बात नहीं है। इसी प्रकार
भक्तिसुखका अनुभव भक्तोंको ही होता है, यह कहकर बतलानेकी
बात नहीं है। जो पुण्यात्मा महानुभाव सब कामनाओंका त्याग कर
एकमात्र भगवत्प्रेमकी कामनासे ही भगवत्कृपाका आश्रय लेकर
भगवान्‌का सदा-सर्वदा प्रेमपूर्वक पुलकित चित्तसे भजन करते हैं
वे ही भक्तिसुखका अनुभव करते हैं।
शान्तिरूपात्परमानन्दरूपाच्च ॥ ६० ॥
६०-भक्ति शान्तिरूपा और परमानन्दरूपा है।
शान्ति और परम आनन्द साक्षात् भगवान्‌का स्वरूप है। अपने
प्रेमरूपमें स्वयं भगवान् ही अवतीर्ण होते हैं, इसलिये यह भगवत्प्रेम
भी शान्ति और परमानन्दस्वरूप ही है। आनन्दमय भगवान् स्वयं ही