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मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

by सतगुरु मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished120 pages
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रहट की तरह चारों युग चलते जाते हैं। चार युग का अंत हो जाता है तो फिर निरंजन आग बरसाता है। वो पानी-ही-पानी करके पृथ्वी का नाश कर देता है। पर ऐसे में स्वर्ग रहता है, तैंतीस करोड़ देवता भी रहते हैं, बड़े-बड़े तपस्वी रहते हैं। इस तरह 72 चौकड़ी (चार युग) बीत जाती है। यह निरंजन उत्पत्ति करके फिर-फिर प्रलय करता रहता है। क्योंकि यह परम-पुरुष की सेवा से ही राज्य का फल पा रहा है।

महा प्रलय जब किया निरंजन अग्नि सेवत ना रहो ॥
लोमस ऋषि तब होय अंतहि शशि भानु पानी सब गयो ॥
तीन गुन पांच तत्व बीते दस चार सुत आकाश हो ॥
महा देवी आदि कन्या ताही करै वह गरास हो ॥
सब भक्षै निरंजन राय, आदि अंत ना कछु रहै ॥
शिव कन्यानाम बिहाय, सब जी राखै आपमें ॥

जब निरंजन महाप्रलय करता है तब सूर्य, चाँद, जल, अग्नि आदि कुछ भी नहीं रहता। तब लोमश ऋषि का भी अंत हो जाता है। सब गुण और तत्व आकाश में लय हो जाते हैं। आदि शक्ति (माया) को भी निरंजन ग्रसित कर लेता है। इस तरह निरंजन सबको खा जाता है। कुछ भी शेष नहीं रह जाता। सब जीवों को वो अपने में रख लेता है।

सतगुरु दया जाहि पर होई। नाम प्रताप बाचै जन सोई ॥
निज घर हंसा करहि पयाना। और सकल जीव तहाँ समाना ॥
जाई रहैं जहाँ धर्महि द्वीपा। प्रथम करी जो लोक समीपा ॥
उत्पत्ति कारण सेवा करहीं। पुनि यहि भांति सृष्टि अनुसरहीं ॥
भक्त अभक्त सबै पुनि खाई। सबको भक्षै निरंजन राई ॥
सो पुनि महिमा वेद बखाने। वेद पढ़े पर भेद न जाने ॥

साहिब कह रहे हैं कि जिसपर सदगुरु की दया हो जाती है, वो ही नाम के प्रताप से इस कठिन निरंजन से बचकर अपने घर प्रस्थान करता है। नहीं तो यह सबको खा जाता है और फिर अमर-लोक के आस-पास जाकर परम-पुरुष से पुकार करता है कि उसे दुबारा सृष्टि

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करनी है। चाहे कोई भक्त है या अभक्त, यह किसी को भी नहीं छोड़ता है, सबको खा जाता है। फिर वेद पता नहीं किसकी महिमा कह रहे हैं! लोग वेदों को तो पढ़ रहे हैं, पर इस रहस्य को नहीं समझ पा रहे हैं।

जेहि को भरोसा सोई चुरावै कहो तब कैसी बने।
सेवा करै जेहि पुरुष की सो भक्षण प्रति दिन करे ॥
जानी कै बूझो नहिं के तो कहो समुझाय हो।
आदि अंत सबै ग्रसै अस निरंजन राय हो ॥

जिसपर भरोसा किया जाए, वही चोरी कर ले तो कैसी बात है! इस तरह जीव जिस काल निरंजन की भक्ति कर रहे हैं, वो ही उन्हें अंतकाल में खा जाता है। प्रत्यक्ष जानकर भी लोग समझ नहीं पा रहे हैं। मैंने बड़ा समझाया कि निरंजन सबको खा जायेगा, पर कोई समझ नहीं पा रहा है।

काल सबन को खाय, हरि हर ब्रह्मा से बसै।
बाचै कौन उपाय, एक नाम जाने बिना ॥

हरि, हर, ब्रह्मा आदि को भी निरंजन नहीं छोड़ेगा। एक नाम के बिना कोई भी जीव बच नहीं सकता है।

<!-- image: Decorative separator consisting of four stylized floral or geometric symbols. -->

हरि हर ब्रह्मा को है नाऊँ। रजगुण व्यापि रहा सब ठाऊँ ॥
ब्रह्मा को पूजै संसारा। सो जिव होय न भव के पारा ॥

मन के 12 पंथ

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मन के 12 पंथ


कबीर पंथ की जितनी भी भक्तियाँ हैं, निरंजन के अधीन हैं। निरंजन को पराधीन किया साहिब ने तो प्रार्थना की, कहा कि धरती पर जाओगे तो यह चीज़ फैलाओगे। फिर तो सभी चले जायेंगे। फिर शब्द दिया है। धरती पर आत्माएँ रखनी हैं या नहीं?

जैसा कि पहले भी बताया कि कई बार निरंजन महाप्रलय भी करता है। पूरे ब्रह्माण्ड का नाश करता है। सभी ग्रह नक्षत्र को खत्म करके अपने में समाता है। पूरी आत्माओं को लेकर अमर-लोक के पास जाता है, परम-पुरुष को पुकार करता है, कहता है कि ये सारी आत्माएँ वापिस लो, मुझे नहीं बनानी है सृष्टि। वहाँ से आवाज़ आती है कि हे निरंजन, जाओ, दुबारा सृष्टि करो, तुमने वरदान पाया है, अब जाओ, फिर बनाओ।

कई बार सवाल उठता होगा कि इतनी मेहनत क्यों करनी है? पूरी दुनिया को साहिब मुक्ति दे सकते हैं। इसमें से उन्हें नहीं ले जाना है, जो दुनिया को पसन्द कर रहे हैं। निरंजन भी आखिर साहिब का ही तो बेटा है। निरंजन ने प्रश्न किया, कहा कि जो भी आपकी भक्ति में आ जायेगा, पार हो जायेगा। तो यह संसार खाली हो जायेगा। ले चलो फिर मुझे भी, खाली करो संसार। फिर कहा कि या जीवों को उलझन में रखो। तुम्हारे 12 पंथ मैं भी चलाऊँगा। साहिब ने कहा कि ठीक है। इसलिए उलझाव है।

