Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

by महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह)

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished361 pages

About this granth

The Kaushika Sutra (कौशिक गृह्यसूत्रम्) is the domestic ritual manual of the Atharvaveda in the Shaunaka tradition. Besides the usual life-cycle rites and household offerings, it prescribes the use of Atharvan hymns for healing, averting harm, prosperity, building a house, rites concerning women and expiation of evil omens, which makes it a rich source for daily life, medicine and belief in the Vedic period.

This edition gives the sutras with the brief Sanskrit commentary of Darila and Keshava and a Hindi translation by Thakur Udaynarayan Singh, translator also of the Sarvadarshanasangraha and Surya Siddhanta. He published it from his Shastraprakash Bhavan at Mathurapur, Muzaffarpur (Bihar), and it was printed at the Jyotish Prakash Press, Benares. The dedication says the edition first printed in America was brought out in India with Hindi through the support of Babu Umashankar of Muzaffarpur.

A detailed Hindi table lists the rites section by section, from rites for intelligence and preparing consecrated water to house-building, pumsavana, a child's teething, and remedies for portents such as eclipses, famine and cholera.

Page 95Permalink

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ६३

॥४१॥ अपेयमिति व्युच्छन्त्याम् ॥४२॥ बभ्रोरिति
मन्त्रोक्तमाकृतिलोष्टवल्मीकौ परिलिख्य जीवकोषण्या-
मुत्सीव्य बध्नाति ॥४३॥२॥२६॥
नमस्ते लाङ्गलेभ्य इति सीरयोगमधिशिरोऽवसि-
ञ्चति ॥१॥ नमः सनिस्स्रासेभ्य इति शून्यशालायामप्सु
सम्पातानानयति ॥२॥ उत्तरं जरत्खाते सशालतृणे॥३॥
तस्मिन्नाचामयन्त्याप्लावयति ॥ ४ ॥ दशवृक्षेति शाकलः
॥ ५ ॥ दश सुहृदो जपन्तोऽभिमृशन्ति ॥ ६ ॥ क्षेत्रिया-
त्त्वेति चतुष्पथे काम्पीलशकलैः पर्वसु बद्धा पिञ्जूली-
मणि बनाकर पहने या बान्धे ॥३३-४०॥ अब क्षेत्रिय (कुल परम्परा से
होने वाले रोग) रोगों के भैषज्य को कहते हैं ॥ “उद्गाताम्” तक्म-
नाशन गण के मंत्र से घर के बाहर प्रातः काल उषः काल में क्षेत्रिय
(कोढ़, क्षय रोग, संग्रहणी आदि) रोगी को स्नान करावे और “बभ्रोर-
र्जुन काण्डस्य०” इन तीन ऋचा से अर्जुन काठ को, जौके भूसा, तिल-
पिञ्जिका, आकृति लोष्ट, वल्मीक इन को भली-भाँति चूर्ण करके जीते
पशु के चर्माङ्गस्थलिका में डालकर सूई से उसे सी करके रोगी को
बान्ध देवे ॥ ४१।४२।४३ ॥ यह छब्बीसवीं कण्डिका समाप्त हुई ॥२६॥
क्षेत्रिय रोगी को हलयुक्तबैलों द्वारा शिरपर “नमस्ते लाङ्गलेभ्य०”
से जलपात्र से अवसेचन करे ॥ १ ॥ शून्य घर में पुराने गर्त में घरके
छप्पर की ओलनी के खर्रों को डाल कर उत्तर सम्पातों को “नमः स-
निस्रसा०” मंत्र से लावे ॥२॥ रोगी को उस पुराने गर्त में खड़े कर देवे
एवं सम्पातोदक से उसे आचमन करावे और स्नान करा देवे ॥३॥४॥
क्षेत्रिय रोग के भैषज्य की समाप्ति हुई ॥ अब ब्रह्मग्रह के भैषज्य को कहते
हैं ॥ तक्म नाशन गण “दशवृक्ष०” इस सूक्त से दश शान्त वृक्षों के
शकलों को लेकर लाख एवं सोने से वेष्टित मणि बना कर दश मित्र मिल-
कर इस सूक्त का जप करें और पिशाच गृहीत को अभिमर्शन करे ॥६॥
फिर क्षेत्रिय रोगी के भैषज्य को कहते हैं । क्षेत्रिय रोगी को चौराहे पर
लेजाकर काम्पील शकलों से गांठों में बान्धकर “क्षेत्रियात्त्वा०” इस

