मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
by महाकवि विशाखदत्त
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Read in context१५० मुद्राराक्षसम्
विराधगुप्त—अनन्तर मांगने पर भी जब उन्होंने आपके परिवार को नहीं सौंपा तब वृद्ध वटुक चाणक्य ने—।
राक्षस—[ घबड़ाहट के साथ ] क्या वह मार दिया गया ?
विराधगुप्त—अमात्य ! मारे तो नहीं गए, किन्तु ( उनके ) घर की सारी सम्पत्ति ले ली गई और ( उन्हें ) स्त्री-पुत्र सहित पकड़ कर कारागार में डाल दिया गया ।
राक्षस—तब क्या तुम सन्तुष्ट होकर यह रहे हो कि उसने राक्षस के परिवार को दूर कर दिया । वस्तुत ( यह ) कहना चाहिए कि स्त्री-पुत्र सहित राक्षस को पकड़ लिया गया ।
टिप्पणी—अस्माकमुमुमेवार्थम्—इसका तात्पर्य यह है कि जो लोग उपकारी स्वामी का कार्य सम्पन्न किये बिना उसका अनुगमन करते हैं, वे कृतघ्न कहलाते हैं । आप तो स्वामी का कार्य सिद्ध करने के लिए रह रहे हैं, इसलिए आप कृतघ्न नहीं हैं । एतदुपलभ्य—यह उपलब्ध करके अर्थात् जानकर । इसका तात्पर्य है शकटदास के शूलारोपण की घटना से । उपारूढसाध्वसेन—उपारूढं समुत्पन्नं साध्वसं भयं यस्य स उपारूढसाध्वस बहुव्रीहि स०, तेन । अपवाहितम्—हटा दिया । अप √वह् + णिच् + क्त कर्मणि । अयुक्ततर—अतिशयेन अनुचित । सुहृद्द्रोह—मित्र के विरुद्ध आचरण करना । सुष्ठु हृदयमस्य इति सुहृद् बहुव्रीहि स०, हृदयस्य हृदादेश । तस्य द्रोह सुप्सुपा स० । गृहीतगृहसार—गृहस्य सार श्रेष्ठवस्तु गृहसार । गृहीत गृहसार यस्य स । बन्धनागारे—जेल में । √बन्ध् + ल्युट् अधिकरणे = बन्धनम् । बन्धनञ्च तदागारश्च कर्मधारय स०, तस्मिन् ।
[ प्रविश्य पटाक्षेपेण पुरुष ] जेटु अमच्चो । अज्ज ! एसो क्खु सअडदामो पडिहारभूमिमुवत्थिदो ( जयत्वमात्य । आर्य ! एष खलु शकटदास प्रतिहारभूमिमुपस्थित ।)
राक्षस—प्रियवदक ! अपि सत्यम् ?
प्रियवदक—किं अलिअं अमच्चपादेसु विणिवेदेमि ? ( किमलीकममात्यपादेषु विनिवेदयामि ?)
राक्षस—सखे ! विराधगुप्त ! कथमेतत् ?