<table><tbody><tr><td>द्वादश</td><td>पंथ</td><td>काल</td><td>परमाना।</td></tr><tr><td>भूले</td><td>जीव</td><td>न</td><td>पाय</td><td>ठिकाना॥</td></tr></tbody></table>

इनमें से कोई बीजक की बात करेगा, कोई आत्मा को ही

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परमात्मा कहेगा, कोई सतनाम की बात करेगा, कोई राम की भक्ति करेगा, कोई परम धाम की बात करेगा, कोई केवल हरिजनों की बात करेगा।

इसलिए ये सभी वंशगत चलेंगे। इनके लोग अमर लोक में नहीं जायेंगे; निरंजन के ही अधीन रहेंगे।

47 लाख साल के 4 युग होते हैं। 4 युग हो गये तो एक चौकड़ी हुआ। 100 बार चार युग हुए तो 100 चौकड़ी युग हुए। 100 के बाद हजार, फिर दस हजार, फिर लाख, फिर दस लाख, फिर करोड़, फिर दस करोड़, अरब, 10 अरब, फिर खरब, फिर नील, दस नील, पदम, दस पदम, संख्य, 10 संख्य, असंख्य, 10 असंख्य, फिर अनन्त।

4 असंख्य चौकड़ी युग हो चुके हैं। यानी अरबों बार सृष्टि का नाश हो चुका है।

परम-पुरुष ने कहा कि इतना राज्य करना ही है। एक बार निरंजन ने कहा कि मुझे भी नाम दे दो। साहिब ने कहा कि यदि तुझे नाम दे दूँगा तो तू कभी छल नहीं कर सकेगा। छल छोड़ दिया तो आत्माएँ निकल जायेंगी।

अब यहाँ आदमी संस्पेंशन में आ जाता है। इसका मतलब है कि सत्पुरुष चाहते हैं कि सभी जीव न निकलें। और शाप दिया कि एक लाख जीव रोज़ खाना तो यह तो जीवों को ही कष्ट दिया। नहीं, यह कष्ट निरंजन को है। जब आपको चोट पहुँचती है तो यह आत्मा को कष्ट नहीं होता है। आत्मा का कुछ नहीं बिगड़ता है। यह कष्ट निरंजन को होता है। उसी को मुसीबत दी है। वो दर्द उसे होता है। यह समझाना कितना कठिन है।

कई जन्म आपने पहले निरंजन की भक्ति की है। कई जन्मों तक पुण्य कर्म किये। आप महा भाग्यवान हैं। अब आप सद्गुरु की शरण में पहुँचकर नाम प्राप्त किये। आप साधारण नहीं हैं। इसलिए आपका नम्बर लगा है। या फिर स्वयं संतजन कृपा कर देते हैं।

मन का तोड़

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मन का तोड़


हर एक बीमारी का कोई न कोई इलाज, कोई न कोई तोड़ जरूर होता है। यह अलग बात है कि कोई बीमारी डॉक्टरों की पकड़ में नहीं आती या फिर किसी बीमारी का उन्हें इलाज नहीं मिल पाता जबकि किसी बीमारी का धीरे धीरे वो काट दूँढ़ निकालते हैं।

मन भी आत्मा पर एक बीमारी की तरह लगा हुआ है। सबका हृदय इसने गंदा करके रखा हुआ है। फिर यह बीमारी है भी बड़ी ताकतवर। क्या इसका भी कोई इलाज है? हमारे ऋषि, मुनि, पीर-पैगंबर किसी के पास इसका तोड़ नहीं था।

साहिब कह रहे हैं—

नाम होय तो माथ नमावे। ना तो यह मन बाँध नचावे ॥

निःसंदेह इस मन का कोई जोर आपपर नहीं चल रहा है। मन बेबस है। पूरी दुनिया को यह नचा रहा है। एक नशा-सा मन का सबके ऊपर है। माया का एक नशा-सा सबके ऊपर छाया है। पर आप मन की पकड़ से आजाद हैं। मन का नशा छाता है तो काम, क्रोध आदि जाग्रत होते हैं। ये चीजें आपमें भी हैं, पर आपके पूरे कण्ट्रोल में हैं। आपका ये चीजें कुछ नहीं बिगाड़ पा रही हैं।

पुरुष शक्ति जब आन समाई। तब नहीं रोके काल कसाई ॥

कहा कि जब परम-पुरुष की ताकत आकर समायेगी तो काल कुछ नहीं कर पायेगा। जिस दिन नाम मिलता है उस दिन परम-पुरुष की

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ताक़त आकर समाती है। तब काल का जोर नहीं चलता है।

मैंने जो कहा कि जो वस्तु मेरे पास है, वो कहीं नहीं है, प्रमाणित करता हूँ। पूर्ण गुरु आपको बदल देता है, दिव्य-दृष्टि खोल देता है। 10वाँ द्वार खुलता है तो चाँद, तारे आदि नज़र आते हैं, पर जब 11वाँ द्वार खुलता है तो मन नज़र आता है।

वो दिव्य-दृष्टि खुलेगी तो काम, क्रोध दिखेगा। अन्यथा कितनी भी तपस्या करना, यह मन काबू में नहीं आयेगा, यह समझ नहीं आयेगा। कपिल मुनि, पाराशर ऋषि आदि ने कम तप नहीं किया था। पर नहीं हो सका मन काबू में। इसलिए—

नाम होय तो माथ नमावे। ना तो यह मन बाँध नचावे ॥

परम पुरुष की इच्छा से साहिब हर युग में निरंजन के लोक में आते हैं और जीवों को काल से कष्ट से छुड़ाकर अमर-लोक ले जाते हैं। पहली बार जब साहिब धरती पर आए तो 100 साल रहकर वापिस गये। पर एक भी जीव को नहीं ले जा सके। परम-पुरुष ने पूछा कि कोई भी जीव नहीं लाए। कहा—नहीं। परम-पुरुष ने पूछा—क्यों? कहा कि जिसे सुबह समझाता हूँ, शाम को भुला देता है। जिसे शाम को समझाता हूँ, वो सुबह भुला देता है। तब परम-पुरुष ने कहा कि यह लो गुप्त वस्तु (नाम)। जिस घट में यह वस्तु दे दोगे, उसपर काल का जोर नहीं चलेगा।

