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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार) द्वारा

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DevanagariHindipublished178 पृष्ठ

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प्रेमी भक्तोंकी महिमा
त्रिरूपभंगपूर्वकं नित्यदासनित्यकान्ताभजनात्मकं वा
प्रेमैव कार्यम्, प्रेमैव कार्यम्॥ ६६॥
६६-तीन (स्वामी, सेवक और सेवा) रूपोंको भंगकर
नित्य दासभक्तिसे या नित्य कान्ताभक्तिसे प्रेम ही करना
चाहिये, प्रेम ही करना चाहिये।
स्वामी, सेवक और सेवा; अथवा पति, पत्नी और पतिसेवा—
इन तीन-तीन रूपोंको मिटाकर नित्य दास्यभक्तिके द्वारा अथवा
कान्ताभक्तिके द्वारा भगवान्‌से प्रेम ही करना चाहिये। दास्यभाव
और कान्ताभाव इन दोनोंमें ही आगे चलकर भगवान्‌के साथ
तन्मयता हो जाती है। निष्कामभावसे शरीर, मन, वाणी, सब
कुछ स्वामीके अर्पण कर, एक अपने स्वामीको छोड़कर
जगत्‌में दूसरे किसीको भी न जानना—यह दास्यभक्तिका
आदर्श है। और पति ही मेरा तन, मन, धन, गति, मति,
आश्रय, जीवन, प्राण, धर्म, मोक्ष और भगवान् है; एक
पतिके सिवा अन्य कोई पुरुष ही जगत्‌में नहीं है; पतिका
धन मेरा धन, पतिका तन मेरा तन, पतिका मन मेरा मन,
पतिकी सेवा मेरी सेवा, पतिका ऐश्वर्य मेरा ऐश्वर्य, पतिका
मान मेरा मान, पतिका अपमान मेरा अपमान, पतिके प्राण
मेरे प्राण—इस प्रकार एकमात्र पतिपरायणा पतिगत-प्राणा होकर
निष्काम अनन्यभावसे निरन्तर सेवामें लगे रहना, यह कान्ताभक्तिका
आदर्श है। वास्तवमें दोनों एक ही हैं। दोनोंमें ही समता है।
दोनोंमें ही अभिन्नता है। दास्यभक्तिमें भी सेवक अपना सब
कुछ भुलाकर स्वामीके नाम-गोत्रवाला बन जाता है और
कान्ताभक्तिमें तो अपने नाम-गोत्रको पतिके नाम-गोत्रमें मिलानेपर