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मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

by विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)

Source: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (origin)

DevanagariHindipublished173 pages

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२० मुद्राराक्षस ।

मलयकेतु था। और भी पांच म्लेच्छ राजाओ को पर्वतक
अपने सहायता को लाया था।
इधर राक्षस मन्त्री राजा के मरने से दुखी होकर
उस के भाई सर्वार्थसिद्धि को सिहासन पर बैठा कर राजकाज
५ चलाने लगा। चाणक्य ने पर्वतक की सैना लेकर
कुसुमपुर को चारों ओर से घेर लिया। पन्द्रह दिन तक घोरतर
युद्ध हुआ। राक्षस की सेना और नागरिक लोग लड़ते २
शिथिल हो गए, इसी समय मे गुप्त रीति से जीवसिद्धि
के बहकाने से राजा सर्वार्थसिद्धि बैरागी हो कर बन मे
१० चला गया, इस कुसमय मे राजा के चले जाने से राक्षस
और भी उदास हुआ। चन्दनदास नामक एक बड़े धनी
जौहरी के घर मे अपने कुटुम्ब को छोड़ कर और शकट
दास कायस्थ तथा अनेक राजनीति जाननेवाले विश्वास-
पात्र मित्रों को और कई आवश्यक काम सौंप कर
१५ राजा सर्वार्थसिद्धि के फेर लाने को आप तपोवन की
ओर गया।
चाणक्य ने जीवसिद्धिद्वारा यह सब सुन कर राक्षस
के पहुचने के पहले ही अपने मनुष्यों से राजा सर्वार्थसिद्धि
को मरवा डाला। राक्षस जब तपोवन मे पहुचा और
२० सर्वार्थसिद्धि को मरा देखा तो अत्यन्त उदास हो कर
वही रहने लगा। यद्यपि सर्वार्थसिद्धि के मार डालने
से चाणक्य की नन्दकुल के नाश की प्रतिज्ञा पूरी हो चुकी
थी, किन्तु उस ने सोचा कि जब तक राक्षस चन्द्रगुप्त का
मन्त्री न होगा तब तक राज्य स्थिर न होगा। वरंच बड़े
२५ विनय से तपोवन मे राक्षस के पास मन्त्रित्व स्वीकार करने
का सन्देसा भेजा, परन्तु प्रभुभक्त राक्षस ने उस को
स्वीकार नही किया।