तब परम-पुरुष को प्रणाम करके उनकी आज्ञा से साहिब शून्य में निरंजन के लोक की ओर आए। जब साहिब आने लगे तो निरंजन झांझरी द्वीप में साहिब के सम्मुख आया, बोला—यहाँ क्यों आए हो? वापिस जाओ। यहाँ पर निरंजन और साहिब के मध्य बड़ी गोष्ठी हुई।

साहिब ने कहा—

तासो कह्यो सुनो धर्मराई। जीव काज संसार सिधाई ॥

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तप्त शिला पर जीव जरावहु। जारि वारि निज स्वाद करावहु॥
तुम अस कष्ट जीव कह दीन्हा। तबहि पुरुष मोहि आज़ा कीन्हा॥
जीव चिताय लोक लै जाऊँ। काल कष्ट से जीव बचाऊँ॥

कहा कि हे निरंजन, तुमने बहुत छल, बल से जीवों को बाँधा हुआ है। तप्त शिला पर उन्हें अनेक कष्ट देकर आनन्द लूट रहे हो। परम पुरुष ने मुझे यहाँ भेजा है, मैं जीवों को यहाँ से छुड़ाकर अमर लोक ले जाऊँगा।

तबै निरंजन बोले बानी। सकल जीव बस हमरे ज्ञानी॥
तिनसौ साठ पैठ उरझोरा। कैसे हंसन लेव उबेरा॥

निरंजन ने कहा कि मैंने सबको उलझाया हुआ है। 360 ऐसे स्थान हैं, जहाँ निरंजन ने थोड़ी-थोड़ी शक्तियाँ रखी हुई हैं। उन्हीं को देख जीव उलझा हुआ है। निरंजन ने कहा कि कैसे छुड़ाओगे हंसों को? तब ज्ञानी अस बोले बानी। जमते जीव छुड़ावहुँ आनी॥
पुरुष नाम को कहुँ समझाई। जम राजा तब छोड़ि पराई॥
घाट घाट बैठे उरझोरा। हमरे शब्द ते होय निबेरा॥
सुन रे काल दुष्ट अन्याई। शब्द संग हंसा घर जाई॥

साहिब ने कहा कि मेरे पास नाम है, जिसके सहारे हंस अमर लोक पहुँच जायेगा। अब तुम उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाओगे।

तब निरंजन ने कहा—

का ज्ञानी देहो अधिकारा। हमरो नाहिं छूटे जम जारा॥
पाँच पचीस तीन गुन आही। यह लै सकल शरीर बनाई॥
तामें पाप पुण्य का वासा। मन बैठा ले हमरी फाँसा॥
जहाँ तहाँ जग भरमावै। ज्ञान संधि कुछ रहन न पावै॥
एक शब्द की केतिक आशा। मेरे हैं चौरासी फाँसा॥

कहा कि तुम जीवों को मुझसे छुड़ाकर नहीं ले जा सकते हो। मैंने पाँच तत्वों से शरीर की रचना की है। उस पर फिर पाप पुण्य में जीवों को बाँध दिया है। फिर मन रूप में खुद भी अन्दर समाया हुआ हूँ। किसी

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को सोचने भी नहीं दे रहा हूँ कि क्या मामला है। तुम्हारा एक शब्द क्या करेगा, मैंने 84 लाख फॉसैं बनाई हुई हैं, एक में से निकाल दूसरी में फेंक देता हूँ।

बोले ज्ञानी शब्द विचारी। छूटे चौरासी की धारी।
छूटै पाँच पचीस गुण तीनों। ऐसा शब्द पुरुष मैं दीन्हो॥

साहिब ने कहा कि मेरे पास बड़ा जबरदस्त नाम है, जिस घट में दे दूँगा, उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाओगे, वो आजाद हो जायेगा।

निरंजन ने कहा—

हे ज्ञानी का करो बढाई। हमते नाहिं छूट जीव जाई॥
इतने युग भये तुम देखा। ज्ञानी हंस न एको पेखा॥
का तुम करो का शब्द तुमारा। तीन लोक परलय कर डारा॥
साधु संत हम देखी रीति। परलय परे सकल जगग जीति॥
करम रेख बाँधै सब साधा। सुर नर मुनि सकलो जग बाँधा॥

कहा कि इतने युग हो गये, क्या एक भी हंस सतलोक पहुँचा। मैंने इतनी ताकत से जीवों को बाँधा हुआ है कि छूट नहीं सकते हैं। तुम और तुम्हारा एक शब्द क्या कर लेगा। मैं तीन लोक का नाश कर देता हूँ।

निरंजन ने कई बार सृष्टि का प्रलय भी किया है। जलेबी बना देता है दुनिया की। ये सब काम साहिब के नहीं हैं।

तो निरंजने ने कहा कि इतने पर भी कर्मों में जीव को बाँधा हुआ हूँ। आम आदमी की क्या बात है, देवता, मुनि आदि सबको बाँधा हुआ है। एक भी हंस को जाने नहीं दूँगा।

ज्ञानी कहै काल अन्यायी। शब्द बिना तू खाय चबायी॥
हंस हमारा शब्द अधिकारा। पुरुष परताप को करे सम्हारा॥
नाम जपै अरु सुरति लगाई। मिले कर्म लागे नहीं काई॥
शब्द मानि होय शब्द सरूपा। निश्चय हंसा होय अनूपा॥

साहिब ने कहा कि हे निरंजन, तब इनके पास सच्चा नाम नहीं था, तूने खा लिया। अब मैं परम पुरुष का बड़ा जबरदस्त नाम दूँगा और

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तुम्हारा जोर अब जीव पर नहीं चलने दूँगा। पाप और पुण्य का ज्ञान भी जीव को अन्दर से होता जायेगा। नाम उनकी रक्षा करेगा और सब बंधनों से छुड़ाकर अमर-लोक ले जायेगा।

