मनहिं निरंजन सबै नचाए
Manhin Niranjan Sabai Nachaye
by सतगुरु मधु परमहंस जी
Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)
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Read in contextको सोचने भी नहीं दे रहा हूँ कि क्या मामला है। तुम्हारा एक शब्द क्या करेगा, मैंने 84 लाख फॉसैं बनाई हुई हैं, एक में से निकाल दूसरी में फेंक देता हूँ।
बोले ज्ञानी शब्द विचारी। छूटे चौरासी की धारी।
छूटै पाँच पचीस गुण तीनों। ऐसा शब्द पुरुष मैं दीन्हो॥
साहिब ने कहा कि मेरे पास बड़ा जबरदस्त नाम है, जिस घट में दे दूँगा, उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाओगे, वो आजाद हो जायेगा।
निरंजन ने कहा—
हे ज्ञानी का करो बढाई। हमते नाहिं छूट जीव जाई॥
इतने युग भये तुम देखा। ज्ञानी हंस न एको पेखा॥
का तुम करो का शब्द तुमारा। तीन लोक परलय कर डारा॥
साधु संत हम देखी रीति। परलय परे सकल जगग जीति॥
करम रेख बाँधै सब साधा। सुर नर मुनि सकलो जग बाँधा॥
कहा कि इतने युग हो गये, क्या एक भी हंस सतलोक पहुँचा। मैंने इतनी ताकत से जीवों को बाँधा हुआ है कि छूट नहीं सकते हैं। तुम और तुम्हारा एक शब्द क्या कर लेगा। मैं तीन लोक का नाश कर देता हूँ।
निरंजन ने कई बार सृष्टि का प्रलय भी किया है। जलेबी बना देता है दुनिया की। ये सब काम साहिब के नहीं हैं।
तो निरंजने ने कहा कि इतने पर भी कर्मों में जीव को बाँधा हुआ हूँ। आम आदमी की क्या बात है, देवता, मुनि आदि सबको बाँधा हुआ है। एक भी हंस को जाने नहीं दूँगा।
ज्ञानी कहै काल अन्यायी। शब्द बिना तू खाय चबायी॥
हंस हमारा शब्द अधिकारा। पुरुष परताप को करे सम्हारा॥
नाम जपै अरु सुरति लगाई। मिले कर्म लागे नहीं काई॥
शब्द मानि होय शब्द सरूपा। निश्चय हंसा होय अनूपा॥
साहिब ने कहा कि हे निरंजन, तब इनके पास सच्चा नाम नहीं था, तूने खा लिया। अब मैं परम पुरुष का बड़ा जबरदस्त नाम दूँगा और