Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

by विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)

Source: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished173 pages

About this granth

This is Bharatendu Harishchandra's Hindi rendering of Vishakhadatta's Sanskrit play Mudrarakshasa (मुद्राराक्षस). Bharatendu (1850–1885), often called the father of modern Hindi literature, described it as a remarkable drama on politics, and his translation is one of the important early works of Hindi theatre.

The play follows Chanakya's scheme, after the fall of the Nanda dynasty, to bring the Nanda minister Rakshasa over to Chandragupta's side. The cast list names Chandragupta, Rakshasa, Chanakya, Malayaketu, Chanakya's agent Siddharthaka, Rakshasa's friend the jeweller Chandanadasa, Shakatadasa, and the spy Viradhagupta disguised as a snake-charmer.

This printing was compiled by Babu Ramdin Singh, editor of the Kshatriya Patrika, published by Rai Ramranvijay Singh Bahadur and printed at the Khadgavilas Press, Bankipur; the title page marks it as the eighth printing and carries the year 1925. Bharatendu dedicated the work to Raja Shivaprasad "Sitara-e-Hind". At about 173 pages, it shows the Hindi of the Bharatendu era and its approach to translating Sanskrit drama.

Page 170Permalink

केतुवर्णन । १७३

प्रजापति के आठ पुत्र गणक नाम के है और दो सै चार ब्रह्म-
सन्तान चतुर्भुजाकार है । बत्तीस वरुण के पुत्र कङ्का
नाम के है, इनमे चन्द्रमा ऐसी कान्ति रहती है । ये केतु
बहुत तीव्र फल को देने वाले है, इनका रूप बांस
के वृत्तसदृश होता है, छानवे काल के पुत्र है इन का कबन्ध ५
नाम है रूप भी कबन्ध ऐसा होता है, बड़े घोर दारुण फल
के देनेवाले हैं। नव केतु केवल विदिशा मे उदय होते है इनका
बड़ा और श्वेत तारा होता है, इस प्रकार से हजार केतु का
फल गर्ग, पराशर और असित देवलादिकों ने कहा है । अब
इन से विशेष केतुओ का फल नीचे लिखते है ।— १०
जिस केतु का उदय पश्चिम भाग मे हो और उत्तर भाग
में फेला हो, मूर्त्ति चिकनी हो तो उसे बसा केतु कहते है यह
तुरन्त ही मरगी करता है परन्तु इस के उदय से सुभिक्ष
बहुत होता है ।
उसी लक्षण के अस्थिकेतु और शस्त्रकेतु भी होते है, १५
परन्तु पहिला रूक्ष और दूसरा पूर्व मे उदय होता है पहिला
भयप्रद और दूसरा महामारीकारक है ।
जो केतु अमावस्या मे उदय होता है और उस की चोटी
मे धूम रहता है उसे कपालकेतु कहते हैं यह मरगी, अवर्षण
और रोग कारक है और यह आकाश के आधे ही मे रहता है । २०
इसी प्रकार का रौद्र नामक केतु है । इस की चोटी
नोकीली और ताम्रवर्ण की होती हे, यह आकाश के विभाग मे
ही चलता है । चल केतु उसे कहते हैं जिसकी चोटी का अग्र
दक्षिण ओर और उंचाई एक अगुल हो और ज्यों ज्यों उत्तर
की ओर चले त्यों त्यों बढ़ता जाय, सप्तऋषि अभिजित और २५
ध्रुव को स्पर्श कर फिर लोट कर दक्षिण भाग में अस्त हो और
आंधे ही आकाश मे रहै । यह केतु प्रयाग से लेकर अवन्तीपुष्क-
रावरण और उत्तर मे देविकानद तक मध्यदेश और अन्य अन्य

Page 171Permalink

१८५ मुद्राराक्षस-

देशों पे भी रोग, दुर्भिक्ष से प्रजा को दुख देता है, इसका फल कोई दश मास तक और कोई अठारह मास तक रहता है।

श्वेत और कनाम का केतु ये दोनों साथ ही साथ दिन तक देख पड़ते है, इनका अग्र याम्यभाग मे रहताहै और ५ अर्द्धरात्रि के पूर्व ही इन का दर्शन होता है। ये दोनों सुभिक्ष और कल्याण के देनेवाले हैं।

इन मे यदि केवल केतु का दर्शन हो तो दश वर्ष तक संसार मे महाताप और शस्त्रकोप रहता है, श्वेत केतु जो जटाकार होता, हे यदि रुज हो, आकाश के त्रिभाग मे रहे, और १० लोट कर बाये ओर से आवे तो केवल तृतीयांश प्रजा बचे और सब का नाश हो।

कृत्तिका नक्षत्र मे स्थित हो कर जिस केतु का उदय हो उसे रश्मिकेतु कहते है। इस की चोटी म धूंआ रहता है इसका फल श्वेत कतु के समान है।

१५ ध्रुवकेतु का प्रमाण, वर्ण, आकृति इत्यादि नियत नही होते और दिव्य, आन्तरिक्ष, भौम ये तीनों भेद उस मे पाये जाते है यह अच्छा फल देनेवाला है।

राजाओ की सेना और महलों के ऊपर, वृक्ष पहाड़ और गृहों के ऊपर यह ध्रुवकेतुउनका नाश करने के लिए अकस्मात् २० दर्शन देता है।

