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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)

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DevanagariHindipublished178 pages

Page 116 of 178

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Page 116

११४ प्रेम-दर्शन
तदर्पिताखिलाचारः सन् कामक्रोधाभिमानादिकं तस्मिन्नेव
करणीयम् ॥ ६५॥
६५-सब आचार भगवान्‌के अर्पण कर चुकनेपर यदि
काम, क्रोध, अभिमानादि हों तो उन्हें भी उस (भगवान्)-के
प्रति ही करना चाहिये।
जब सब कुछ भगवान्‌के अर्पण कर दिया तो फिर काम,
क्रोधादिका अर्पण दूसरे किसको किया जाय। प्रियतम भगवान्
जैसे अपने प्रेमी भक्तके प्रेमके पात्र हैं, वैसे ही उसके काम,
क्रोधादिके पात्र भी वही हैं। दूसरा तो कोई उसके मन है ही नहीं,
तब इनका पात्र और कौन हो? इसका अर्थ यह नहीं कि
भगवान्‌के प्रेमी भक्तोंमें भी विषयी पुरुषों-जैसे ही काम, क्रोध,
अभिमान रहते हैं। आसुरी सम्पदाके दुर्गुणस्वरूप काम, क्रोध,
अभिमानादिके त्यागकी बात तो पहले ही कही जा चुकी है। फिर
प्रेमी भक्त महात्माओंमें यह दूषित काम कहाँ। उनमें विषयासक्ति,
हिंसा, द्वेष और क्रोध कहाँ। उन अमानियोंमें मानकी गन्ध भी
कहाँ। इनका तो उनमें बीज ही नहीं है। अपने सुखकी जब कोई
वासना ही नहीं, तब ये दोष कहाँसे आवें ? उन भक्तोंके जीवनका
उद्देश्य तो बस एक प्रियतमको सुखी करना ही है—‘कृष्णसुखैक-
तात्पर्य गोपीभाववर्य।’ उनके चित्तमें जगत्का संस्कार ही नहीं

क्रोधका आश्रय लिये हुए वे अपने तथा दूसरोंके शरीरमें (आत्मारूपसे) स्थित मुझ-
(भगवान्-) से द्वेष करते हैं और सत्यमार्गपर चलनेवाले साधुओंमें दोषारोपण करते हैं।
मैं उन मेरे द्वेषी, क्रूर, नराधम और पापी मनुष्योंको संसारमें बार-बार आसुरी योनियोंमें
ही पटकता हूँ। हे अर्जुन! वे मूर्ख इस प्रकार जन्म-जन्ममें बार-बार आसुरी योनिको
प्राप्त होकर मुझको (भगवान्‌को) न पाकर (मुझको पाना तो दूर रहा, मेरी प्राप्तिके
योग्य मनुष्य-शरीरको भी न पाकर) और भी नीची योनियोंको प्राप्त होते हैं।