निरगुन काल तब बोले बानी। उरझे जीव सकल जमखानी॥
कैसे के तुम शब्द पसारो। कौने विधि तुम जीव उबारो॥
ऐसे जीव सकल हैं करनी। कैसे पहुँचैं पुरुष की सरनी॥
जग में जीव क्रोध विकारा। कैसे पहुँचैं पुरुष के द्वारा॥

निरंजन ने कहा कि मैंने काम, क्रोधादि विकारों में जीव को फँसा दिया है। फिर वे परम पुरुष के लोक में कैसे पहुँचेंगे। इस पर भी यम के 14 दूत मैंने प्रत्येक शरीर में बिठाए हुए हैं। तुम उन्हें कैसे निकालोगे? कहा कि जीव बड़ा गंदा हो गया है, तुम्हारी बात कोई नहीं मानेगा।

ज्ञानी कहे करहु वरियारा। हमतो कीन्ह सकल निरवारा॥
जोई ज्ञानी होय हमारा। काम क्रोध ते होय नियारा॥
तूस्ना लोभहि देई बहाई। विषै जन्म सब दूर पराई॥
नाम ध्यान बल हंसा घर जाई। क्या रे काल तुम करो बड़ाई॥

साहिब ने कहा कि जिस शरीर में नाम दे दूँगा, वहाँ तेरा जोर नहीं चलेगा। वहाँ काम, क्रोध आदि कुछ नहीं कर सकेंगे और वो जीव निर्मल हो जायेगा। तुम उस जीव को छू भी नहीं कर पाओगे और वो हंस रूप होकर अपने देश चला जायेगा।

कहे निरंजन सुनो हो ज्ञानी। कथि हो ज्ञान तुम्हारी बानी॥
युगत महात्म सबै बताऊँ। तुम्हारा नाम ले पंथ चलाऊँ॥

अब निरंजन अपनी जगह पर आया, कहा कि मैं भी तुम्हारा नाम लेकर अपना पंथ चलाऊँगा यानी नकली नाम का प्रचार करूँगा।

आज आप देखें तो सभी सद्गुरु बने हुए हैं, सभी संत बने हुए हैं, सभी नाम दे रहे हैं। यह सब निरंजन का ही खेल है। बात वे निरंजन की ही कर रहे हैं और मोहर संतों की लगा रखी है।

तो निरंजने ने यह भी कहा

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ज्ञानी मोर अपरबल ज्ञाना। वेद किताब भरम हम माना॥
इनको माने सब संसारा। कलि में गंगा मुक्ति द्वारा॥
देही दान से उतरे पारा। ऐसे सुमृत कहे विचारा॥
यह विधि जग जीव भुलाहीं। जरा मरण सब बंध बंधाहीं॥
सूतक पातक वेद विचारा। पूछ वेद से करहि संहारा॥
एकादशी मुक्ति को भाई। योग जग्य करवे अधिकार्ई॥

कहा कि मैंने वेद आदि के द्वारा कर्मकाण्डों में जीव को उलझाया हुआ है। सब इन्हीं को मानते हैं।

वेद में निरंजन ने अपनी ही बात की है। उसी ने बनाए हैं वेद। इसलिए साहिब का रहस्य उसमें नहीं दिया। तो उसने कहा कि कोई तुम्हारी बात नहीं मानेगा, इसलिए मत जाओ दुनिया में।

साहिब ने कहा—

सुनहु काल ज्ञान की संधि। छोरो जीव सकल की फँदी॥
जब निज बीरा हंसा पावै। योग बरत तप सबै नसावै॥
वेद किताब की छोड़े आसा। हंसा करे शब्द विस्वासा॥
ताके निकट काल नहिं आवै। निज बीरा जो सुरत लगावै॥
जोग बरत पतहू है छारा। अद्भुत नाम सदा रखवारा॥

कहा कि जिसे नाम मिल जाएगा, उसका सारा वहम अन्दर से धुल जाएगा। वो फिर कर्मकाण्डों को छोड़कर नाम में ही विश्वास करेगा। नाम सदा उसकी रक्षा करेगा। काल उसके निकट नहीं आ पायेगा।

जब निरंजन की बात न चली, वो कटने लगा तो उसने क्रोधित होकर कहा कि तुमने पहले भी मुझे मानसरोवर से निकाला था और अब मेरी दुनिया में तुम आए हो, इसलिए मैं बदला भी लूँगा। यह कह निरंजन ने विकराल हाथी का रूप धारण किया और साहिब पर झपटा।

ज्ञानी पुरुष शब्द कियो जोरा। पकड़ सँड़ दाँत गहि मोरा॥
मारेऊ शब्द पाँय पर पेली। तोर सँड़ समुद्र गहि मेली॥

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पुरुष रूप तबहीं पुनि धारा। जौन सरूप सकल औतारा।।

साहिब कह रहे हैं कि तब मैंने वहाँ परम पुरुष का रूप धारण किया, अपने मूल रूप में आया और उसकी सृष्टि पकड़कर समुद्र में फेंक दिया।

तब निरंजन अधीन हुआ, कहा कि क्षमा करो, मैंने आपको पहचाना नहीं था, आप तो स्वयं साहिब हैं, मेरा बड़ा भाग्य है कि जो आपने मुझे दर्शन दिये। अब आप दुनिया में जाएँ, पर मेरी भी एक विनती सुनें। कहा कि यदि आप सभी जीवों को अपने लोक ले जायेंगे तो मेरे शाप का क्या होगा। (क्योंकि निरंजन को रोज एक लाख जीव निगलने का शाप मिला था)। निरंजने ने कहा कि जो जीव पाप कर्म करेंगे, क्या वो भी पार हो जायेंगे। तब साहिब ने कहा कि जो जीव मेरे शब्द पर चलेंगे, मेरा कहा मानेंगे, उन्हें तुम हाथ भी नहीं लगाओगे। पर दूसरी ओर जो मेरे शब्द के विपरीत चलेंगे, उन्हें तुम ले जाना।