कुमुद केतु की श्वेत कुमुद ऐसी कांति होती हे, पश्चिम मे उदय और पूर्व ओर चोटी रहती है, एक ही रात्रि देख पड़ता हे, यह दश वर्ष तक सुभिक्ष करता हे।

मणिकेतु की चोटी दूध ऐसी और सीधी होती है, तारा २५ बहुत सूक्ष्म रहता है, पश्चिम भाग मे केवल एक ही दिन प्रहर तक देख पड़ता है यह साढ़े चार मास तक सुभिक्ष और क्षुद्र जन्तुओं की उत्पत्ति करता है। जलकेतु पश्चिम ओर देख पड़ता

Page 172Permalink

केतुवर्णन । १७५

और चोटी भी पश्चिम भाग मे रहती है, रूप स्वच्छ होता है।
यह नव मास तक सुभिक्ष और प्राणियों को शांत रखता है।

भवकेतु एक रात्रि के पूर्व भाग मे देख पड़ता है। उसकी
चोटी सिंह के पुच्छ ऐसी दक्षिण से घूमी हुई होती है। यह जै
मुहूर्त्त रात्रि मे देख पड़ता है, उतने मास तक सुभिक्ष करना ५
है परन्तु यदि रूक्ष हो तो प्राणियों का नाश करता है।

पद्मकेतु कमल के मृणाल ऐसा उज्ज्वल होता है और
पश्चिम दिशा मे एक ही रात्रि देख पड़ता है। यह सात वर्ष
तक सुभिक्ष करता है।

आवर्त्तकेतु पश्चिम भाग मे आधी रात को देख पड़ता है, १०
इस की चोटी लाल और बाईं ओर को रहती है। यह जै
मुहूर्त्त रात्रि में देख पड़ता है उतने ही मास सुभिक्ष करता है।

संवर्त्तकेतु पश्चिम भाग मे सन्ध्या काल मे उदय होता है
और आकाश के तृतीयांश तक फैला रहता है, इस की चोटी
धूमसहित ताम्रवर्ण की होती है और उस का अग्र शूल ऐसा १५
जान पड़ता है। यह जै मुहूर्त्त देख पड़ता है उतने वर्ष शस्त्रों
के आघात से अनेक राजाओं का नाश करता है और जिस
नक्षत्र पर उदय होता हे उसे भी दुःख देता है।

बुरे केतुओं के अश्विन्यादि नक्षत्रों मे उदय होने के क्रम।
अरमकपति, किरातगज, कलिङ्गपति, शूरसेनपति, उशी- २०
नरपति, जलजजीवपति, अश्मकपति, मगधपति, अशिकपति,
अङ्गपति, पाण्ड्यपति, उज्जयिनीपति, दण्डकपति, कुरुक्षेत्रपति,
काश्मीरपति, कम्बोजपति, इक्ष्वाकुपति, रत्नकपति, पुण्ड्रपति,
केकयपति, सार्वभोम, अध्रपति, भद्रकपति, काशीपति, चैद्या-
दिपति, पञ्चनदपति, सिंहलपति, अगपति, नेमिषपति, किरात- २५
पति, इन राजाओं का मरण होता है, परन्तु यदि केतु की
चोटी उल्कादिकों से चोट खाय तो इन राजाओं का कल्याण

Page 173Permalink

१७६ मुद्राराक्षस—

औध्र, चोल, अवगाण, सित, हूण, चीन इन देशों के राजाओं का नाश हो ।

केतु को यूरप के लोग भी कुछ विशिष्ट फलकारक मानते है, परन्तु कुछ इसका पक्का विश्वास नही करते । यह एक प्रकार का तारा है, जिस की गति का यथार्थ निर्णय नही होता और इस की बहुत जाति है, कितने एक बार देख पड़ते फिर लौट कर नही आते । इस से यह जान पड़ता है कि इनकी कक्षा को यूरप के लोग (Parabola) कहते हैं और हम ने इस का नाम परवलय रक्खा है । बहुत से केतु फिर लौट कर आते है, इसलिए उन की कक्षा सामित है अर्थात बन्धी है, इस कक्षा १० को दीर्घवृत्त कहते है जिस की नाभि और केन्द्र में बहुत अन्तर होता है ।

कितने केतु दो चार बार तो नियत काल पर लौट कर आते हैं फिर नही आते । इस से यह अनुमान होता है कि या तो वे केतु नष्ट हो गये अथवा उन की कक्षा बदल गयी । इन १५ बातों से यही सिद्ध होता है कि इन के कक्षादिकों का प्रमाण यथार्थ अभी तक किसी के ध्यान मे नही आया । इसी लिये वराहमिहिर ने लिखा है कि 'दर्शनमस्तो वा गणितविधिनाऽस्य शक्यते नैव ज्ञातुम्” अर्थात् केतुओ के उदय और अस्त गणित से नही जाने जाते ।

२० इस केतु को कई एक विद्वानों ने हिन्दी मे 'पुच्छलतारा' वा दुमदार सितारा कहा हे, परन्तु प्राचीन लोगो के मत से वह केतु की शिखा अर्थात् चोटी है, जिसे नये लोग पुच्छ कहते हैं, इस लिये हमारी समझ मे तारा पद के विशेषण म पुच्छ के बदले शिखा अर्थात् चोटी का विशेषण देना चाहिये ।
२५


बांकीपुर— 'खड्गविलास' प्रेस में बा० रामप्रसाद सिंह द्वारा मुद्रित ।