Page 96Permalink

६४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।

भिराप्लावयति ॥७॥ अवसिञ्चति ॥८॥ पार्थिवस्येत्युद्यति
पृष्ठसंहितावुपवेशयति ॥९॥ प्राङ्मुखं व्याधितं प्रत्यङ्मु-
खमव्याधितं शाखासूपवेश्य वैतसे चमसे उपमन्थ-
नीभ्यां तृष्णागृहीतस्य शिरसि मन्थमुपमथ्यातृषि-
ताय प्रयच्छति ॥ १०॥ तस्मिंस्तृष्णां संनयति ॥ ११ ॥
उद्धृतमुदकं पाययति ॥ १२ ॥ सवासिनाविति मंत्रो-
क्तम् ॥ १३ ॥ इन्द्रस्य या महीति खल्वञ्जान्लाण्डून्
हननान् घृतमिश्राञ्जुहोति ॥१४॥ बालान्कल्माषे काण्डे
सव्यं परिवेष्ट्य संभिनत्ति ॥ १५ ॥ प्रतपति ॥ १६ ॥
आदधाति ॥१७॥ सव्येन दक्षिणामुखः पांसून्नुपमथ्य परि-
किरति ॥१८॥ संमृद्नाति ॥१९॥ आदधाति ॥२०॥ उद्य-
सूक्त से कुश पिञ्जली से रोगी को नहवावे ॥७॥ या अवसिञ्चन
करे ॥ ८॥ भगवान् सूर्य का उदय रहते क्षेत्रिय तथा उदक तृष्णार्त
रोगी को एक पीछे दूसरे को इस भाँति बैठावे ॥ ९॥ पूर्व मुख रोगी
को एवं पश्चिम मुख निरोगी को बेत की शाखाओं पर बिठलाकर चमसे
में सत्तू धर कर उस में जल छोड़ देवे और दोनों उप मन्थनियों
द्वारा तृष्णा गृहीत के शिर पर मन्थ को मथन करके तृष्णा रहित रोगी
को तृष्णा को संक्रमण करावे ॥ १०॥ ११॥ कूप से निकले जलको उसे
पिलावे ॥ १२॥ "सवासिनौ०" इस सूक्त से मन्थ घट को अभिमंत्रण
करके पिलावे । रोगी और रोग रहित दोनों एकही प्रकार के वस्त्र पहने
हुए हों ॥ १३ ॥ अरुषी, उदर, गण्डुलक के भैषज्य को कहते हैं । "इन्द्र-
स्य या मही०" इस सूक्त से काले चणों को घी में मिलाकर आहुति देवे,
गोवाल से चित्रित शर मध्य को लपेट कर पत्थर से चूर्ण कर अग्नि
में तपावे, तब सूक्त के अन्त में अग्नि में आधान करे । वाम हाथ में
धूलि लेवे और दहिने हाथ से मार्जन करके दक्षिण मुँह हो सूक्त को जप
करके रोगी के ऊपर छीटे । यह अरुषी गण्डुलक के भैषज्य है ॥१४॥१५॥
१६॥१७॥१८॥ पलाश, गूलरकी समिधों का आधान करे ॥१९॥ सूर्य भग-
वान् का उदय रहते "उद्यन्नादि०" सूक्त से गौ के मालिक से कहे कि 'गौ का