सुनो निरंजन वचन हमारा। नहीं सत्त वो जीव तुम्हारा।।

इस तरह साहिब का निरंजन से करार है। यही कारण है कि मैं आपसे कह रहा हूँ कि भजन हो सके तो करना नहीं तो कोई बात नहीं है, पर नाम लेकर ग़लत नहीं चलना। जो वस्तु दी, उसे संभालना। किसी भी नियम का उल्लंघन नहीं करना।

सत्य नाम निज औषधी, खरी नियत से खाय
औषध खाय अरु पथ रहै, ताकी वेदन जाय।।

नाम के बाद आप मन को समझने लग जाते हैं। तब मन असहाय लगता है, मोहताज लगता है। मन को जान लेने के बाद उसकी सारी शक्ति ख़त्म हो जाती है। ज्ञान के बाद मन की शक्ति नहीं रहती। आप रस्सी में साँप की कल्पना करके भयभीत हो जाते हैं। जब आपको पता चल जाता है कि यह साँप नहीं, रस्सी है, तब आप कौशिश करें कि मैं इसे साँप समझूँ तो भी धारणा नहीं बन पायेगी। तब जान गया। मन को जानने के बाद चाहकर भी दुनिया की चीज़ें प्रिय नहीं लग सकती हैं।

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मन भी दिखेगा। तो पता चल जाता है कि यह तो मन को प्रिय लगा। बस, मन की ताकत ख़त्म। मन तो पंगु है। वो कोई क्रिया करने में सक्षम नहीं है। मन आत्मा को कहता है, आम खाना है। मन आम नहीं खा सकता है, वो आत्मा को क्रियाशील रखता है। पर साहिब कह रहे हैं—
‘मन जाता है जान दे, गहके राख शरीर। उतरा पड़ा कमान से, क्या कर सकता तीर ॥’ तीर की ताकत कमान के साथ में है। कमान से उतरा हुआ है तो तीर का घाव नहीं होगा। मन की ताकत तो आत्मा के साथ में है। मन बेचारा हो जायेगा, यदि आत्मा का सहयोग नहीं मिलेगा तो। अंधकार में रहकर हकूमत कर रहा है। मन की हरेक क्रिया समझ आने लगती है। काँटों के रास्ते पर चलते हैं तो एक पल भी असावधान नहीं होंगे। तो गुरु नाम से जो चेतन हो जाता है, सावधान हो जाता है, जानता है कि असावधान हुए तो मन चुभेगा। ‘उसको काल क्या करे, जो आठ पहर हुशियार।’ वो सुरति में रहने लगता है। ‘क्षण सुमिरे क्षण बिसरे, यह तो सुमिरण नाहिं। आठ पहर वीणा रहे, सुमिरण सोई कहाई ॥’ आपके सामने काला साँप है तो हमेशा सावधान रहेंगे। तो मन से भी ऐसे ही सावधान रहना है। सच बताऊँ, तब जान जाता है कि मेरा बैरी मन के अलावा कोई नहीं है। मन से एक पल भी असावधान नहीं रहेंगे। असावधानी ही मन चाहता है। तब आप आत्मनिष्ठ रहेंगे। पर संतरी की तरह नहीं।

..... तो वो हमेशा प्रज्ञा अवस्था में रहने लगता है। बाकियों को जानने लग जाता है कि उलझे हैं। ‘जगत की नज़र में भक्त गया। भक्त की नज़र में जगत गया ॥’ नाम के बिना करोड़ों प्रयास से भी सुधर नहीं सकोगे। तो परम-पुरुष ने कहा कि यह गुप्त वस्तु लो, मन का जोर नहीं चलेगा। इसलिए नहीं चलता है।

साहिब कहते हैं कि नाम से अंतःकरण चेतन हो जाता है। फिर अनात्म चीज़ों में शामिल नहीं होती आत्मा। जितना आवश्यक है, उतना ही करता है। मन को फालतू हरकत भी नहीं करने देता। यह है मन पर

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सवारी। 'मन पर जो असवार है, ऐसा बिरला कोय।' मन को चारों स्वरूपों पर नियंत्रण होगा, उस पर अधिकार होगा। सोचें कि कितना महान हो गया। बड़े-2 तपस्वी भी मन की वृत्तियों पर नियंत्रण नहीं कर पाए। तभी तो मीरा कह रही है—'सखी री मैं तो नाम रतन धन पायो।' आत्मा का ठिकाना बताता हूँ। मन समझने लगता है। मन से तो भी होशियार रहना। अंतिम बिंदु तक इसकी चेष्टा रहती है कि मारूँ। जब भी लगे कि इसके बिना नहीं रह सकता हूँ तो यह सम्मोहन है। किसी पदार्थ के बिना नहीं जी सकते तो सम्मोहन है। मन के पास वेग है। गुरु ताकृत देता है तो मन पर नियंत्रण होने लग जाता है। 24 घण्टे मन के हमले हो रहे हैं। 'चश्म दिल से देख तू, क्या-2 तमाशे हो रहे.....।' प्रहार आत्मा पर हो रहा है। यह प्रहार किये जा रहा है। बड़े-2 धुरंधरों ने दीर्ध साधनाएँ की, काया को गला डाला, घर छोड़ सन्यासी हो गये, पर पार नहीं पाया मन का।

कितने तपसी तप कर डारे, काया डारी गारा।

गूह छोड़ भये सन्यासी, तऊ ना पावत पारा॥

मन बहुत ही बलशाली है, तीन लोक मन का पिंजड़ा है। 'तीन लोक मैं मनहिं विराजी। तेहि ना चीन्हे पंडित काजी॥।' तीन लोक में मन विराजमान है। पर नाम के बाद मन शक्तिहीन हो जाता है। 'मन के चलाए तन चले....।' जिसका भी मन के चलाए तन चल रहा है, सर्वत्र नाश हो जायेगा। दीर्ध साधना के बाद भी मन नियंत्रण में नहीं आता। शृंगी ऋषि ने अपने शरीर को लकड़ी बना दिया था, सोचा कि खाऊँ गा नहीं तो रक्त नहीं बनेगा, रक्त नहीं होगा तो वीर्य नहीं बनेगा, वीर्य नहीं बनेगा तो विषय हो पायेगा। बाद में वेश्या से शादी कर बैठा था।

