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मनहिं निरंजन सबै नचाए

मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

by सतगुरु मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished120 pages

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रहट की तरह चारों युग चलते जाते हैं। चार युग का अंत हो जाता है तो फिर निरंजन आग बरसाता है। वो पानी-ही-पानी करके पृथ्वी का नाश कर देता है। पर ऐसे में स्वर्ग रहता है, तैंतीस करोड़ देवता भी रहते हैं, बड़े-बड़े तपस्वी रहते हैं। इस तरह 72 चौकड़ी (चार युग) बीत जाती है। यह निरंजन उत्पत्ति करके फिर-फिर प्रलय करता रहता है। क्योंकि यह परम-पुरुष की सेवा से ही राज्य का फल पा रहा है।

महा प्रलय जब किया निरंजन अग्नि सेवत ना रहो ॥
लोमस ऋषि तब होय अंतहि शशि भानु पानी सब गयो ॥
तीन गुन पांच तत्व बीते दस चार सुत आकाश हो ॥
महा देवी आदि कन्या ताही करै वह गरास हो ॥
सब भक्षै निरंजन राय, आदि अंत ना कछु रहै ॥
शिव कन्यानाम बिहाय, सब जी राखै आपमें ॥

जब निरंजन महाप्रलय करता है तब सूर्य, चाँद, जल, अग्नि आदि कुछ भी नहीं रहता। तब लोमश ऋषि का भी अंत हो जाता है। सब गुण और तत्व आकाश में लय हो जाते हैं। आदि शक्ति (माया) को भी निरंजन ग्रसित कर लेता है। इस तरह निरंजन सबको खा जाता है। कुछ भी शेष नहीं रह जाता। सब जीवों को वो अपने में रख लेता है।

सतगुरु दया जाहि पर होई। नाम प्रताप बाचै जन सोई ॥
निज घर हंसा करहि पयाना। और सकल जीव तहाँ समाना ॥
जाई रहैं जहाँ धर्महि द्वीपा। प्रथम करी जो लोक समीपा ॥
उत्पत्ति कारण सेवा करहीं। पुनि यहि भांति सृष्टि अनुसरहीं ॥
भक्त अभक्त सबै पुनि खाई। सबको भक्षै निरंजन राई ॥
सो पुनि महिमा वेद बखाने। वेद पढ़े पर भेद न जाने ॥

साहिब कह रहे हैं कि जिसपर सदगुरु की दया हो जाती है, वो ही नाम के प्रताप से इस कठिन निरंजन से बचकर अपने घर प्रस्थान करता है। नहीं तो यह सबको खा जाता है और फिर अमर-लोक के आस-पास जाकर परम-पुरुष से पुकार करता है कि उसे दुबारा सृष्टि