Page 97Permalink

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ६५

नादित्य इत्युद्यति गोनामेह्याहासाविति ॥२१॥ सूक्तान्ते
ते हता इति ॥२२॥ दर्भैरभ्यस्यति ॥२३॥ मध्यन्दिने
च ॥ २४ ॥ प्रतीचीमपराह्णे ॥२५॥ बालस्तुकामाच्छिद्य
खल्वादीनि ॥२६॥ अक्षीभ्यां त इति वोद्बहम् ॥२७॥
उदपात्रेण सम्पातवतावसिञ्चति॥२८॥ हरिणस्येति बन्धन-
पायनाचमनशङ्खवानज्वालेनावनक्षत्रेऽवसिञ्चति ॥२९॥
अमितमात्रायाः सकृद्गृहीतान्यवानावपति ॥३०॥ भक्तं
प्रयच्छति ॥३१॥ मुञ्चामि त्वेति ग्राम्ये पूतिशफरोभिरो-
दनम् ॥३२॥ अस्थ्ये तिलशणगोमयशान्ताज्वालेनाव-
नाम कहा—उत्तर में वह कहे "असौ" ( जो नाम हो ) । सूक्त के अन्त
में अन्य पुरुष बोले "ते हताः" ऐसा ॥२०॥२१॥२२॥ कुशों से बार २
इसी प्रकार करे । और मध्यान्ह काल में भी करे ॥ २३ ॥ २४ ॥ घाव
पर बाल, जटा ढाक देवे । और खलवादी और अलगण्डू को घी मिला-
कर "उद्यन्नादित्य०" सूक्त से आहुति देवे "अक्षीभ्यां त०" सूक्त से मार्जन
कर गाँठों को खोल देवे । अब सर्वव्याधि भैषज्य को कहते हैं ॥ आज्य
तंत्र करके रोगी को गाँठों में बान्ध कर "अक्षीभ्यां त०" सूक्त से जलपात्र
को धोकर पुनः सूक्त को जप करके रोगी को अवसेचन करे । आँख,
कान, नाक, जीभ, गर्दन, राजयक्ष्मादि रोगों का भैषज्य समाप्त हुआ
॥ २५ । २६ । २७ । २८ ॥ "हिरण्यस्य०" तक्मनाशन सूक्त से हरिण के
सींगमणि को बान्धे । उसी शृङ्ग में जल धर कर आचमन करे । उसी
से पान करे, और हरिण के लोममणि को शङ्खुधान को मिलाकर
जलावे और जल से उसे बुताकर उसी ठण्डे जल से उषः काल में क्षेत्रिय
रोगी को अवसिंचन करे ॥ २९ ॥ और अपरिमित परिमाण यव
राशि में से एकही बार हाथ से यव को पकड़ कर प्रत्येक ऋचा से
आहुति देवे ॥३०॥ रोगी को भात खाने को देवे ॥३१॥ "मुञ्चामि त्वा०"
तक्मनाशन सूक्त से ग्राम्य रोग ( मैथुन संयोग से हुए रोग ) में पूति-
गन्धा मछली को भात के साथ रोगी को खाने को देवे ॥ ३२ ॥ जंगली
तिल, जंगली गोबर, जंगली शण, ये शान्त ओषधियाँ हैं । इनको अभि-
मंत्रण करके इससे रोगी को अवसिंचन करे। यह यक्ष्मा रोग की दवा है।
९

Page 98Permalink

६६ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
नक्षत्रेऽवसिञ्चति ॥३३॥ मृगारैर्मुञ्चेत्याप्लावयति ॥३४॥
३॥२७॥
ब्राह्मणो जज्ञ इति तक्षकायाञ्जलिं कृत्वा जपन्ना-
चमयत्यभ्युक्षति ॥ १ ॥ क्रमुकशकलं संक्षुद्य दूर्शाजरद-
जिनावकरज्वालेन ॥ २ ॥ सम्पातवत्युदपात्र ऊर्ध्वफला-
भ्यां दिग्धाभ्यां मन्थमुपमथ्य रयिधारणपिण्डानन्वृचं
प्रकीर्य छर्दयते ॥ ३ ॥ हरिद्रां सर्पिषि पाययति ॥ ४ ॥
जंगली शण से जङ्गली गोबर को जलाकर जल से अभिमंत्रण करके
रोगी को उषः काल में अवसेचन एवं अभिमंत्रण करे ॥ अब सर्वरोग
भैषज्य को कहते हैं। "आ गाव०" इन दश सूक्तों और "मुञ्च शीर्षक्त्या०"
ऋचा से जल भरे घड़े को लाकर अभिमंत्रण करके रोगी को अव-
सिंचन करे ॥ ३३ ॥ ३४ ॥ यह सत्ताईसवी कण्डिका पूरी हुई ॥३॥२७॥
स्कन्द विष के भय में भैषज्य को कहते हैं । तक्षक देवता को नम-
स्कार कर के "ब्राह्मणो जज्ञे वारिदं०" इत्यादि दो सूक्तों से जलको अभि-
मंत्रण करके रोगी को आचमन करा कर विष के रोगी को संप्रोक्षण
करे ॥ १ ॥ क्रमुक के शकल को जल के साथ अभिमंत्रण करके आचमन
एवं अभ्युक्षण करावे । पुराना वस्त्र, उकुटिका, तृणों में से किसी एक को
जला कर विषजल को अभिमंत्रण करके रोगी को अवसिंचन करे ॥
पुराने हरिण के चर्म को जलाकर जल में डाल कर अभिमंत्रण कर उस
को आमंत्रण करे । बुहारण के अवकर तृणों से जल को गर्म करके
अभिमंत्रण कर रोगी को अवसिंचन करे ॥ जलपात्र को लाकर रोगी
को स्नान करावे । विष से लेप कर दो ऊर्ध्व कपालों द्वारा विष से पुंखित
दो धनुषों से मथन कर अभिमंत्रण करके रोगी को पिलावे । मैनफलों
को प्रत्येक ऋचा से अभिमंत्रण करके जिसभाँति हो वैसे रोगी को वमन
करावे ॥ २ ॥ अब शस्त्र के अभिघात से रुधिर के बहने में भैषज्य को
कहते हैं ॥ उक्त मंथ से मट्टी को सान कर पिण्डों को बनाकर प्रत्येक
ऋचा से रोगी को खिलावे जिसमें वह वमन करे ॥ ३ ॥ हरिद्रा को
चूर्ण करके घी में डाल कर रोगी को पिलावे ॥ ४ ॥ "रौहिण्यसि०"
सूक्त से लाख के पानी को काथ बना कर अभिमंत्रण करके रोगी के

