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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages
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१३२मुद्राराक्षसम्

राक्षस —[स्वगतम्] नियतमतिधूर्तवटुना तस्यापि तपस्विन कमप्यु-
'पांशुवधमाकलय्य पर्वतेश्वरविनाशजनितस्यायशस परिहारार्थमेपा लोक-
प्रतिपत्तिरुपचरिता । [प्रकाशम्] ततस्तत ?

व्याख्या—सोद्वेगम्—उद्वेगेन उत्कण्ठया सहित यथा स्यात् तथा आहेति शेष , सखे—मित्र, चाणक्यवटो —अल्पमतिचाणक्यस्य, परितोष —सन्तोष , कुत —कस्मात् ? दारुवर्मण , प्रयत्न—प्रयासम्, अफल—निष्फलम्, वा—अथवा, अनिष्टफलम्—अशुभफलम्, अवगच्छामि—जानामि । यत्—यस्मात्, बुद्धिमोहात्—मतिभ्रमात्, अथवा राजभक्तिप्रकर्षात्—राज्ञि सर्वार्थसिद्धौ भक्त्याधिक्यप्रदर्शनात्, नियोगकालम्—आदेशसमयम्, अप्रतीक्षमाणेन—असहिष्णुना, अनेन—दारुवर्मणा, चाणक्यवटो , चेतसि—मनसि, बलवान्—प्रबल , विकल्प —सन्देह , जनित —उत्पादित । तत —तदनन्तरम्, चाणक्यहतेनेन, अनुकूललग्नवशात्—शुभमुहूर्त्ताद्गणात्, अद्य, अपराह्नसमये, चन्द्रगुप्तस्य, नन्दभवन-प्रवेश , भविष्यति, इति, शिल्पिन , पौराश्च, गृहीतार्थान्—अवगताभिप्रायम्, कृत्वा—विधाय, तस्मिन्नेव क्षणे—नन्दभवनप्रवेशसमय एवेत्यर्थ , पर्वतेश्वर-भ्रातर—पर्वतकसोदर, वैरोचकम्—एतदाख्यम्, एकासने—एकोषवेशन, चन्द्रगुप्तेन, सह—साकम्, उपवेश्य—सम्स्थाप्य, पृथ्वीराज्यार्धभाग —पृथ्वी वसुधा एव राज्य तस्यार्धभाग , कृत —विहित । कि, वैरोचकाय, पूर्वप्रतिश्रुत—प्राक्प्रतिज्ञात राज्यम्, अनिसृष्टम्—दत्तम् । अतिधूतवटुना—अतिशठेन चाणक्येनेति शेष , तपस्विन —वराक्स्य, तस्यापि—पर्वतेश्वरभ्रातुरपि, कमपि—अनिवचनीयमपि, उपांशुवधम्—रहस्यमारणम्, आकलय्य—अवधार्य, पर्वतेश्वरविनाशजनितस्य—पर्वतेश्वरहत्योत्पन्नस्य, अयशस —अकीर्ते , परिहारार्थम्—निवारणार्थम्, नियत—निश्चितम्, एषा, लोकप्रतिपत्ति —लोकाना जनाना प्रतिपति अवबोध , उपचरिता—परिकल्पिता ।

हिन्दी अनुवाद—राक्षस—[ उद्विग्नता के साथ ] मित्र ! मन्दमति चाणक्य को सन्तोष कहाँ ? मैं तो दारुवर्मा के प्रयत्न को निष्फल या अनर्थकारी समझता हूँ । जो कि इसन मतिभ्रम के कारण अथवा राजभक्ति की अधिकता-वश आदेश के समय की प्रतीक्षा किये बिना दुष्ट चाणक्य के मन में बडा सन्देह उत्पन्न कर दिया । तब तब ?

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द्वितीयोऽङ्कः १३३

विराधगुप्त—तब दुष्ट चाणक्य ने शुभ लग्न के कारण आज आधी रात के समय चन्द्रगुप्त का नन्द-भवन में प्रवेश होगा—इस बात से कारीगरों और नागरिकों को अवगत कराकर उसी समय पर्वतेश्वर के भाई वैरोचक को चन्द्रगुप्त के साथ एक आसन पर बैठाकर पृथ्वी रूपी राज्य का आधा हिस्सा लगा दिया ।

राक्षस—क्या पर्वतेश्वर के भाई वैरोचक को पहले का स्वीकारा हुआ राज्य दे दिया ?

विराधगुप्त—और क्या ?

राक्षस—[ मन में ] निश्चय ही अतिदुष्ट ( चाणक्य ) ने उस बेचारे की भी कोई रहस्यमय हत्या सोचकर पर्वतेश्वर के विनाश से उत्पन्न अपयश को मिटाने के लिए यह जनता में धारणा बना दी है । [ प्रकट ] तब तब ?

टिप्पणी—अफलम्—अविद्यमानं फलम् अस्मिन् इति अफलः नञ्बहुव्रीहि स०, तम् । अनिष्टफलम्—न इष्टम् अनिष्टम् नञ्तत् ० । अनिष्टं फलम् अस्य इति अनिष्टफलः बहुव्रीहि स०, तम् । अनुकूललग्नवशात्—√ लग् + क्त कर्तरि लग्नम् । अनुकूलं लग्नम् कर्मधारय स० । तस्य वशम् = आयत्तता षष्ठीतत्०, तस्मात् । गृहीतार्थान्—जिन्हे बात मालूम हो गई हो । गृहीतः अर्थः = विषयः यैः ते गृहीतार्थाः, तान् । अतिसृष्टः—दे दिया । अति √ सृज् + क्त कर्मणि । उपांशुवधम्—एकान्त मे की जाने वाली हत्या को । 'उपांशु' यह एक अव्यय है । उपांशु वधः सुब्सुपा स०, तम् । आकलय्य—विचार कर । आ √ कल् + णिच् स्वार्थे + क्त्वा—ल्यप् । लोकप्रतिपत्तिः—लोक में प्रसिद्धि । प्रति √ पद् + क्तिन् भावे = प्रतिपत्तिः । लोके प्रतिपत्तिः सुब्सुपा स० । उपचरिता—फैला दी है । उप √ चर् + क्त कर्मणि । यहाँ राक्षस यह समझ रहा है कि वैरोचक को आधा राज्य देकर चाणक्य पर्वतेश्वर की हत्या के कलंक को धोना चाहता है; किन्तु राक्षस को यह पता नहीं है कि चाणक्य की कूटनीति ने जनता में यह अफवाह फैला रखी है कि पर्वतेश्वर को मरवाने वाला राक्षस ही है ।

