प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
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तोर्यो धनुष सुयंबर कीनो, रावन अजित जयो।
अघ बक बच्छ अरिष्ट केसि मथि दावानल अँचयो ॥
तिय बपु धर्यो असुर सुर मोहे, को जग जो न द्रयो।
गुरुसुत मृतक ज्यायबे कारन सागर सोध लयो॥
जानौं नाहिं कहा या रसमें सहजहि होत नयो।
'सूरस्याम' बल तोहि मनावत मोहि सब बिसरि गयो ॥
धन्य तेरा मान! बड़े-बड़े काम किये, कहीं हार नहीं
मानी, कहीं थकावट नहीं प्रतीत हुई। आज तुझे मनानेमें मेरा
सारा बल बिला गया। यह भक्तोंकी और भगवान्की प्रणय-
लीला है—इस लीलामें राग, काम, क्रोध, मान सभी हैं;
परन्तु सभी दूसरे रूपमें हैं। सभी पवित्र प्रेमके नामान्तरमात्र
हैं, यहाँका यह सर्वधर्मत्याग ही परम धर्म है। यहाँकी अविधि
ही सर्वोपरि प्रेमकी विधि है।
यह तो हुई सिद्ध भक्तोंकी बात। भक्तिके साधनमें भी यदि
काम, क्रोध, लोभ कभी सतावें तो उनको भगवान्के प्रति ही
लगा देना चाहिये। जो बातें हमारे मार्गमें बाधक होती हैं, वे ही
भगवान्के प्रति प्रयुक्त होनेपर साधक बन जाती हैं। यह निश्चय
रखना चाहिये।
श्रीमद्भागवतमें परमहंसश्रेष्ठ श्रीशुकदेवजीके वचन हैं—
कामं क्रोधं भयं स्नेहमैक्यं सौहृदमेव च।
नित्यं हरौ विदधतो यान्ति तन्मयतां हि ते॥
(१०। २९। १५)
'काम, क्रोध, भय, स्नेह, तादात्म्य एवं मित्रता, सभी कुछ
जो श्रीहरिके प्रति ही करते हैं वे अवश्य ही भगवान्के साथ
तन्मय हो जाते हैं।'