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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)

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DevanagariHindipublished178 pages

Page 122 of 178

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Page 122

१२० प्रेम-दर्शन
जिसके जलको मेरे प्रियतम नहाने और पीनेके काममें लेते हों,
अग्नितत्त्व उस दर्पणमें जा मिले जिसमें प्रियतम अपना मुख
देखते हों, पृथ्वीतत्त्व उस मार्गमें मिल जाय जिस मार्गसे प्रियतम
आते-जाते हों, वायुतत्त्व उस भाग्यवान् पंखेमें जा मिले जिससे
प्रियतम हवा लेते हों और आकाशतत्त्व उस आँगनमें जाकर मिल
जाय जिसमें प्रियतम बैठते हों।
और जीव ? वह तो प्रभुके चरणोंसे कभी अलग हो ही नहीं
सकता। उसको तो वे अपने हृदयमें ही छिपा रखेंगे! यह है
भक्तोंके 'काम' का एक छोटा-सा दृश्य! अब उनका क्रोध
देखिये।
एक दिन श्रीकृष्णकी किसी खिझानेवाली चालसे श्रीराधाजी
खीझ गयीं, सखी समझाने लगीं तो वे क्रोधमें भरकर कहने
लगीं— तू उनका नाम भी मेरे सामने मत ले; उनकी तो
बात ही क्या है, मैं काले रंगकी चीजमात्रका त्याग कर
दूँगी। जीवनभर उनके विरहतापसे जलती रहूँगी, परन्तु उनसे
मिलूँगी नहीं।
मिलौं न तिनसों भूल, अब जौलौं जीवन जियौं।
सहौं बिरहको सूल, बरु ताकी ज्वाला जरौं॥
मैं अब अपने मन यह ठानी। उनके पंथ पिऊँ नहिं पानी॥
कबहुँ नैन न अंजन लाऊँ । मृगमद भूलि न अंग चढ़ाऊँ॥
सुनौं न स्त्रवननि अलि पिकबानी । नील जलज परसौ नहिं पानी ॥
जरा ध्यान देकर देखिये, इस खीझमें कितनी रीझ भरी है!
एक दिन लीलामयने भक्त सखाओंके प्रणयकोपका आनन्द
लूटनेके लिये खेलमें गड़बड़ मचाकर सखाओंको खिझा दिया।
सखाओंने मिलकर निश्चय किया कि इस नटखटको खेलसे
अलग कर दो। श्यामसुन्दरका वियोग तो क्षणभरके लिये भी