विराधगुप्तः—ततः प्रथममेव प्रकाशिते चन्द्रगुप्तस्यार्धरात्रे नन्दभवन-प्रवेशे कृताभिषेके च वैरोचके विमलमुक्तागुणपरिक्षेपोपरचितपटवारवाण-प्रच्छादितशरीरे मणिमयमुकुटनिबिडनियतरुचिरतरमौलौ सुरभिकुसुम-दामवैकक्षकावभासितविपुलवक्षः स्थले परिचिततमैरप्यनभिज्ञायमानाकृतौ

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द्वितीयोऽङ्कः १३५

वाहनेषु—बहिः निगृहीतानि नियन्त्रितानि वाहनानि अश्वादयो यैः तादृशेषु, स्थितेषु, चन्द्रगुप्तानुयायिषु, भूमिपालेषु—राजसु, युष्मत्प्रयुक्तेनैव, चन्द्रगुप्तनिपा-दिना—वृषलहस्तिपकेन, वर्वरकेण—तदाख्येन, कनकदण्डान्तर्निहिताम्—कनकस्य स्वर्णस्य दण्डो यष्टी तस्य अन्तः अभ्यन्तरे निहितां स्थापिताम्, असिपुत्रिकां—छुरिकाम्, आक्रष्टुकामेन—बहिर्निःसारणेच्छुना, करेण—हस्तेन, कनकश्शृङ्खला-वलम्बिनी—कनकस्य सुवर्णस्य शृङ्खला बन्धनरज्जुः ताम् अवलम्बते तच्छीलेति, कनकदण्डिका सुवर्णयष्टिः, अवलम्बिता—धृता। उभयोः दारुवर्मवर्वरकयोः, अस्थाने—अयुक्तस्थाने, यत्नः—उद्योगः।

हिन्दी अनुवाद—विराधगुप्त—तदन्तर पहले ही चन्द्रगुप्त के अर्धरात्रि के समय नन्दभवन में प्रवेश का प्रचार हो जाने पर, वैरोचक के अभिषेक कर दिये जाने पर, उज्ज्वल मोतियों की लंबी लटकती मालाओं से खचित रंग-बिरंगे कंचुक से (वैरोचक के) शरीर के ढक जाने पर, मणिनिर्मित मुकुट से कसकर जकड़े हुए अत्यन्त सुन्दर केशपाश के होने पर, सुगन्धित गजरे के जनेऊ की तरह धारण करने से विशाल वक्षःस्थल के शोभासम्पन्न होने पर, परिचितों से भी न पहचानी जाती हुई आकृति के होने पर और दुष्ट चाणक्य के आदेश से चन्द्रगुप्त के चढ़ने योग्य चन्द्रलेखा नामक हथिनी पर चढ़कर चन्द्रगुप्त के अनुयायी राजाओं से अनुसरण किये जाते हुए वैरोचक के शीघ्रता से महाराज नन्द के भवन में प्रवेश करने पर आपके भेजे हुए शिल्पी दारुवर्मा ने 'यह चन्द्रगुप्त है' ऐसा समझकर वैरोचक के ऊपर गिराने के लिए तोरण रूपी यन्त्र को संभाल लिया। इसी बीच चन्द्रगुप्त के अनुयायी राजाओ के बाहर वाहनों को रोककर ठहर जाने पर आपके भेजे हुए चन्द्रगुप्त के महावत बर्बरक ने सोने की छड़ी के भीतर रखी हुई छुरी को खींचने की इच्छा से सोने की जंजीर से लटकती हुई सोने की छड़ी (की मूठ) को हाथ से पकड़ लिया।

राक्षस—दोनों का प्रयत्न अनुचित स्थान पर है। तब तब?

टिप्पणी—कृताभिषेके—कृतः अभिषेकः यस्य असौ कृताभिषेकः, तस्मिन्। वैकक्षक—जनेऊ की तरह पहना हुआ हार। विशिष्टः कक्षः अस्मात् इति विकक्षम् प्रादिबहुव्रीहि स०। विकक्षे भवम् इति विकक्ष + अण् + कन् स्वार्थे = वैकक्षकम्। उपवाह्याम्—उप √वह् + ण्यत् कर्मणि। यह 'गजवशाम्' का विशेषण है। यन्त्रतोरणम्—यन्त्रकलितं यन्त्रयुक्तं यन्त्रमुक्तं वा तोरणम्

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द्वितीयोऽङ्कः १३७

करता हुआ ही मारा गया। उसके बाद यन्त्रयुक्त तोरण के गिराने से अपने वध की संभावना करके दारुवर्मा ने शीघ्र ही ऊँचे तोरण के स्थान पर चढ़कर यन्त्र-चालन के कारणस्वरूप लोहे की कील को लेकर हथिनी पर बैठे ही बेचारे वैरोचक को मार डाला।

टिप्पणी—उत्प्रेक्षमाणा—संभावना करती हुई। उत्-प्र √ ईक्ष् + शानच् कर्तरि। अतिजवनतया—तेज चाल से। √ जु + ल्युट् भावे = जवनम्। अतिशयितं जवनमस्य इति अतिजवनम्, सामान्ये नपुंसकम्। तस्य भावः, तया। हेतौ तृतीया। यह 'अभिघात' का हेतु है। गत्यन्तरम्—दूसरी गति को। अन्या गतिः इति गत्यन्तरम् मयूरव्यंसकादित्वात् स०। प्रत्याकलित—धृत। प्रति-आ √ कल् + णिच् + क्त कर्मणि। व्यग्र—व्यस्त। विशिष्टम् अग्रम् अस्य इति व्यग्रः। चन्द्रगुप्तप्रत्याशया—चन्द्रगुप्तसम्बन्धिनी प्रत्याशा, तया। हेतौ तृतीया।

राक्षसः—कष्टम् ! अनर्थद्वयमापतितम् । न हतश्चन्द्रगुप्तो हतौ वैरोचकबर्बरकौ !! [ सावेगमात्मगतम् ] नैतावुभौ हतौ, दैवेन वयमेव हताः । [ प्रकाशम् ] अथ स सूत्रधारो दारुवर्मा क्व ?

विराधगुप्तः—वैरोचकपुरः सरेण पदातिलोकेन लोष्टघातं हतः ।

राक्षसः—[ सास्रम् ] कष्टम् ! अहो ! वत्सलेन सुहृदा दारुवर्मणा वियुक्ताः स्म । अथ तत्रत्येन भिषजाऽभयदत्तेन किमनुष्ठितम् ?

विराधगुप्तः—अमात्य ! सर्वमनुष्ठितम् ।

राक्षसः—[सहर्षम्] किं हतो दुरात्मा चन्द्रगुप्तः ?