मन की संज्ञा ही परमात्मा है। सहस्र नाम मन के हैं। पर उस परम सत्ता को साहिब कहा, सतपुरुष कहा। वेदों में वर्णित है। बड़ी बारीकी में बैठा है मन। पर नाम के बाद मन की हरकतें समझ आने लगती हैं। क्रोध आकर नाड़ियों को चलायमान करता है तो पता चल

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जाता है। मन के वेग में विरोधी शक्तियाँ दिखने लगती हैं। किसी ने पत्थर मारा, आपने देख लिया तो पीछे हो जाते हैं। मेरा मन कभी नहीं कहता कि शादी करें। जानता है कि करेगा नहीं। कभी नहीं कहता कि माँस खाएँ। जानता है कि खाएगा नहीं। मन इसी सिस्टम से उलझा रहा है। मन का मास्टर नहीं है कोई। ‘मन पर जो असवार है, ऐसा बिरला कोई।’

मुम्बई में एक शांति सम्वाय सम्मेलन हुआ था। उसमें दलाईलामा जी, शंकराचार्य जी, ईसाइयों के धर्मगुरु, जैनियों के धर्मगुरु आदि सबको बुलाया गया था। संयोग से मुझे भी बुलाया, क्योंकि मुझे महात्मा गाँधी शांति पुरस्कार मिला था। मैं चला गया। आपसी मतभेद, हिंसा, पाप आदि दुनिया में बढ़ जाने से बुद्धिजीवियों ने विचार किया कि धर्मगुरुओं को बुलाकर इसका कारण ढूँढ़ा जाए और यह समझा जाए कि कैसे दुनिया के लोग अच्छे बनें।

मुझे यह देखकर अफसोस हुआ कि कोई कहने लगा कि यह फलाना मंत्र करके लाभ होगा, कोई कहने लगा कि सुबह उठकर नहाएँ और शरीर की अच्छी साफ सफाई करें, कोई यज्ञ की युक्ति बताने लगा। पर किसी के पास भी मार्कूल फार्मूला नहीं था। वो तो छोड़ो, किसी को भी यह पता ही नहीं था कि ऐसा क्यों हो रहा है। मेरी भी स्पीच हुई। मैंने बताया कि कैसे मन का परिवार, काम, क्रोध आदि मनुष्य को अज्ञान में रखकर पाप की तरफ ले जा रहा है। नाम रूपी औषधि पाने के बाद जब ज्ञान आ जायेगा तो प्राणी किसी को नहीं मारेगा। यही एकमात्र फार्मूला है। बाद में जो मुख्य आयोजक था, उसने कहा कि मधुपरमहंस जी की बात सुनकर ऐसा लगा कि मानो कबीर धरती पर उतर आया है।

सुबह 4 बजे उठने से शांति होगी क्या। माँसाहार हिंसा को बढ़ावा देता है। शेर में कैसे हिंसा आई। यह माँस से है। मैंने इन चीजों पर बोला। तो मैंने सुझाव दिये।

ध्यान में मन की बाधा

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ध्यान में मन की बाधा


जब भी आप ध्यान में बैठते हैं तो एक चीज़ ध्यान देना कि मन कहाँ है आपका। मन को ठूँढना। ‘मनवाँ तो दश दिशि फिरे, यह तो सुमिरन नाही।’ इच्छा भी क्रिया है, याद भी क्रिया है, निश्चय भी क्रिया है, क्रिया भी क्रिया है। इच्छा करेंगे तो इन्हीं पदार्थों में ध्यान लगेगा। वैसे गुरु कृपा से सब होना है। इच्छा का निरोध करोगे तो मन निश्चय की तरफ लगता है। फैंसला भी क्रिया है। इसे रोकोगे तो याद दिलाएगा। यह भी क्रिया है। आटोमेटिक नहीं है। याद दिलाएगा कि फसल काटनी है। दराट ठूँढेंगे। यह क्रिया है। इसलिए ध्यान में बैठो तो चार तरह से मन क्रिया करेगा। कोई बात याद आए तो चिंतन नहीं करना। स्वाँसा को समझना। स्वाँस भी क्रिया है। छोड़ने के लिए, लेने के लिए भी आप शामिल हैं। यह भी एक क्रिया है। सभी पर कण्ट्रोल कर लेंगे तो साँस अड़चन है। जब तक यह नाभि दल में घूमती रहेगी तो एकाग्र नहीं हो पाओगे। इसको पलटकर ‘शून्य में देय समय।’ यह चंचल है। शून्य समाधि का अर्थ है, जब मन संकल्प नहीं कर रहा। चारों तरफ की क्रियाओं को समाप्त कर शून्य में समाने को कहा। इसकी ताकत गुरु देगा। बिना ताकत के मन पर नियंत्रण नहीं कर पाओगे। अपनी बुद्धि, विचार से मन पर नियंत्रण नहीं हो सकता है। गुरु नाम देता है तो ‘सहजे सहज पाइये’ वाली बात हो जाती है। बहुत आराम से चीज़ें मिल जाती हैं। मन पर सवारी हो जायेगी। ‘मन ही निरंजन सबै नचावे।’ पर आगे कह रहे हैं—‘नाम होय तो माथ नमावे।।’

मन घुमाता रहता है, चंचल है। उदास हो जाते हैं, तो भी मन का हमला है। मन ड्यूटी का पाबंद है। यह तीव्र साधक है। इसने 70 युग एक बार तपस्या की है, 70 युग दूसरी बार और 64 युग तीसरी बार। यह