Page 99Permalink

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ६७
रोहिणीत्यवनक्षत्रेऽवसिञ्चति ॥ ५ ॥ पृषातकं पायय-
त्यभ्यनक्ति ॥६॥ आ पश्यतीति सदंपुष्पामणिं बध्नाति
॥ ७ ॥ भवाशर्वाविति सप्त काम्पीलपुटानपां पूर्णान्
सम्पातवतः कृत्वा दक्षिणेनावसिच्य पश्चादपविध्यति
॥ ८ ॥ त्वया पूर्वमिति कोशेन शमीचूर्णानि भक्ते ॥ ६ ॥
अलङ्कारे ॥ १० ॥ शालां परितनोति ॥ ११ ॥ उतामृतासु-
रिह्यमतिगृहीतस्य भक्तं प्रयच्छति ॥ १२ ॥ कुष्ठलिङ्गा-
भिर्नवनीतमिश्रेणाप्रतीहारं प्रलिम्पति ॥ १३ ॥ लाक्षा-
लिङ्गाभिर्दुग्धे फाण्टान् पाययति ॥ १४ ॥ ब्रह्म जज्ञा-
रुग्ण प्रदेश को अवसिंचन करे । यह क्रिया उषः काल में करे ॥ ५ ॥
घी मिले दूध को रोगी को पिलावे एवं इसी को शरीर में लगावे ॥ ६ ॥
“आ पश्यति०” सूक्तसे सदंपुष्पा मणि को रोगी के अङ्गों में बाँधे ॥७॥
“भवाशर्वौ” सूक्त से सात कम्पील जल पूर्ण पुटों को लाकर बायें हाथ
से रोगी को एक एक पुट को रोगी को अवसिंचन कर २ के रोगी के पीछे
फेकता जावे ॥ ८ ॥ “त्वया पूर्वं०” से शमी के पत्तों के चूर्ण को शमी
फल में डाल कर अभिमंत्रण करके रोगी को खिलावे, शमी फल को डाल
कर अभिमंत्रण करके अलङ्कार में देवे । और उसी प्रकार करके चूर्ण को
रोगी के घर में बखेर देवे ॥ ९ ॥ १० ॥ ११ ॥ “उतामृतासु०” से
बुद्धि भ्रष्ट पुरुष को इस ओषधि को खिलावे ॥ “ये गिरेष्वजायन्त०”
सूक्त, “अश्वत्थो देव सदन०” सूक्त, ये दो सूक्त, एवं “गर्भोऽसि० ”
इत्यादि तीन ऋचाओं से अर्थात् उक्त दो सूक्त और इन तीन ऋचाओं से
कुष्ठ ( कूट ) पिसा हुआ को मिला कर इसे अभिमंत्रण करके रोगी को
पिलावे और उस के शरीर में लगा तार प्रलेप करे ॥ १२ ॥ १३ ॥ शस्त्र
के अभिघात के भैषज्य को कहते हैं ॥ “रात्रि माता०” इस सूक्त से दूध
और लाख का काथ तय्यार कर अभिमंत्रण करके रोगी को खिलावे ।
शस्त्र, काठ, पत्थर, अग्नि से सारा जल जाने पर इन जख्मों की दवा समाप्त
हुई ॥ १४॥ अब स्त्री के सूति का रोग की दवा को कहते हैं । “ब्रह्म
जज्ञानं०” सूक्त से भात को अभिमंत्रण करके सूतिकादि अरिष्ट रोगिणी