विराधगुप्तः—अमात्य ! दैवान्न हतः ।

राक्षसः—[ सविषादम् ] तत् किमिदानीं कथयसि परितुष्टः 'सर्वमनुष्ठितम्' इति ।

विराधगुप्तः—अमात्य ! कल्पितमनेन विषचूर्णमिश्रमौषधं चन्द्रगुप्ताय । तच्च प्रत्यक्षीकुर्वता चाणक्यहतकेन कनकभाजने वर्णान्तरमुपगतमुपलभ्याभिहितश्चन्द्रगुप्तः—'वृषल ! सविषमिवौषधं, न पातव्यम् इति ।

राक्षसः—शठः खल्वसौ वटुः । अथ स वैद्यः कथम् ?

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१३८ मुद्राराक्षसम्

विराधगुप्त — म, खलु वैद्यस्तदेवौषधं पायित उपरतश्च ।

राक्षस —[सविषादम्] अहह ! महान् विज्ञानराशिरुपरत । भद्र ! अथ तस्य शयनाधिकृतस्य प्रमोदकस्य किं वृत्तम् ?

विराधगुप्त —यत् इतरेषाम् ।

राक्षस —[सोद्वेगम्] कथमिव ?

हिंदी अनुवाद—राक्षस—कष्ट की बात है । दो अनर्थ हो गए । न मरा चन्द्रगुप्त, मर गए वैरोचक और वर्वरक ।। [ आवेग के साथ मन में ] ये दोनों नहीं मारे गए, भाग्य ने हमे ही मार दिया । [ प्रकट ] अच्छा वह शिल्पी दारु-वर्मा कहाँ ( है ) ?

विराधगुप्त—(उसे तो) वैरोचक के पीछे पैदल चलने वाले लोगो ने ढेले मार-मार कर मार दिया ।

राक्षस—[ आंसू के साथ ] कष्ट है ! ओह ! स्नेही बंधु दारुवर्मा से हम वियुक्त हो गए हैं । अच्छा, वहां रहने वाले वैद्य अभयदत्त ने क्या किया ?

विराधगुप्त—अमात्य ! सब कुछ किया ।

राक्षस—[ हर्ष के साथ ] क्या दुष्ट चन्द्रगुप्त मारा गया ?

विराधगुप्त—अमात्य ! भाग्य से न मारा गया ।

राक्षस—[ दुःख के साथ ] तब बता अभी प्रसन्न होकर कह रहे हो कि सब कुछ किया ।

विराधगुप्त—अमात्य ! उसने विष के चूर्ण मे मिश्रित ओषधि चन्द्रगुप्त के लिए तैयार की । किन्तु उसका निरीक्षण करते हुए दुष्ट चाणक्य ने सोने के पात्र मे बदला हुआ रङ्ग पाकर चन्द्रगुप्त से कहा—'चन्द्रगुप्त ! ओषधि विष से मिश्रित मालूम होती है, नही पीनी चाहिए ।'

राक्षस—यह मूर्ख दुष्ट है । अच्छा, उन वैद्य पर क्या बीती ?

विराधगुप्त—उस वैद्य को वही ओषधि पिला दी गई और वह मर गया ।

राक्षस—[ विषाद के साथ ] हाय ! महान् वैज्ञानिक उठ गया । अच्छा, भद्र ! शयन-कक्ष के अधिकारी उस प्रमोदक का क्या हुआ ?

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द्वितीयोऽङ्कः १३६

विराधगुप्त— जो दूसरो का ( हुआ ) ।

राक्षस— [ उद्वेग के साथ ] कैसे ?

**टिप्पणी—आपतितम्—**सम्प्राप्तम् । आ पड़े। **वैरोचकपुरःसरेण—**जिनके आगे वैरोचक चल रहा है। पुरः अग्रे सरतीति पुरःसरः पुरस्√सृ +ट कर्तरि=पुरःसरः । वैरोचकः पुरः सरः यस्य स वैरोचकपुरःसरः बहुव्रीहि स०, तेन। **पदातिलोकेन—**चरणचारिणा लोकेन । पैदल चलने वाले लोगों ने । पदातीनां लोकः षष्ठीतत्०, तेन । अनुक्ते कर्तरि तृतीया । **लोष्टघातम्—**ढेलों से मारकर । लोष्टैः हत्वा इति लोष्ट√हन्+णमुल् भावे । **भिषजा—**वैद्येन । भिषज्यति रोगान् जयति इति भिषज् +यक् स्वार्थे ( कण्ड्-वादि )+क्विप् कर्तरि=भिषक्, तेन। अनुक्ते कर्तरि तृतीया । **प्रत्यक्षीकुर्वता—**निरीक्षमाणेन । **वटुः—**ईषद्विद्यः । पायितः—√पा+णिच्+क्त । **विज्ञानराशिः—**चिकित्साविषयकज्ञानाकरः । ओषधिविज्ञानस्य विशेषज्ञ इत्यर्थः । **उपरतः—**मृतः । उप√रम्+क्त कर्तरि । **शयनाधिकृतस्य—**शयनागारनियुक्तस्य । शयने अधिकृतः सुप्सुपा स०, तस्य । **यत् इतरेषाम्—**जो दूसरों का हुआ अर्थात् प्राणनाश ।

**विराधगुप्तः—**स खलु मूर्खस्तं युष्माभिरतिसृष्टं महान्तमर्थराशिमवाप्य महता व्ययेनोपभोक्तुमारब्धवान् । ततः 'कुतोऽयं भूयान् धनागमस्तव' इति पृच्छ्यमनोऽयं यदा वाक्यभेदान् बहूनकथयत् तदा चाणक्यहतकादेशाद् विचित्रेण वधेन व्यापादितः ।

राक्षसः—[ सोद्वेगम् ] कथमत्रापि वयमेवोपहता दैवेन ? अथ शयितस्य चन्द्रगुप्तस्य शरीरे प्रहर्तुमस्मत्प्रयुक्ताना नरपतिशयनगृहस्यान्तः-सुरङ्गायां निवसतं बीभत्सकार्दीनां को वृत्तान्तः ?

**विराधगुप्तः—**अमात्य ! दारुणो वृत्तान्तः ।

राक्षसः—[ सावेगम् ] कथं दारुणो वृत्तान्तः ? न खलु विदिताः ते तत्र निवसन्तः चाणक्यहतकेन ?

**विराधगुप्तः—**अथ किम् ?

**राक्षसः—**कथमिव ?

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१४० मुद्राराक्षसम्

हिन्दी अनुवाद—विराधगुप्त— उस मूर्ख ने आपकी दी हुई उस महान् धन-राशि को प्राप्त करके बड़े खर्च के साथ उपभोग करना आरम्भ किया। पश्चात् यह पूछे जाने पर कि तुम्हें इतना प्रचुर धन कहाँ से आया, वह जब बहुत-सी परस्पर विरोधी बातें कहने लगा तब दुष्ट चाणक्य के आदेश से विचित्र प्रकार के वध के द्वारा मरवा दिया गया।

राक्षस [उद्वेग के साथ] क्या यहाँ भी भाग्य ने हमें ही मारा ? अच्छा सोये हुए चन्द्रगुप्त के शरीर पर प्रहार करने के लिए हमारे नियुक्त किये हुए, राजा के शयन-कक्ष के भीतरी सुरंग में निवास करने वाले वीभत्सक आदि का क्या समाचार है ?

