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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)

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DevanagariHindipublished178 pages

Page 118 of 178

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Page 118

११६ प्रेम-दर्शन
धीरा पतिं कुलवती न वृणीत कन्या
काले नृसिंह नरलोकमनोऽभिरामम्॥
यस्याङ्घ्रिपंकजरजःस्नपनं महान्तो
वाञ्छन्त्युमापतिरिवात्मतमोऽपहत्यै ।
यर्ह्यम्बुजाक्ष न लभेय भवत्प्रसादं
जह्यामसून् व्रतकृशाञ्छतजन्मभिः स्यात् ॥
(श्रीमद्भा० १०।५२।३७, ३८, ४३)
'हे अच्युत! हे त्रिभुवनसुन्दर! जो कानोंके द्वारा हृदयमें
प्रवेश करके सुननेवालोंके अंगतापको हरण कर लेते हैं, वे
आपके दिव्य गुण और जो नेत्रधारियोंकी दृष्टिका सबसे
परम लाभ है वह आपका दिव्य रूप, इनकी प्रशंसा सुनकर
मेरा चित्त सारी लोक-लाजको छोड़कर आपपर अत्यन्त
आसक्त हो गया है। हे मुकुन्द! कुल, शील, रूप, विद्या,
वय, द्रव्य और प्रभावमें आपके समान बस आप ही हैं। हे
पुरुषोत्तम! आप नरलोकके मनको मोहनेवाले हैं। हे पुरुषसिंह!
विवाहकाल (आपसे मिलनका अवसर) उपस्थित होनेपर ऐसी
(कौन प्रेमी भक्तरूपी) कुलवती, गुणवती और बुद्धिमती
कन्या है जो आपके साथ गँठजोड़ी करनेकी इच्छा न करेगी ?
हे कमललोचन! उमापति शंकरके समान महान् देव अपने
हृदयका तम दूर करनेके लिये आपकी जिस चरणधूलिमें
स्नान करनेकी प्रार्थना करते रहते हैं, यदि वह चरणधूलि
मुझे प्रसादरूपमें नहीं मिली तो यह निश्चय समझिये कि मैं
व्रतादिके द्वारा शरीरको सुखाकर इन व्याकुल प्राणोंको त्याग
दूँगी और ऐसे करते-करते कभी सौ जन्मोंमें तो आपका
प्रसाद मुझको प्राप्त होगा ही।'
भगवान् श्रीकृष्णकी पटरानियाँ द्रौपदीसे कहती हैं—