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नहीं सोता है। आपको भटकाता रहता है। 24 घण्टे भ्रमित कर रहा है। आपको वजूद और स्वरूप की प्राप्ति नहीं होने दे रहा है। यह बड़ा ताकतवर है। सब पर मन माया का नशा है। चाहे कितना भी तप करे कोई। बड़े-2 साधकों ने तपस्याएँ भी की, पर नशा नहीं उतरा। मन का पिंजड़ा बड़ा तगड़ा है। अगर शरीर के अंदर आत्मा की कोई पहचान है तो ‘ध्यान।’ साहिब ने सुरति के अंग पर बहुत कहा। आत्मा इस पिंजड़े में कैसे रहती है ! जैसे पंछी असहाय-सा होकर पिंजड़े में बैठा रहता है। शिकारी उसका बहुत बड़ा शत्रु है। पंछी की आजादी छीन ली उसने। ऐसे ही आत्म-देव असहाय हो गया है। साहिब ने बड़े जोरदार शब्दों में कहा—‘तेरा बैरी कोई नहीं, तेरा बैरी मन।’ मन जालिम है। यह मन काल है; सावधान रहना इससे। पंछी अपनी कोशिश से निकल नहीं सकता है। जब तक पिंजड़े का द्वार खोल ना दिया जाए। ऐसे ही ‘बिन सतगुरु बाँचे नहीं, कोई कोटिन करे उपाय ॥’ आप मन को लाँघ कर नहीं जा सकते हैं। कोई न जा सका अपनी ताकत से। साहिब कह रहे हैं—‘ज्ञानहीन जाने ना भाई। जीव के संग मन काल रहाई ॥’ अब छुटकारा कैसे होगा! मन की आज्ञानुसार हम कर्म कर रहे हैं। इसी कारण जन्म-मरण में आ रहे हैं। कर्म ही कारण है जन्म-मरण का। कर्म का प्रेरक है, मन। याद रखें, अच्छे-बुरे दोनों कर्म मन के द्वारा होते हैं। ‘यह मन चीहने बिरला योगी।’

आइये, मैं थोड़ा अपने अतीत की तरफ चलता हूँ। नाम प्राप्ति के बाद मैं भजन करने लगा। स्मरण करते करते जब मैं एकाग्र हुआ तो मुझे कुछ डिस्टर्ब करने लगा। अपने अंदर जब मुझे डिस्टर्ब लगने लगे तो वो क्या कि मैं भजन करना चाहता हूँ, कोई मुझे नहीं करने दे रहा है, तो मुझे लगा कि कोई मुझे डिस्टर्ब कर रहा है। मैं और कन्संट्रेट हुआ। मैंने कहा, देखें, मुझे कौन डिस्टर्ब कर रहा है। पर मुझे डिस्टर्ब करने वाला नजर नहीं आ रहा है। मुझमें एक आकांक्षा उठी कि मैं डिस्टर्ब करने वाले को जरूर देखूँगा कि मुझे कौन व्यवधान डाल रहा है। मैं एकाग्रचित होकर काम करने लगा। धीरे धीरे वो डिस्टर्ब मुझे अब इस तरह करने लगा जैसे मेरे स्वरूप से हटकर कोई चीज कर रही है। तो मैं और सतर्क हुआ। मैंने कहा कि मैंने इस डिस्टर्ब को अच्छी तरह देखना है कि मुझे कौन

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व्यवधान कर रहा है। और जब मुझे बहाया जाने लगा तो मैं एक ही वस्तु को पकड़े रहा—नाम को। तो मैं बहा नहीं। मैं अब एकाग्र होने लगा। धीरे धीरे मुझे अनुभव होने लगा। अब डिस्टर्ब जिन जिन चीजों से हो रहा है, साफ नजर आ रहा है। लेकिन अभी भी मुझे दिखाई नहीं दे रहा है। मैं स्मरण में ही रहा। मुझे जो व्यवधान आ रहा है, वो नजर आ रहा है। अभी भी व्यवधान कौन कर रहा है, यह नजर नहीं आ रहा है। मैं और कन्संट्रेट हुआ। मैं सब तरफ से सब काम छोड़कर भजन करने लगा, क्योंकि मेरे लिए एक ही चीज थी कि मुझे रुकावट कौन दे रहा है। मुझे देखना यही था। अब मैंने देखा, मुझे खाना-पीना भी डिस्टर्ब दे रहा था। मैंने कहा, छोड़ो खाने को। मैंने पक्का संकल्प किया कि जब मैं आत्मरूप हूँ तो खाना क्यों खाऊँ। मैं एकाग्र हुआ। अब मैं तो भोजन खाना नहीं चाह रहा हूँ, कोई मुझे प्रेरणा दे रहा है, अन्दर से कि खाना खाओ। मैं एकदम चेतन हुआ, मैं खाना नहीं खाना चाहता हूँ, कौन मुझे प्रेरणा दे रहा है। मैं पूरी तरह से कन्संट्रेट हुआ.....खाना नहीं खाना है। अब मुझे यूँ लगने लगा जैसे कोई कह रहा है—खाना खाओ। आपसे भी यूँ ही कहा जा रहा है। पर आप लैंगवेज पढ़ नहीं पा रहे हैं। मैंने कहा—नहीं, मैं खाना नहीं खाऊँगा, क्योंकि मैं शरीर नहीं हूँ। यह पूर्ण सच है कि मैं आत्मा हूँ, शरीर नहीं हूँ। खाना नहीं खाऊँगा। अब मैंने कहा कि आत्मा सोती जागती भी नहीं है। मैं जागरूक हो गया—सोऊँगा नहीं। मुझे कोई प्रेरणा दे रहा है, सो जाओ, वरना कमजोर हो जाओगे। मैंने कहा, यह तो मेरी सोच नहीं है कि सो जाओ वरना कमजोर हो जाओगे। यह कौन सोचवा रहा है। मैं और एकाग्र होने लगा। मैंने सोना भी छोड़ दिया, खाना भी छोड़ दिया और कर क्या रहा हूँ—स्मरण। अब तक एक भी श्वास मैं नहीं छोड़ना चाहता हूँ और मैं सुष्मना में आ गया। अब छः महीने जब मैं लगातार इस अवस्था में रहा तो मुझे आदेश देने वाला नजर आने लगा। मैंने कहा—तुम थे। इतने पीछे रहते हो....इतनी गहराई में। अब आमने सामने आदेश देने वाला मुझे नजर आ रहा था कि किस तरह बोलता है, किस बिंदू पर बैठा है। अब उसे कोई भी हरकत नहीं

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करने दी। संसार की समग्र चीजों से मैं समग्र रूप से अलग हो गया। उसी बिंदू में मुझे परमानन्द की अनुभूति हुआ अर्थात उस आनन्द के पीछे ही मन बैठा हुआ था।