विराधगुप्त— अमात्य ! भयानक समाचार है।

राक्षस—[उद्वेग के साथ] कैसा भयानक समाचार है ? वहाँ रहने हुए वे दुष्ट चाणक्य के द्वारा ताड़ लिये तो नहीं गए ?

विराधगुप्त— और क्या ?

राक्षस— कैसे ?

टिप्पणी—हन्त— अत्र वाक्यालङ्कारे प्रयुक्तः । अतिमृष्टम्— दत्तम्। पृच्छ्यमान— जिज्ञास्यमान चाणक्येनेति शेषः । √प्रच्छ्+लट् कर्मणि + शानच् । वाक्यभेदान्— वाक्यस्य भेदान् भिन्नानि वाक्यानि इत्यर्थः । 'भावानयनं द्रव्यानयनम्' इति न्यायात् । विचित्रेण— विस्मयोत्पादकेन । विशेषेण चित्रं विचित्रं तेन । उपहता— विनाशिता । उप√हन्+क्त कर्मणि । अन्तस्सुरङ्गायाम्— अभ्यन्तरवर्तिनि ।

विराधगुप्त— प्राक् चन्द्रगुप्तप्रवेशात् प्रविष्टमात्रेणैव शयनगृहे चाणक्येन दुरात्मना समन्तादवलोकितम्। ततस्तु एकस्माद् भित्तिच्छिद्राद् गृहीतभक्तावयवा निष्क्रामन्ती पिपीलिकापङ्क्तिमवलोक्य पुरुषगर्भमेतद्गृहमिति गृहीतार्थेन दाहितं तदन्त शयनगृहम्। तस्मिंश्च दह्यमाने धूमावरुद्धदृष्टय प्रथममपिहितनिर्गमनमार्गमनधिगम्य सर्व एव वीभत्सकादयस्तत्रैव ज्वलनमुपगता उपरताश्च।

राक्षसः—[सास्रम्] सखे ! पश्य, चन्द्रगुप्तस्य दैवसम्पदा सर्व एव

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द्वितीयोऽङ्कः । १४१

उपरताः । [ सचिन्तम् ] सखे ! दैवसम्पदं पश्य दुरात्मनश्चन्द्रगुप्तहतकस्य !! कुतः ?—

कन्या तस्य वधाय या विषमयी गूढं प्रयुक्ता मया
दैवात् पर्वतकस्तया स निहतो यस्तस्य राज्यार्धभाक् ।
ये यन्त्रेषु रसेषु च प्रणिहितास्तैरेव ते घातिताः
मौर्यस्यैव फलन्ति पश्य विविधश्रेयांसि मे नीतयः ॥१६॥

व्याख्या—चन्द्रगुप्तप्रवेशात्—वृषलसन्निवेशात्, प्राक्—पूर्वम्, प्रविष्टमात्रेणैव—सन्निवेशमात्रेणैव, दुरात्मना—दुष्टेन, चाणाक्येन—विष्णुगुप्तेन, समन्तात्—चतुर्दिक्षु, अवलोकितः—दृष्टः । ततः—तत्पश्चात्, एकस्मात्—अद्वितीयस्मात्, भित्तिच्छिद्रात्—कुड्यरन्ध्रात्, गृहीतभक्तावयवां—गृहीताः मुखे धृताः भक्तस्य अन्नस्य अवयवाः खण्डाः यया तादृशीं, निष्क्रामन्ती—निर्गच्छन्ती, पिपीलिकापङ्क्तिं—पिपीलिकाश्रेणीम्, अवलोक्य—दृष्ट्वा, एतत्, गृहम्—भवनम्, पुरुषगर्भम्—पुरुषाः गर्भे यस्य तादृशम्, ( अस्ति ), इति—अस्माद्धेतोः, गृहीतार्थेन—गृहीतः अर्थः तत्त्वं येन तादृशेन चाणाक्येनेति शेषः, तदन्तःशयनगृहम्—तत् पूर्वोक्तम् अन्तःशयनगृहम् अन्तर्निद्राभवनं, दाहितम्—भस्मसात्कृतम् । तस्मिंश्च—शयनगृहे, दह्यमाने—भस्मसात्कृते सति, धूमावरुद्धदृष्टयः—धूमेन अवरुद्धा दृष्टिः येषां तथाविधाः, बीभत्सकादयः’ सर्वेएव, प्रथमम्—पूर्वम्, अपिहितनिर्गमनमार्गम्—निरुद्धबहिर्निःसरणपथम्, अनधिगम्य—अप्राप्य, ज्वलनम्—अग्निम्, उपगताः—प्राप्ताः, उपरताः—मृताश्च । सास्त्रम्—सरोदनम् । दैवसम्पदं—भाग्यसम्पत्तिम् ।

अन्वयः—मया तस्य वधाय या विषमयी कन्या गूढं प्रयुक्ता तया दैवात् सः पर्वतकः निहतः यः तस्य राज्यार्धभाक् । ये यन्त्रेषु रसेषु च प्रणिहिताः ते तैः एव घातिताः । पश्य, मे नीतयः मौर्यस्य एव विविधश्रेयांसि फलन्ति ॥ १६ ॥

व्याख्या—मया—राक्षसेन, तस्य—चन्द्रगुप्तस्य, वधाय—नाशाय, या, विषमयी—विषनिर्मिता, कन्या, गूढं—गुप्तं यथा स्यात् तथा, प्रयुक्ता—प्रेरिता, तया—विषकन्यया, दैवात्—भाग्यवशात्, सः पर्वतकः, निहतः—विनाशितः, यः, तस्य—चन्द्रगुप्तस्य, राज्यार्धभाक्—अर्धराज्यस्य हर्ता । ये—जनाः, यन्त्रेषु—प्राणविघातसाधनपदार्थेषु, रसेषु च—विषेषु च, प्रणिहिताः—व्यापारिताः, ते, तैः एव—यन्त्रैः विषैः एव च, घातिताः—हिंसिताः । पश्य—विभावय, मे—मम,

