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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

Page 226 of 488

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Page 226

द्वितीयोऽङ्कः १३५

वाहनेषु—बहिः निगृहीतानि नियन्त्रितानि वाहनानि अश्वादयो यैः तादृशेषु, स्थितेषु, चन्द्रगुप्तानुयायिषु, भूमिपालेषु—राजसु, युष्मत्प्रयुक्तेनैव, चन्द्रगुप्तनिपा-दिना—वृषलहस्तिपकेन, वर्वरकेण—तदाख्येन, कनकदण्डान्तर्निहिताम्—कनकस्य स्वर्णस्य दण्डो यष्टी तस्य अन्तः अभ्यन्तरे निहितां स्थापिताम्, असिपुत्रिकां—छुरिकाम्, आक्रष्टुकामेन—बहिर्निःसारणेच्छुना, करेण—हस्तेन, कनकश्शृङ्खला-वलम्बिनी—कनकस्य सुवर्णस्य शृङ्खला बन्धनरज्जुः ताम् अवलम्बते तच्छीलेति, कनकदण्डिका सुवर्णयष्टिः, अवलम्बिता—धृता। उभयोः दारुवर्मवर्वरकयोः, अस्थाने—अयुक्तस्थाने, यत्नः—उद्योगः।

हिन्दी अनुवाद—विराधगुप्त—तदन्तर पहले ही चन्द्रगुप्त के अर्धरात्रि के समय नन्दभवन में प्रवेश का प्रचार हो जाने पर, वैरोचक के अभिषेक कर दिये जाने पर, उज्ज्वल मोतियों की लंबी लटकती मालाओं से खचित रंग-बिरंगे कंचुक से (वैरोचक के) शरीर के ढक जाने पर, मणिनिर्मित मुकुट से कसकर जकड़े हुए अत्यन्त सुन्दर केशपाश के होने पर, सुगन्धित गजरे के जनेऊ की तरह धारण करने से विशाल वक्षःस्थल के शोभासम्पन्न होने पर, परिचितों से भी न पहचानी जाती हुई आकृति के होने पर और दुष्ट चाणक्य के आदेश से चन्द्रगुप्त के चढ़ने योग्य चन्द्रलेखा नामक हथिनी पर चढ़कर चन्द्रगुप्त के अनुयायी राजाओं से अनुसरण किये जाते हुए वैरोचक के शीघ्रता से महाराज नन्द के भवन में प्रवेश करने पर आपके भेजे हुए शिल्पी दारुवर्मा ने 'यह चन्द्रगुप्त है' ऐसा समझकर वैरोचक के ऊपर गिराने के लिए तोरण रूपी यन्त्र को संभाल लिया। इसी बीच चन्द्रगुप्त के अनुयायी राजाओ के बाहर वाहनों को रोककर ठहर जाने पर आपके भेजे हुए चन्द्रगुप्त के महावत बर्बरक ने सोने की छड़ी के भीतर रखी हुई छुरी को खींचने की इच्छा से सोने की जंजीर से लटकती हुई सोने की छड़ी (की मूठ) को हाथ से पकड़ लिया।

राक्षस—दोनों का प्रयत्न अनुचित स्थान पर है। तब तब?

टिप्पणी—कृताभिषेके—कृतः अभिषेकः यस्य असौ कृताभिषेकः, तस्मिन्। वैकक्षक—जनेऊ की तरह पहना हुआ हार। विशिष्टः कक्षः अस्मात् इति विकक्षम् प्रादिबहुव्रीहि स०। विकक्षे भवम् इति विकक्ष + अण् + कन् स्वार्थे = वैकक्षकम्। उपवाह्याम्—उप √वह् + ण्यत् कर्मणि। यह 'गजवशाम्' का विशेषण है। यन्त्रतोरणम्—यन्त्रकलितं यन्त्रयुक्तं यन्त्रमुक्तं वा तोरणम्