तब मैंने देखा, मैं शरीर नहीं हूँ। इन अवस्थाओं में अब एक वो आनन्द आ रहा था, आपने सुना होगा कि आत्मा आनन्द से परिपूर्ण है। यथार्थ में मैं आनन्द में था। अब मैंने कहा, शरीर की अनुभूति से ही पूरे दुख हैं, इसलिए जो भी भाव मन, शरीर हूँ, की तरफ लाता था, मैं वहीं पकड़ लेता था, यही मन है, अब बस हो चुकी है, अब अधिक धोखा नहीं, इसके बाद और कुछ नहीं।

‘मन को मार गगन चढ़ जाई।’ यह किसके द्वारा। मैंने एक चीज पकड़ी हुई थी, वरना मैं बहुत दूर बह जाता, वो था—नाम, जिसने मुझे इसके संकल्प, इसके भावों में, इसके बहाव में नहीं बहने दिया। उस बिंदू पर मैंने देखा, यही मौत है, यही काल है, इसलिए काल के अन्दर संसार के सभी जीव हैं। तब मैंने सोचा कि संसार के सभी जीव कितने बड़े धोखे में हैं। अब उसकी पूर्णता वहीं स्टाप कर दी। किसी भी आदमी को जब आप पूर्णरूप से जान जायेंगे, वो अपनी कला आपके साथ फिर नहीं करने वाला है, क्योंकि आपने उसे हकीकत में जान लिया है। पर इस बिंदु पर सब आदमी नहीं जा पायेंगे। अब आप सोचें, उसके बाद कैसी अनुभूति होगी। मैं शरीर में नीचे नहीं आता था। इसे विदेह मोक्ष कहते हैं। अर्थात—देह में विदेह दर्शै। अब विदेह पद को प्राप्त हो गया। जो इस चीज को जान जाता है, किसी भी समय मन पर विजय प्राप्त कर लेता है। अब वो अकाल हो गया, क्योंकि अब किसी भी देशकाल, अवस्था में मन से त्रुटि नहीं कर पाता है। समग्र विश्व इस मन के अन्दर है। तो मेरे भाई, यह कार्य बुद्धि से नहीं किया जा सकेगा। अब यह थी, नाम की महिमा।

साखियाँ और सब्द

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साखियाँ और सब्द


साखियाँ

मन ही सरूपी देव निरंजन, तोहि रहा भरमाई ।
हे हंसा तू अमर-लोक का, पड़ा काल बस आई ॥

जीवात्मा को सम्बोधित करते हुए साहिब कह रहे हैं कि हे जीवात्मा ! यह मन ही निरंजन है, जो तुम्हें युगों-2 से भ्रमित कर रहा है। तू तो अमर-लोक का जीव है, वहाँ रहने वाला है, लेकिन काल-पुरुष (मन) के वश में तू आ गया है।

मन ही सरूपी देव निरंजन, तोहि रहा भरमाई ।
पाँच पसीच तीन का पिंजड़ा, जामें तोहि राखा भरमाई ॥

साहिब स्पष्ट कह रहे हैं कि मन, जिसे निरंजन भी कहा जाता है, निराकार भी कहा जाता है, तुम्हें युगों-युगों से भटका रहा है। यह शरीर तो पिंजड़ा है, जिसमें निर्मल आत्मा को कैद कर दिया है, उसने।

अलख निरंजन लखे न कोई, जिहि बंधे बंधा सब लेई ।
जेहि झूठे सब बंधु अयाना, झूठी बात साँच कै माना ॥

साहिब कह रहे हैं कि अलख निरंजन, जिसे कोई देख नहीं पाता, ही संसार के समस्त प्राणियों को बाँधे हुए है। अज्ञानी लोग उसकी झूठी माया को सच मानकर उसके बंधन में स्वयं ही बँध गये हैं। इस प्रकार सारा संसार भ्रम में पड़ा हुआ है, दही के स्थान पर पानी का मंथन किये जा रहा है। जिस तरह चकोर अंगार को ही चन्द्रमा मानकर उसे मुँह

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में डालता है, उसकी जीभ और चोंच जलती है और फिर वो उसे उगल देता है, पर दूसरे ही क्षण फिर-फिर उसे मुँह में डालता है और अंत में परम दुख को प्राप्त होता है। इसी तरह संसारी मनुष्य निरंजन को ही अंतिम सत्य मान बैठे हैं, उसी की तरफ जा रहे हैं, उसी की भक्ति कर रहे हैं और अंत में परम दुख को प्राप्त हो रहे हैं, क्योंकि वे आवागमन से नहीं छूट पा रहे और निरंतर निरंजन की चौरासी की चक्की में पिस रहे हैं।

पलटू यह मन अधम है, चोरों से बड़ चोर।

गुन तजि ओगुन गहतु है, तातें बड़ा कठोर॥

पलटू साहिब कह रहे हैं कि यह मन बड़ा ही नीच है। यह तो चोरों से भी बड़ा चोर है। यह गुणों को छोड़कर अवगुणों को ही ग्रहण करता है, उन्हें ही पकड़ता है। इसी कारण से यह इतना कठोर हो गया है।

कबीर यह मन मसखरा, कहूँ तो मानै रोस।

जा मारग साहिब मिलै, तहाँ न चालै कोस॥

यह मन तो मसखरा है। अगर इसे डाँट दिया जाए तो नाराज हो जाता है। जिस राह पर परमात्मा की प्राप्ति होनी है, वहाँ तो एक कोस भी चलने को तैयार नहीं है।

कबीर यह मन लालची, समझै नहीं गँवार।

भजन करन को आलसी, खाने को तैयार॥

यह मन बहुत लालची है, समझने से समझता नहीं है। भजन करने को तो यह आलस करता है और खाने के लिए हर समय तैयार रहता है।

यहु बन हरिया देखि करि, फूल्यौ फिरै गँवार।

दादू यह मन गिरगला, काल अहेड़ी लार॥

दादू दयाल जी कह रहे हैं कि संसार रूपी बन को हरा-भरा अर्थात् सुखमय समझकर मूर्ख लोग फूले-फूले फिर रहे हैं, पर उन्हें नहीं