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द्वितीयोऽङ्कः । १४३

तत् भजति इति राज्यार्ध√भज् + ण्वि कर्तरि = राज्यार्धभाक् । प्रणिहितः—नियुक्त किए गए । प्र-नि√धा + क्त कर्मणि, धा इत्यस्य हि आदेशः, 'नेर्गदनद'—इत्यादिना णत्वम् । घातिताः—मारे गए । √हन् + णिच् + क्त कर्मणि । इसका कर्ता लुप्त 'मया' है । तानि ( रसयन्त्राणि ) तान् हतवन्ति = अहम् तैः तान् घातितवान् = मया तैः ते घातिताः । इस पद्य में विषमालंकार है, वैदर्भी रीति है, माधुर्य गुण है और शार्दूलविक्रीडित छन्द है । इस छन्द का लक्षण १, १२ में देखिए ॥ १६ ॥

विराधगुप्तः—अमात्य ! तथापि प्रारब्धमपरित्याज्यमेव । पश्यतु—

प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः
प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः ।
विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः
प्रारब्धमुत्तमगुणास्त्वमिवोद्वहन्ति ॥१७॥

अन्वयः—नीचैः विघ्नभयेन न खलु प्रारभ्यते । मध्याः प्रारभ्य विघ्नविहताः ( सन्तः ) विरमन्ति । त्वमिव उत्तमगुणाः विघ्नैः पुनः पुनः प्रतिहन्यमानाः अपि प्रारब्धम् उद्वहन्ति ॥ १७ ॥

व्याख्या—नीचैः—अधमैः, विघ्नभयेन—अन्तरायभीत्या, न खलु—नैव, प्रारभ्यते—कर्म प्रस्तूयते । मध्याः—मध्यमाः जनाः, प्रारभ्य—कर्म प्रस्तुत्य, विघ्नविहताः—विघ्नैः प्रत्यूहैः विहताः बाधिताः ( सन्तः ), विरमन्ति—निवर्तन्ते । त्वमिव—भवानिव, उत्तमगुणाः—उत्कृष्टगुणवन्तः (जनाः), विघ्नैः—अन्तरायैः, पुनः पुनः—भूयो भूयः, प्रतिहन्यमानाः अपि—बाध्यमाना अपि, प्रारब्धम्—प्रस्तुतं कर्म, उद्वहन्ति—धारयन्ति सम्पादयन्तीत्यर्थः ॥ १७ ॥

हिन्दी अनुवाद—विराधगुप्त—अमात्य ! तोभी प्रारंभ किये हुए कार्य का परित्याग नही करना चाहिए । देखिए—

नीच ( मनुष्य ) विघ्नो के डर से ( कार्य का ) प्रारंभ ही नही करते है । मध्यम ( श्रेणी के लोग ) प्रारंभ करके विघ्नो से बाधित होने पर रुक जाते हैं । किन्तु आप जैसे उत्तम गुणों वाले ( जन ) विघ्नों से बार-बार बाधित होते हुए भी प्रारंभ किये हुए ( कार्य ) को सम्पन्न करते है ॥ १७ ॥

टिप्पणी—प्रारब्धम्—प्रक्रान्तम्, प्रस्तुतम् । प्र-आ√रभ् + क्त कर्मणि ॥

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१४४ मुद्राराक्षसम्

अपरित्याज्यम्—न छोड़ने योग्य। परि+√त्यज्+ण्यत् कर्मणि, 'त्यजेश्च' इति वार्त्तिकेन कुत्वनिषेध = परित्याज्यम्। न परित्याज्यम् अपरित्याज्यम् नञ्तत्०। विघ्नभयेन—वि+√हन्+क करणे घञर्थे=विघ्न। तस्मात् भयम् पञ्चमीतत्०, तेन। हेतौ तृतीया। विरमन्ति—अत्र 'व्याङ्परिभ्यो रमः' इत्यनेन परस्मैपदत्वम्। इस श्लोक में पूर्णोपमा अलंकार, व्यतिरेक अलंकार और अप्रस्तुतप्रशंसा अलंकार हैं। इसमें वैदर्भी रीति है, प्रसाद गुण है और वसन्ततिलका छन्द है। इस छन्द का लक्षण १, ८ में देखिए ॥१७॥

अपि च—

किं शेषस्य भरव्यथा न वपुषि क्ष्मा न क्षिपत्येष यत्
किं वा नास्ति परिश्रमो दिनपतेरास्ते न यन्निश्चलः ।
किन्त्वङ्गीकृतमुत्सृजन् कृपणवच्छ्लाघ्यो जनो लज्जते
निर्व्यूढं प्रतिपन्नवस्तुषु मतामेतद्धि गोत्रव्रतम् ॥१८॥

अन्वय —शेषस्य वपुषि किं भर-व्यथा न यदेष क्ष्मा न क्षिपति ? किं वा दिनपते परिश्रमो नास्ति यत् निश्चलो न जास्ते ? किंतु श्लाघ्यो जन अङ्गीकृत कृपणवत् उत्सृजन् लज्जते । हि प्रतिपन्नवस्तुषु निर्व्यूढम् एतत् सतां गोत्र-व्रतम् ॥ १८ ॥

व्याख्या—शेषस्य—नागराजस्य, वपुषि—शरीरे, किं भरव्यथा न—किं भूभारधारणजन्या क्लान्ति न, यत्—यस्मात्, एष —शेषः, क्ष्मा—धरित्री, न क्षिपति—न पातयति ? किं वा, दिनपते —सूर्यस्य, परिश्रम —आयासः, नास्ति—न भवति, यत्—यस्मात्, (एष) निश्चल —स्थिरः, न आस्ते—न तिष्ठति ? किन्तु—वस्तुतस्तु, श्लाघ्य —प्रशंसनीयः, जन —पुरुषः, अङ्गी-कृत—स्वीकृत (कर्म), कृपणवत्—कापुरुष इव, उत्सृजन्—परित्यजन्, लज्जते—त्रपते । हि—यत, प्रतिपन्नवस्तुषु—स्वीकृतविषयेषु, निर्व्यूढम्—निर्वाहः, एतत्, सतां—साधूनां, गोत्रव्रतम्—कुलधर्म ॥ १८ ॥

हिन्दी अनुवाद—और भी—क्या शेषनाग के शरीर में (पृथ्वी के) भार से क्लेश नही होता है, जो ये पृथ्वी को (अपने सिर पर से उतार कर) नही फेंक देते हैं? अथवा सूर्य को (दिन रात चलने से) परिश्रम नही होता है, जो (ये) स्थिर नही होते हैं? किन्तु उत्तम पुरुष स्वीकार किये हुए (कार्य) को पामर की भांति परित्याग करता हुआ लज्जित होता है। क्योंकि स्वीकृत

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द्वितीयोऽङ्कः

१४५

वस्तुओं के सम्बन्ध में निर्वाह करना (अर्थात् विधिवत् उनका पालन करना), यह महापुरुषों का कुलधर्म है ॥ १८ ॥

टिप्पणी—उत्सृजन्—उद् √सृज् + शतृ हेतौ 'लक्षणहेत्वोः क्रियायाः' इत्यनेन । श्लाघ्यः—प्रशंसनीय । √श्लाघ् + ण्यत् कर्मणि । निर्व्यूढम्—निर्वाह । निर्—वि √वह् = क्त भावे । यह लुप्त 'भवति' क्रिया का कर्ता है और 'गोत्रव्रतम्' इसका विधेय विशेषण है । इस पद्य में अर्थान्तरन्यास अलंकार उपमा अलंकार से संकीर्ण है । यहाँ भी वैदर्भी रीति है, प्रसाद गुण है और शार्दूलविक्रीडित छन्द है । इस छन्द का लक्षण १, १२ में देखिए ॥ १८ ॥

राक्षसः—सखे ! प्रारब्धमपरित्याज्यमिति प्रत्यक्षमेवैतद्भवताम् । ततस्ततः ?

