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मनहिं निरंजन सबै नचाए

मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

by सतगुरु मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished120 pages

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में डालता है, उसकी जीभ और चोंच जलती है और फिर वो उसे उगल देता है, पर दूसरे ही क्षण फिर-फिर उसे मुँह में डालता है और अंत में परम दुख को प्राप्त होता है। इसी तरह संसारी मनुष्य निरंजन को ही अंतिम सत्य मान बैठे हैं, उसी की तरफ जा रहे हैं, उसी की भक्ति कर रहे हैं और अंत में परम दुख को प्राप्त हो रहे हैं, क्योंकि वे आवागमन से नहीं छूट पा रहे और निरंतर निरंजन की चौरासी की चक्की में पिस रहे हैं।

पलटू यह मन अधम है, चोरों से बड़ चोर।

गुन तजि ओगुन गहतु है, तातें बड़ा कठोर॥

पलटू साहिब कह रहे हैं कि यह मन बड़ा ही नीच है। यह तो चोरों से भी बड़ा चोर है। यह गुणों को छोड़कर अवगुणों को ही ग्रहण करता है, उन्हें ही पकड़ता है। इसी कारण से यह इतना कठोर हो गया है।

कबीर यह मन मसखरा, कहूँ तो मानै रोस।

जा मारग साहिब मिलै, तहाँ न चालै कोस॥

यह मन तो मसखरा है। अगर इसे डाँट दिया जाए तो नाराज हो जाता है। जिस राह पर परमात्मा की प्राप्ति होनी है, वहाँ तो एक कोस भी चलने को तैयार नहीं है।

कबीर यह मन लालची, समझै नहीं गँवार।

भजन करन को आलसी, खाने को तैयार॥

यह मन बहुत लालची है, समझने से समझता नहीं है। भजन करने को तो यह आलस करता है और खाने के लिए हर समय तैयार रहता है।

यहु बन हरिया देखि करि, फूल्यौ फिरै गँवार।

दादू यह मन गिरगला, काल अहेड़ी लार॥

दादू दयाल जी कह रहे हैं कि संसार रूपी बन को हरा-भरा अर्थात् सुखमय समझकर मूर्ख लोग फूले-फूले फिर रहे हैं, पर उन्हें नहीं