प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
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स्त्रीके चिन्तनसे काम, धनके चिन्तनसे लोभ, नास्तिकके
चिन्तनसे ईश्वरमें अविश्वास और वैरीके चिन्तनसे क्रोध
उत्पन्न होता है। अतएव इन चारोंके चरित्रोंको यथासाध्य
सुनना ही नहीं चाहिये।
अभिमानदम्भादिकं त्याज्यम् ॥ ६४ ॥
६४-अभिमान, दम्भ आदिका त्याग करना चाहिये।
इससेके पहले सूत्रमें स्त्री, धन, नास्तिक, वैरीका चरित्र
न सुननेका आदेश दिया गया है। परन्तु वैसा करके यह नहीं
मान लेना चाहिये कि मैं कामिनी-कांचनका त्यागी हूँ, मैं
परम आस्तिक हूँ, मैं अजातशत्रु हूँ। अभिमान सर्वथा पतनका
हेतु है। सम्पत्ति, सन्तति, शक्ति, स्वास्थ्य, विद्या, बुद्धि, कुल,
वर्ण, आश्रम, आचार, रूप, पद, पुरुषार्थ आदि किसी भी
वस्तुका अभिमान नहीं होना चाहिये। जो कुछ सद्वस्तु या
सद्गुण प्राप्त हों अथवा साधन ठीक चलता रहे तो उसमें
भगवान्की कृपाको ही कारण समझना चाहिये। अभिमानसे
बहुत बड़ी हानि होती है। अतएव अभिमानका सर्वथा त्याग
करना चाहिये। यहाँतक कि निरभिमानताके अभिमानको भी
छोड़ देना चाहिये। अभिमाननाशका एक उत्तम उपाय दीनता,
विनय और नम्रता है। नमनभक्तिसे भी अभिमानका नाश
होता है। इसी प्रकार दम्भका भी त्याग करना चाहिये।
अपनेमें जो गुण न हों, धनमानके लोभसे या स्वभावदोषसे
उन गुणोंको दिखानेकी चेष्टा करना; बाहरसे धर्मात्मा, भक्त,
त्यागी बननेका ढोंग करना दम्भ कहलाता है। दाम्भिक पुरुषका
साधनपथ बहुत बुरी तरहसे रुक जाता है। वह ऊपरसे अपना
कपटवेश बनाये रखनेमें ही अपनी समस्त विद्या, बुद्धि और
क्रियाकुशलताको समाप्त कर देता है। निरभिमानता और