विराधगुप्तः—ततः प्रभृति चाणक्यहतकश्चन्द्रगुप्तस्य शरीरे सहस्रगुणमप्रमत्तः, एभ्य एव ईदृशं भवतीत्यन्विष्य निगृहीतवान् कुसुमपुरनिवासिनो युष्मदीयानाप्तपुरुषान् ।

राक्षसः—[सोद्वेगम्] वयस्य ! कथय कथय के के निगृहीताः ?

विराधगुप्तः—अमात्य ! आदावेव तावत् क्षपणको जीवसिद्धिः 'सनिकरं नगरात्निर्वासितः ।

राक्षसः—[ आत्मगतम् ] एतावत् सह्यं, न निष्परिग्रहं स्थानपरिभ्रंशः पीडयिष्यति । [ प्रकाशम् ] सखे ! कमपराधमुद्दिश्य निर्वासित एषः ?

विराधगुप्तः—एष दुरात्मा राक्षसप्रयुक्तया विषकन्यया पर्वतेश्वरं घातितवानिति ।

राक्षसः—[स्वगतम्] साधु कौटिल्य ! साधु ।

परिहृतमयशः पातितमस्मासु च घातितोऽर्धराज्यहरः ।
एकमपि नीतिबीजं वहुफलतामेति यस्य तव ॥ १६ ॥

अन्वय—अर्धराज्यहरः घातितः, अयशः परिहृतम् अस्मासु पतितम् च । यस्य तव एकमपि नीतिबीजम् बहुफलताम् एति ॥ १६ ॥

मु० रा०—१०

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१४६ मुद्राराक्षसम्

व्याख्या—अर्धराज्यहर —राज्यार्धभाक्, ( पर्वतक ) घातित —व्यापादित , ( तद्वधजनितम् ) अपश —कलङ्क , परिहृतम्—दूरीकृतम्, अस्मासु—मयि, पातित च—आरोपित च । यस्य तव, एकमपि—अद्वितीयमपि, नीतिबीज—जीवसिद्धिनिष्कासनात्मकं नीतिहेतु, बहुफलताम्—अनेकफलत्वम्, एति—प्राप्नोति ॥ १६ ॥

हिन्दी अनुवाद—राक्षस—मित्र ! प्रारम्भ किया हुआ कार्य छोड़ने योग्य नहीं है, यह तो आपके समक्ष ही है। तब क्या हुआ ?

विराधगुप्त—तब से लेकर दुष्ट चाणक्य चन्द्रगुप्त के शरीर के बारे में हजार गुने सावधान रहते हुए, इन्ही ( लोगो ) से ऐसा होता है—यह मानकर कुसुमपुर में रहने वाले आपके विश्वस्त पुरुषो को ढूंढकर कैद कर लिया।

राक्षस—[ उद्वेग के साथ ] मित्र बताओ, बताओ किन-किन को पकड़ लिया है ?

विराधगुप्त—अमात्य ! सबसे पहले तो क्षपणक जीवसिद्धि को नगर से अपमानपूर्वक निर्वासित कर दिया है।

राक्षस—[ मन मे ] इतना सह्य है, ( क्योकि ) विषयासक्ति से रहित को स्थान-परित्याग पीड़ित नही करेगा। [ प्रकट ] मित्र ! किस अपराध में यह निकाला गया ?

विराधगुप्त—इस दुष्ट ने राक्षस के द्वारा प्रयुक्त विषकन्या से पर्वतेश्वर का वध कराया ।

राक्षस—[ मन मे ] वाह कौटिल्य ! वाह।
आधे राज्य के भागी को मरवा दिया, कलंक को मिटा दिया और मुझ पर ( उस कलंक को ) लाद भी दिया। जिस तुम्हारी नीति का एक ही बीज नाना भांति के फलो को प्राप्त कर रहा है ॥ १६ ॥

टिप्पणी—प्रत्यक्षमेव—समक्षमेव। अक्ष=इन्द्रिय। अक्षाणि प्रतिगतम् इति प्रत्यक्षम् प्रादितत्०। अथवा अक्ष्णो आभिमुख्यम् इत्यर्थे ‘लक्षणेनाभिप्रती—’इत्यनेन अव्ययीभावसमास, ‘प्रतिपरसमनुभ्योऽक्ष्ण’ इत्यनेन समासान्तटच्प्रत्यय। सहस्रगुणम्—सहस्र गुणा यस्मिन् कर्मणि तत् यथा स्यात्

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द्वितीयोऽङ्कः १४७

तथा । क्रियाविशेषणमेतत् । अन्विष्य—संगृह्य । निगृहीतवान्—दण्डितवान् । युष्मदीयान्—युष्माकम् इमे इति युष्मद्+छ—ईय=युष्मदीयाः, तान् । आप्तपुरुषान्—विश्वस्तजनान् । निष्परिग्रहम्—विषयभोग या परिवार से रहित । परिगृह्यते इति परि√ग्रह्+अप् कर्मणि=परिग्रहः । निरस्तः परिग्रहः अनेन इति निष्परिग्रहः बहुव्रीहि स०, ‘इदुदुपधस्य’ इत्यनेन षत्वम् । अर्धराज्य-हरः—आधा राज्य पाने वाला । अर्धञ्च तत् राज्यम् अर्धराज्यम् कर्मधारय स० । हरतीति हरः √हृ+अच् कर्तरि । अर्धराज्यस्य हरः षष्ठीतत् ० । बहुफलताम्—बहूनि फलानि यस्य स बहुफलः बहुव्रीहि स० । तस्य भावः तत्ता, ताम् । अत्र चाणक्यस्य नीतिबीजेन फलत्रय समुत्पादितम्—(१) अर्धराज्यहरः घातितः, (२) अयशः परिहृतम्, (३) अयशः अस्मासु पातितम् । यस्य तव—यहाँ ‘यस्य’ का अन्वय ठीक नही बैठ रहा है । अतएव इसके पूर्व चूर्णाक के पद—साधु कौटिल्य ! साधु—का अध्याहार कर लेना चाहिए । इस श्लोक में काव्यलिंग अलंकार है, वैदर्भी रीति है, प्रसाद गुण है और आर्या छन्द है । आर्या का लक्षण १, ५ में देखिए ॥ १६ ॥

[ प्रकाशम् ] ततस्ततः ?

