मनहिं निरंजन सबै नचाए
Manhin Niranjan Sabai Nachaye
by सतगुरु मधु परमहंस जी
Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)
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Read in contextपरमात्मा कहेगा, कोई सतनाम की बात करेगा, कोई राम की भक्ति करेगा, कोई परम धाम की बात करेगा, कोई केवल हरिजनों की बात करेगा।
इसलिए ये सभी वंशगत चलेंगे। इनके लोग अमर लोक में नहीं जायेंगे; निरंजन के ही अधीन रहेंगे।
47 लाख साल के 4 युग होते हैं। 4 युग हो गये तो एक चौकड़ी हुआ। 100 बार चार युग हुए तो 100 चौकड़ी युग हुए। 100 के बाद हजार, फिर दस हजार, फिर लाख, फिर दस लाख, फिर करोड़, फिर दस करोड़, अरब, 10 अरब, फिर खरब, फिर नील, दस नील, पदम, दस पदम, संख्य, 10 संख्य, असंख्य, 10 असंख्य, फिर अनन्त।
4 असंख्य चौकड़ी युग हो चुके हैं। यानी अरबों बार सृष्टि का नाश हो चुका है।
परम-पुरुष ने कहा कि इतना राज्य करना ही है। एक बार निरंजन ने कहा कि मुझे भी नाम दे दो। साहिब ने कहा कि यदि तुझे नाम दे दूँगा तो तू कभी छल नहीं कर सकेगा। छल छोड़ दिया तो आत्माएँ निकल जायेंगी।
अब यहाँ आदमी संस्पेंशन में आ जाता है। इसका मतलब है कि सत्पुरुष चाहते हैं कि सभी जीव न निकलें। और शाप दिया कि एक लाख जीव रोज़ खाना तो यह तो जीवों को ही कष्ट दिया। नहीं, यह कष्ट निरंजन को है। जब आपको चोट पहुँचती है तो यह आत्मा को कष्ट नहीं होता है। आत्मा का कुछ नहीं बिगड़ता है। यह कष्ट निरंजन को होता है। उसी को मुसीबत दी है। वो दर्द उसे होता है। यह समझाना कितना कठिन है।
कई जन्म आपने पहले निरंजन की भक्ति की है। कई जन्मों तक पुण्य कर्म किये। आप महा भाग्यवान हैं। अब आप सद्गुरु की शरण में पहुँचकर नाम प्राप्त किये। आप साधारण नहीं हैं। इसलिए आपका नम्बर लगा है। या फिर स्वयं संतजन कृपा कर देते हैं।