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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

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द्वितीयोऽङ्कः १३३

विराधगुप्त—तब दुष्ट चाणक्य ने शुभ लग्न के कारण आज आधी रात के समय चन्द्रगुप्त का नन्द-भवन में प्रवेश होगा—इस बात से कारीगरों और नागरिकों को अवगत कराकर उसी समय पर्वतेश्वर के भाई वैरोचक को चन्द्रगुप्त के साथ एक आसन पर बैठाकर पृथ्वी रूपी राज्य का आधा हिस्सा लगा दिया ।

राक्षस—क्या पर्वतेश्वर के भाई वैरोचक को पहले का स्वीकारा हुआ राज्य दे दिया ?

विराधगुप्त—और क्या ?

राक्षस—[ मन में ] निश्चय ही अतिदुष्ट ( चाणक्य ) ने उस बेचारे की भी कोई रहस्यमय हत्या सोचकर पर्वतेश्वर के विनाश से उत्पन्न अपयश को मिटाने के लिए यह जनता में धारणा बना दी है । [ प्रकट ] तब तब ?

टिप्पणी—अफलम्—अविद्यमानं फलम् अस्मिन् इति अफलः नञ्बहुव्रीहि स०, तम् । अनिष्टफलम्—न इष्टम् अनिष्टम् नञ्तत् ० । अनिष्टं फलम् अस्य इति अनिष्टफलः बहुव्रीहि स०, तम् । अनुकूललग्नवशात्—√ लग् + क्त कर्तरि लग्नम् । अनुकूलं लग्नम् कर्मधारय स० । तस्य वशम् = आयत्तता षष्ठीतत्०, तस्मात् । गृहीतार्थान्—जिन्हे बात मालूम हो गई हो । गृहीतः अर्थः = विषयः यैः ते गृहीतार्थाः, तान् । अतिसृष्टः—दे दिया । अति √ सृज् + क्त कर्मणि । उपांशुवधम्—एकान्त मे की जाने वाली हत्या को । 'उपांशु' यह एक अव्यय है । उपांशु वधः सुब्सुपा स०, तम् । आकलय्य—विचार कर । आ √ कल् + णिच् स्वार्थे + क्त्वा—ल्यप् । लोकप्रतिपत्तिः—लोक में प्रसिद्धि । प्रति √ पद् + क्तिन् भावे = प्रतिपत्तिः । लोके प्रतिपत्तिः सुब्सुपा स० । उपचरिता—फैला दी है । उप √ चर् + क्त कर्मणि । यहाँ राक्षस यह समझ रहा है कि वैरोचक को आधा राज्य देकर चाणक्य पर्वतेश्वर की हत्या के कलंक को धोना चाहता है; किन्तु राक्षस को यह पता नहीं है कि चाणक्य की कूटनीति ने जनता में यह अफवाह फैला रखी है कि पर्वतेश्वर को मरवाने वाला राक्षस ही है ।

विराधगुप्तः—ततः प्रथममेव प्रकाशिते चन्द्रगुप्तस्यार्धरात्रे नन्दभवन-प्रवेशे कृताभिषेके च वैरोचके विमलमुक्तागुणपरिक्षेपोपरचितपटवारवाण-प्रच्छादितशरीरे मणिमयमुकुटनिबिडनियतरुचिरतरमौलौ सुरभिकुसुम-दामवैकक्षकावभासितविपुलवक्षः स्थले परिचिततमैरप्यनभिज्ञायमानाकृतौ