विराधगुप्तः—ततश्चन्द्रगुप्तशरीरमभिद्रोग्धुमनेन व्यापारिता दारु-वर्मादय इति नगरे प्रख्याप्य शकटदासः शूलमारोपितः ।

राक्षसः—[ सास्रम् ] हा सखे ! शकटदास ! अयुक्तस्तवायमीदृशो मृत्युः !! अथवा, स्वाम्यर्थमुपरतो न शोच्यस्त्वमसि; वयमेवात्र शोच्याः,—ये नन्दकुलविनाशेऽपि जीवितुमिच्छामः ।

विराधगुप्तः—अमात्य ! स्वाम्यर्थ एव साधयितव्य इति प्रयतसे ।

राक्षसः—सखे !—

अस्माभिरमुमेवार्थमालम्ब्य न जिजीविषाम् ।
परलोकगतो देवः कृतघ्नैर्नानुगम्यते ॥ २० ॥

अन्वयः—अमुमेव अर्थं न जिजीविषाम् आलम्ब्य कृतघ्नैः अस्माभिः परलोक-गतो देवो न अनुगम्यते ॥ २० ॥

व्याख्या—अमुमेव—उक्तरूपमेव, अर्थ—प्रयोजनम्, न जिजीविषाम्—

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१४८ | मुद्राराक्षसम्

जीवनेच्छाम्, आलम्ब्य—आश्रित्य, कृतघ्नै—कृतोपकारानभिज्ञै, अस्माभि, पर-लोकगत—लोकान्तर प्राप्त, देव—स्वामी नन्द इत्यर्थ, न अनुगम्यते—न अनुस्रियते ॥ २० ॥

हिन्दी अनुवाद— [ प्रकट ] उसके बाद ?

विराधगुप्त— तब चन्द्रगुप्त के शरीर को विनष्ट करने के लिए इसने दारुवर्मा आदि को प्रेरित किया—यह (बात) नगर में प्रसिद्ध कराकर शकटदास को शूली पर चढ़ा दिया गया ।

राक्षस— [ आँसू के साथ ] हाय मित्र ! शकटदास ! तुम्हारी ऐसी मृत्यु उचित नहीं है ।। अथवा, स्वामी के लिए मरे हो, तुम शोक करने योग्य नहीं हो, हम ही इस विषय में शोक करने योग्य हैं,—जो नन्द-वंश के विनष्ट हो जाने पर भी जीने की इच्छा कर रहे हैं ।

विराधगुप्त— अमात्य ! स्वामी का प्रयोजन ही सिद्ध करना चाहिए, इसलिए प्रयत्न कर रहे हैं ।

राक्षस— मित्र !—

इसी प्रयोजन का—न कि जीने की इच्छा का—आश्रय लेकर कृतघ्न हम दूसरे लोक में पहुँचे हुए स्वामी का अनुसरण नहीं कर रहे हैं ॥ २० ॥

टिप्पणी— अभिद्रोग्धुम्—अभिजिघांसितुम् । व्यापारिता—नियोजिता । प्रख्याप्य—उद्घाप्य । आरोपित—स्थापित । स्वाम्यर्थम्—स्वामी प्रभु अर्थ कारणं यस्मिन् तत् यथा स्यात् तथा । उपरत—मृत । शोच्य—अवश्यं शोचनीय इति √शुच् + ण्यत् कर्मणि 'प्य आवश्यकै' इति सूत्रेण कुत्वनिषेध । नन्दकुलविनाशेऽपि—अत्र 'यस्य च भावेन भावलक्षणम्' इति सूत्रेण भावे सप्तमी । जिजीविषाम्—जीवनेच्छाम् । जीवितुमिच्छा इति √जीव् + सन् + अ भावे = जिजीविषा, ताम् । यह 'आलम्ब्य' का कर्म है । कृतघ्नै—√कृ + क्त कर्मणि कृतम्, तत् घ्नन्ति विस्मरणेन इति कृत √हन् + क कर्तरि मूलविभुजादित्वात् = कृतघ्नाः, तै । इस श्लोक में काव्यलिंग और परिसंख्या अलंकारों की संसृष्टि है । इसमें वैदर्भी रीति है, माधुर्य गुण है, करुण रस है और अनुष्टुप् छन्द है । इस छन्द का लक्षण १, ३ में देखिए ॥ २० ॥

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द्वितीयोऽङ्कः । १४६

विराधगुप्तः—अमात्य ! नैतदेवम् । [ अस्माकममुमेवार्थमित्यादि पुनः पठति । ]

राक्षसः—सखे ! कथ्यतामपरस्यापि सुहृद्व्यसनस्य श्रवणे सज्जोऽस्मि ।

विराधगुप्तः—तत एतदुपलभ्य चन्दनदासेनोपारूढसाध्वसेनापवाहितममात्यकलत्रम् ।

राक्षसः—सखे ! क्रूरस्य चाणक्यवटोः विरुद्धमयुक्तमनुष्ठितं चन्दनदासेन ।

विराधगुप्तः—ननु अयुक्ततरः सुहृद्द्रोहः ।

राक्षसः—ततस्ततः ?

विराधगुप्तः—ततो याच्यमानेनापि यदा न समर्पितमनेनाऽमात्यकलत्रं ततः कुपितेन चाणक्यवटुना— ।

राक्षसः—[ सोद्वेगं ] स खलु व्यापादितः ?

विराधगुप्तः—अमात्य ! न खलु व्यापादितः, किन्तु गृहीतगृहसारः सपुत्रकलत्रः संयम्य बन्धनागारे निक्षिप्तः ।

राक्षसः—ततः किं परितुष्टः कथयसि—'अपवाहितमनेन राक्षसकलत्रम्' इति । ननु वक्तव्यं “संयतः सकलत्रो राक्षसः” इति ।

हिन्दी अनुवाद—विराधगुप्त—अमात्य ! ऐसी बात नही है । [ ‘अस्माकममुमेवार्थम्’—इत्यादि श्लोक फिर पढ़ता है । ]

राक्षस—मित्र ! कहो, दूसरे मित्र की विपत्ति भी सुनने के लिए तैयार हूँ ।

विराधगुप्त—तब यह ( शकटदास की घटना ) जानकर भयभीत हुए-चन्दनदास ने आपके परिवार को हटा दिया ।

राक्षस—मित्र ! चन्दनदास ने क्रूर वटुक चाणक्य के विरुद्ध ( यह ) अनुचित कार्य किया ।

विराधगुप्त—(किन्तु) मित्र-द्रोह तो इससे भी बुरा होता है ।

राक्षस—उसके बाद ( क्या हुआ ) ?

