Skip to content
SarvaKosh
मनहिं निरंजन सबै नचाए

मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

by सतगुरु मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Report a copyright issue

Devanagarihipublished120 pages

Page 93 of 120

Read in context
Page 93

मन भी दिखेगा। तो पता चल जाता है कि यह तो मन को प्रिय लगा। बस, मन की ताकत ख़त्म। मन तो पंगु है। वो कोई क्रिया करने में सक्षम नहीं है। मन आत्मा को कहता है, आम खाना है। मन आम नहीं खा सकता है, वो आत्मा को क्रियाशील रखता है। पर साहिब कह रहे हैं—
‘मन जाता है जान दे, गहके राख शरीर। उतरा पड़ा कमान से, क्या कर सकता तीर ॥’ तीर की ताकत कमान के साथ में है। कमान से उतरा हुआ है तो तीर का घाव नहीं होगा। मन की ताकत तो आत्मा के साथ में है। मन बेचारा हो जायेगा, यदि आत्मा का सहयोग नहीं मिलेगा तो। अंधकार में रहकर हकूमत कर रहा है। मन की हरेक क्रिया समझ आने लगती है। काँटों के रास्ते पर चलते हैं तो एक पल भी असावधान नहीं होंगे। तो गुरु नाम से जो चेतन हो जाता है, सावधान हो जाता है, जानता है कि असावधान हुए तो मन चुभेगा। ‘उसको काल क्या करे, जो आठ पहर हुशियार।’ वो सुरति में रहने लगता है। ‘क्षण सुमिरे क्षण बिसरे, यह तो सुमिरण नाहिं। आठ पहर वीणा रहे, सुमिरण सोई कहाई ॥’ आपके सामने काला साँप है तो हमेशा सावधान रहेंगे। तो मन से भी ऐसे ही सावधान रहना है। सच बताऊँ, तब जान जाता है कि मेरा बैरी मन के अलावा कोई नहीं है। मन से एक पल भी असावधान नहीं रहेंगे। असावधानी ही मन चाहता है। तब आप आत्मनिष्ठ रहेंगे। पर संतरी की तरह नहीं।

..... तो वो हमेशा प्रज्ञा अवस्था में रहने लगता है। बाकियों को जानने लग जाता है कि उलझे हैं। ‘जगत की नज़र में भक्त गया। भक्त की नज़र में जगत गया ॥’ नाम के बिना करोड़ों प्रयास से भी सुधर नहीं सकोगे। तो परम-पुरुष ने कहा कि यह गुप्त वस्तु लो, मन का जोर नहीं चलेगा। इसलिए नहीं चलता है।

साहिब कहते हैं कि नाम से अंतःकरण चेतन हो जाता है। फिर अनात्म चीज़ों में शामिल नहीं होती आत्मा। जितना आवश्यक है, उतना ही करता है। मन को फालतू हरकत भी नहीं करने देता। यह है मन पर