Skip to content
SarvaKosh
मनहिं निरंजन सबै नचाए

मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

by सतगुरु मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished120 pages

Page 88 of 120

Read in context
Page 88

तप्त शिला पर जीव जरावहु। जारि वारि निज स्वाद करावहु॥
तुम अस कष्ट जीव कह दीन्हा। तबहि पुरुष मोहि आज़ा कीन्हा॥
जीव चिताय लोक लै जाऊँ। काल कष्ट से जीव बचाऊँ॥

कहा कि हे निरंजन, तुमने बहुत छल, बल से जीवों को बाँधा हुआ है। तप्त शिला पर उन्हें अनेक कष्ट देकर आनन्द लूट रहे हो। परम पुरुष ने मुझे यहाँ भेजा है, मैं जीवों को यहाँ से छुड़ाकर अमर लोक ले जाऊँगा।

तबै निरंजन बोले बानी। सकल जीव बस हमरे ज्ञानी॥
तिनसौ साठ पैठ उरझोरा। कैसे हंसन लेव उबेरा॥

निरंजन ने कहा कि मैंने सबको उलझाया हुआ है। 360 ऐसे स्थान हैं, जहाँ निरंजन ने थोड़ी-थोड़ी शक्तियाँ रखी हुई हैं। उन्हीं को देख जीव उलझा हुआ है। निरंजन ने कहा कि कैसे छुड़ाओगे हंसों को? तब ज्ञानी अस बोले बानी। जमते जीव छुड़ावहुँ आनी॥
पुरुष नाम को कहुँ समझाई। जम राजा तब छोड़ि पराई॥
घाट घाट बैठे उरझोरा। हमरे शब्द ते होय निबेरा॥
सुन रे काल दुष्ट अन्याई। शब्द संग हंसा घर जाई॥

साहिब ने कहा कि मेरे पास नाम है, जिसके सहारे हंस अमर लोक पहुँच जायेगा। अब तुम उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाओगे।

तब निरंजन ने कहा—

का ज्ञानी देहो अधिकारा। हमरो नाहिं छूटे जम जारा॥
पाँच पचीस तीन गुन आही। यह लै सकल शरीर बनाई॥
तामें पाप पुण्य का वासा। मन बैठा ले हमरी फाँसा॥
जहाँ तहाँ जग भरमावै। ज्ञान संधि कुछ रहन न पावै॥
एक शब्द की केतिक आशा। मेरे हैं चौरासी फाँसा॥

कहा कि तुम जीवों को मुझसे छुड़ाकर नहीं ले जा सकते हो। मैंने पाँच तत्वों से शरीर की रचना की है। उस पर फिर पाप पुण्य में जीवों को बाँध दिया है। फिर मन रूप में खुद भी अन्दर समाया हुआ हूँ। किसी