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१५० मुद्राराक्षसम्

विराधगुप्त—अनन्तर मांगने पर भी जब उन्होंने आपके परिवार को नहीं सौंपा तब वृद्ध वटुक चाणक्य ने—।

राक्षस—[ घबड़ाहट के साथ ] क्या वह मार दिया गया ?

विराधगुप्त—अमात्य ! मारे तो नहीं गए, किन्तु ( उनके ) घर की सारी सम्पत्ति ले ली गई और ( उन्हें ) स्त्री-पुत्र सहित पकड़ कर कारागार में डाल दिया गया ।

राक्षस—तब क्या तुम सन्तुष्ट होकर यह रहे हो कि उसने राक्षस के परिवार को दूर कर दिया । वस्तुत ( यह ) कहना चाहिए कि स्त्री-पुत्र सहित राक्षस को पकड़ लिया गया ।

टिप्पणी—अस्माकमुमुमेवार्थम्—इसका तात्पर्य यह है कि जो लोग उपकारी स्वामी का कार्य सम्पन्न किये बिना उसका अनुगमन करते हैं, वे कृतघ्न कहलाते हैं । आप तो स्वामी का कार्य सिद्ध करने के लिए रह रहे हैं, इसलिए आप कृतघ्न नहीं हैं । एतदुपलभ्य—यह उपलब्ध करके अर्थात् जानकर । इसका तात्पर्य है शकटदास के शूलारोपण की घटना से । उपारूढसाध्वसेन—उपारूढं समुत्पन्नं साध्वसं भयं यस्य स उपारूढसाध्वस बहुव्रीहि स०, तेन । अपवाहितम्—हटा दिया । अप √वह् + णिच् + क्त कर्मणि । अयुक्ततर—अतिशयेन अनुचित । सुहृद्द्रोह—मित्र के विरुद्ध आचरण करना । सुष्ठु हृदयमस्य इति सुहृद् बहुव्रीहि स०, हृदयस्य हृदादेश । तस्य द्रोह सुप्सुपा स० । गृहीतगृहसार—गृहस्य सार श्रेष्ठवस्तु गृहसार । गृहीत गृहसार यस्य स । बन्धनागारे—जेल में । √बन्ध् + ल्युट् अधिकरणे = बन्धनम् । बन्धनञ्च तदागारश्च कर्मधारय स०, तस्मिन् ।

[ प्रविश्य पटाक्षेपेण पुरुष ] जेटु अमच्चो । अज्ज ! एसो क्खु सअडदामो पडिहारभूमिमुवत्थिदो ( जयत्वमात्य । आर्य ! एष खलु शकटदास प्रतिहारभूमिमुपस्थित ।)

राक्षस—प्रियवदक ! अपि सत्यम् ?

प्रियवदक—किं अलिअं अमच्चपादेसु विणिवेदेमि ? ( किमलीकममात्यपादेषु विनिवेदयामि ?)

राक्षस—सखे ! विराधगुप्त ! कथमेतत् ?

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द्वितीयोऽङ्कः १५१

विराधगुप्तः—अमात्य ! स्यादेतदेवं यतो भव्यं रक्षति भवितव्यता ।

राक्षसः—प्रियंवदक ! यद्येवं, तत् किं चिरयसि ? क्षिप्र प्रवेशय तम् ।

प्रियंवदकः—जं अमच्चो आणवेदि त्ति । ( यदमात्य आज्ञापयति ।)

[ इति निष्क्रान्तः । ]

[ ततः प्रविशति सिद्धार्थकेनानुगम्यमानः शकटदासः । ]

शकटदासः—[ दृष्ट्वा स्वगतम् ]—

दृष्ट्वा मौर्यमिव प्रतिष्ठितपदं शूलं धरित्र्यास्तले
तल्लक्ष्मीमिव चेतसः प्रमथनीमुन्मुच्य वध्यस्रजम् ।
श्रुत्वा स्वाम्युपरोधरोद्रविषमानाध्माततूर्यस्वनान्
न ध्वस्तं प्रथमाभिघातकठिनं मन्ये मदीयं मनः ॥ २१ ॥

अन्वयः—मन्ये प्रथमाभिघातकठिनं मदीयं मनः मौर्यमिव धरित्र्यास्तले प्रतिष्ठितपदं शूलं दृष्ट्वा तल्लक्ष्मीमिव चेतसः प्रमथनी वध्यस्रजम् उन्मुच्य स्वाम्युपरोधरोद्रविषमान् आध्माततूर्यस्वनान् श्रुत्वा न ध्वस्तम् ॥ २१ ॥

व्याख्या—मन्ये—शङ्के, प्रथमाभिघातकठिनं—प्रथमाः पूर्वप्राप्ताः ये अभिघाताः प्रहाराः तैः कठिनं घनं, मदीयं—मम, मनः—चेतः, मौर्यमिव—चन्द्रगुप्तमिव, धरित्र्याः—पृथिव्याः, तले—पृष्ठे, प्रतिष्ठितपदं—बद्धमूलं, शूलं—मारणार्थलौहदण्डं, दृष्ट्वा—अवलोक्य, तल्लक्ष्मीमिव—चन्द्रगुप्तश्रिय-मिव, चेतसः—हृदयस्य, प्रमथनी—विदारणी, वध्यस्रजं—वध्यचिह्नभूतां रक्त-कुसुममालाम्, उन्मुच्य—परिधाय, स्वाम्युपरोधरोद्रविषमान्—स्वामिनः प्रभोः नन्दस्य यः उपरोधः हिंसा तदिव रौद्रान् घोरान् विषमान् कर्कशान्, आध्मात-तूर्यस्वनान्—ताडितडिण्डिमशब्दान्, श्रुत्वा—निशम्य, न ध्वस्तम्—न विदीर्णम् ॥ २१ ॥

हिन्दी अनुवाद—[ पर्दे को बिना हटाये एक पुरुष प्रवेश करके ] अमात्य की जय हो । आर्य ! ये शकटदास दरवाजे पर आये हुए हैं ।

राक्षस—प्रियंवदक ! क्या ( यह ) सत्य है ?

प्रियंवदक—क्या अमात्य के चरणों में मिथ्या निवेदन करूँगा ?

राक्षस—मित्र ! विराधगुप्त ! यह कैसे ?