मनहिं निरंजन सबै नचाए
Manhin Niranjan Sabai Nachaye
by सतगुरु मधु परमहंस जी
Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)
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Read in contextपुरुष रूप तबहीं पुनि धारा। जौन सरूप सकल औतारा।।
साहिब कह रहे हैं कि तब मैंने वहाँ परम पुरुष का रूप धारण किया, अपने मूल रूप में आया और उसकी सृष्टि पकड़कर समुद्र में फेंक दिया।
तब निरंजन अधीन हुआ, कहा कि क्षमा करो, मैंने आपको पहचाना नहीं था, आप तो स्वयं साहिब हैं, मेरा बड़ा भाग्य है कि जो आपने मुझे दर्शन दिये। अब आप दुनिया में जाएँ, पर मेरी भी एक विनती सुनें। कहा कि यदि आप सभी जीवों को अपने लोक ले जायेंगे तो मेरे शाप का क्या होगा। (क्योंकि निरंजन को रोज एक लाख जीव निगलने का शाप मिला था)। निरंजने ने कहा कि जो जीव पाप कर्म करेंगे, क्या वो भी पार हो जायेंगे। तब साहिब ने कहा कि जो जीव मेरे शब्द पर चलेंगे, मेरा कहा मानेंगे, उन्हें तुम हाथ भी नहीं लगाओगे। पर दूसरी ओर जो मेरे शब्द के विपरीत चलेंगे, उन्हें तुम ले जाना।
सुनो निरंजन वचन हमारा। नहीं सत्त वो जीव तुम्हारा।।
इस तरह साहिब का निरंजन से करार है। यही कारण है कि मैं आपसे कह रहा हूँ कि भजन हो सके तो करना नहीं तो कोई बात नहीं है, पर नाम लेकर ग़लत नहीं चलना। जो वस्तु दी, उसे संभालना। किसी भी नियम का उल्लंघन नहीं करना।
सत्य नाम निज औषधी, खरी नियत से खाय
औषध खाय अरु पथ रहै, ताकी वेदन जाय।।
नाम के बाद आप मन को समझने लग जाते हैं। तब मन असहाय लगता है, मोहताज लगता है। मन को जान लेने के बाद उसकी सारी शक्ति ख़त्म हो जाती है। ज्ञान के बाद मन की शक्ति नहीं रहती। आप रस्सी में साँप की कल्पना करके भयभीत हो जाते हैं। जब आपको पता चल जाता है कि यह साँप नहीं, रस्सी है, तब आप कौशिश करें कि मैं इसे साँप समझूँ तो भी धारणा नहीं बन पायेगी। तब जान गया। मन को जानने के बाद चाहकर भी दुनिया की चीज़ें प्रिय नहीं लग सकती हैं।