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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)

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DevanagariHindipublished178 pages

Page 112 of 178

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Page 112

११० प्रेम-दर्शन
(१) जिसका मन स्त्रीकी चिन्तामें लग गया, वह भगवान्‌की
चिन्ता किसी प्रकार नहीं कर सकता। स्त्रीकी चिन्तासे कामकी
उत्पत्ति होती है और काम प्रेममार्गमें सबसे बड़ा बाधक है।
स्त्रीसम्बन्धी बातोंके सुनने, पढ़ने और देखनेसे ही स्त्रीचिन्तन
होता है। अतएव साधकको चाहिये कि स्त्रीसम्बन्धी बातचीत न
करे, स्त्रीसम्बन्धी बात या गान न सुने, स्त्रीसम्बन्धी चित्र न
देखे, स्त्रीसम्बन्धी पुस्तक या अन्य साहित्य न पढ़े, नाटक,
सिनेमा आदि न देखे, स्त्रीचरित्रपर कुछ भी आलोचना न
करे, स्त्रियोंके सम्बन्धमें लेखादि न लिखे, स्त्रियोंमें रहे नहीं
और स्त्रियोंसे अनावश्यक मिले नहीं। जो साधक गृहस्थ हों,
उन्हें अपनी विवाहिता पत्नीके सिवा यथासाध्य अन्य
स्त्रियोंसे मिलनेसे बचना चाहिये। स्त्रीसम्बन्धी चर्चा करना-
सुनना, चित्रादि देखना तो सभीके लिये हानिकारक है।
श्रीमद्भागवतमें तो कहा है—
न तथास्य भवेन्मोहो बन्धश्चान्यप्रसंगतः।
योषित्संगाद्यथा पुंसो यथा तत्संगिसंगतः॥
(३।३१।३५)
'स्त्रियोंके संगसे और स्त्रियोंका संग करनेवालोंके संगसे
मनुष्यको जैसा मोह और बन्धन प्राप्त होता है वैसा अन्य
किसीके भी संगसे नहीं होता।' आगे चलकर पंचम स्कन्धमें
स्त्रियासक्त पुरुषोंकी संगतिको 'नरकका द्वार' बतलाया है। जैसे
पुरुषोंके लिये स्त्रीका संग त्याज्य है, इसी प्रकार स्त्रियोंके लिये
भी पुरुषोंका संग सर्वथा त्याज्य है।
(२) धनके चिन्तनसे लोभकी उत्पत्ति होती है। जहाँ चित्तमें
धनका लोभ जागृत हुआ, वहीं न्यायान्यायकी बुद्धि मारी जाती
है और मनुष्य सत्पथको त्यागकर अन्यायके मार्गपर चलने लगता