मनहिं निरंजन सबै नचाए
Manhin Niranjan Sabai Nachaye
by सतगुरु मधु परमहंस जी
Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)
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Read in contextताक़त आकर समाती है। तब काल का जोर नहीं चलता है।
मैंने जो कहा कि जो वस्तु मेरे पास है, वो कहीं नहीं है, प्रमाणित करता हूँ। पूर्ण गुरु आपको बदल देता है, दिव्य-दृष्टि खोल देता है। 10वाँ द्वार खुलता है तो चाँद, तारे आदि नज़र आते हैं, पर जब 11वाँ द्वार खुलता है तो मन नज़र आता है।
वो दिव्य-दृष्टि खुलेगी तो काम, क्रोध दिखेगा। अन्यथा कितनी भी तपस्या करना, यह मन काबू में नहीं आयेगा, यह समझ नहीं आयेगा। कपिल मुनि, पाराशर ऋषि आदि ने कम तप नहीं किया था। पर नहीं हो सका मन काबू में। इसलिए—
नाम होय तो माथ नमावे। ना तो यह मन बाँध नचावे ॥
परम पुरुष की इच्छा से साहिब हर युग में निरंजन के लोक में आते हैं और जीवों को काल से कष्ट से छुड़ाकर अमर-लोक ले जाते हैं। पहली बार जब साहिब धरती पर आए तो 100 साल रहकर वापिस गये। पर एक भी जीव को नहीं ले जा सके। परम-पुरुष ने पूछा कि कोई भी जीव नहीं लाए। कहा—नहीं। परम-पुरुष ने पूछा—क्यों? कहा कि जिसे सुबह समझाता हूँ, शाम को भुला देता है। जिसे शाम को समझाता हूँ, वो सुबह भुला देता है। तब परम-पुरुष ने कहा कि यह लो गुप्त वस्तु (नाम)। जिस घट में यह वस्तु दे दोगे, उसपर काल का जोर नहीं चलेगा।
तब परम-पुरुष को प्रणाम करके उनकी आज्ञा से साहिब शून्य में निरंजन के लोक की ओर आए। जब साहिब आने लगे तो निरंजन झांझरी द्वीप में साहिब के सम्मुख आया, बोला—यहाँ क्यों आए हो? वापिस जाओ। यहाँ पर निरंजन और साहिब के मध्य बड़ी गोष्ठी हुई।
साहिब ने कहा—
तासो कह्यो सुनो धर्मराई। जीव काज संसार सिधाई ॥