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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

Page 229 of 488

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Page 229

१३८ मुद्राराक्षसम्

विराधगुप्त — म, खलु वैद्यस्तदेवौषधं पायित उपरतश्च ।

राक्षस —[सविषादम्] अहह ! महान् विज्ञानराशिरुपरत । भद्र ! अथ तस्य शयनाधिकृतस्य प्रमोदकस्य किं वृत्तम् ?

विराधगुप्त —यत् इतरेषाम् ।

राक्षस —[सोद्वेगम्] कथमिव ?

हिंदी अनुवाद—राक्षस—कष्ट की बात है । दो अनर्थ हो गए । न मरा चन्द्रगुप्त, मर गए वैरोचक और वर्वरक ।। [ आवेग के साथ मन में ] ये दोनों नहीं मारे गए, भाग्य ने हमे ही मार दिया । [ प्रकट ] अच्छा वह शिल्पी दारु-वर्मा कहाँ ( है ) ?

विराधगुप्त—(उसे तो) वैरोचक के पीछे पैदल चलने वाले लोगो ने ढेले मार-मार कर मार दिया ।

राक्षस—[ आंसू के साथ ] कष्ट है ! ओह ! स्नेही बंधु दारुवर्मा से हम वियुक्त हो गए हैं । अच्छा, वहां रहने वाले वैद्य अभयदत्त ने क्या किया ?

विराधगुप्त—अमात्य ! सब कुछ किया ।

राक्षस—[ हर्ष के साथ ] क्या दुष्ट चन्द्रगुप्त मारा गया ?

विराधगुप्त—अमात्य ! भाग्य से न मारा गया ।

राक्षस—[ दुःख के साथ ] तब बता अभी प्रसन्न होकर कह रहे हो कि सब कुछ किया ।

विराधगुप्त—अमात्य ! उसने विष के चूर्ण मे मिश्रित ओषधि चन्द्रगुप्त के लिए तैयार की । किन्तु उसका निरीक्षण करते हुए दुष्ट चाणक्य ने सोने के पात्र मे बदला हुआ रङ्ग पाकर चन्द्रगुप्त से कहा—'चन्द्रगुप्त ! ओषधि विष से मिश्रित मालूम होती है, नही पीनी चाहिए ।'

राक्षस—यह मूर्ख दुष्ट है । अच्छा, उन वैद्य पर क्या बीती ?

विराधगुप्त—उस वैद्य को वही ओषधि पिला दी गई और वह मर गया ।

राक्षस—[ विषाद के साथ ] हाय ! महान् वैज्ञानिक उठ गया । अच्छा, भद्र ! शयन-कक्ष के अधिकारी उस प्रमोदक का क्या हुआ ?