Page 100Permalink

:
'द' 'दि' 'र्' 'ही' 'ति' -> "ददिर्हीति".
Then "तक्षकायैत्युक्तम् ॥ १ ॥" -> 'त' 'क्ष' 'का' 'यै' 'त्यु' 'क्त' 'म्' = "तक्षकायैत्युक्तम्".
Then "द्वितीयाया" or "द्वतीयया"?
In Bloomfield 29.2: "dvitīyayā grahaṇī"
In image: 'द्वि' 'ती' 'य' 'या' -> "द्वितीयाया" (it has an 'ा' on 'य'? No, 'द्विती' then 'य' then 'या' = "द्वितीयया"!).
Wait, look at 'य' in "द्वितीयया": is there an 'ा' on the first 'य'?
No! It is 'द्वि' 'ती' 'य' 'या' = "द्वितीयया"!
Wait, let's look at it: 'द्वि' 'ती' 'य' 'या' -> yes, "द्वितीयया"!

Now let's re-examine Line 7:
"॥२॥ सव्यं परिक्रामति ॥३॥ शिखासिचि स्तम्बानुद्ग-"
Wait, "स्तम्बानुद्ग-"
Line 8: "थ्नाति ॥४॥ तृतीयया प्रसर्जनी ॥५॥ चतुर्थ्या दक्षिणम-"
Line 9: "पेहीति दंशम तृण

Page 101Permalink

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ६९
दष्टः ॥७॥ पञ्चम्या वलीकपलालज्वालेन ॥८॥ षष्ठ्यार्त्नी-
ज्यापाशेन ॥६॥ द्वाभ्यां मधूद्वापान् पाययति ॥१०॥ नव-
म्या श्वाविट्पुरीषम् ॥११॥ त्रिःशुक्लया मांसं प्राशयति
॥१२॥ दशम्यालाबुनाचमयति ॥१३॥ एकादश्या नाभिं
बध्नाति ॥१४॥ मधुलावृषलिङ्गाभिः खलतुलपर्णी संक्षुद्य
मधुमन्थे पाययति ॥१५॥ उत्तराभिर्भुङ्क्ते ॥१६॥ द्वारं
सृजति ॥ १७ ॥ अग्निस्तक्मानमिति लाजान् पाययति
॥ १८ ॥ दावे लोहितपात्रेण मूर्ध्नि सम्पातानानयति
॥ १६ ॥ ओते म इति करीरमूलं काण्डेनेकदेशम्
॥२०॥ ग्रामात्पांसून् ॥२१॥ पश्चादग्नेर्मातुरुपस्थे मुसल-
“कैरातपृश्न०” ऋचा को पढ़कर छप्पर की ओलती के तृणों को जला-
[

Page 102Permalink

७० अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
बुध्नेन नवनीतान्वक्तेन त्रिः प्रतीहारं तालुनि तापयति
॥ २२ ॥ शिग्रुभिर्नवनीतमिश्रैः प्रदेग्धि ॥ २३ ॥ एक-
विंशतिमुशीराणि भिनत्तीति मन्त्रोक्तम् ॥ २४ ॥ उशी-
राणि प्रयच्छति ॥२५॥ एकविंशत्या सहाप्लावयति ॥२६॥
आ यं विशन्तीति वधोनिवेशनशृतं क्षीरौदनमश्नाति
॥२७॥ परिद्यामिवेति मधु शीभं पाययति ॥२८॥ जपँश्च
॥ २६ ॥ अस्थिस्रंसमिति शकलेनाप्स्वटे सम्पातवता-
वसिञ्चति ॥३०॥५॥२६॥
आवयो इति सार्षपं तैलसम्पातं बध्नाति ॥ १ ॥
काण्डं प्रलिप्य ॥२॥ पृक्तं शाकं प्रयच्छति ॥३॥ चत्वारि
कर अग्नि में तपा कर गाँव की धूलि को सूक्त पढ़कर बखेर देवे ॥२०॥२१॥
पुनः अग्नि के पश्चिम भाग में माता के गोद में कुमार को बैठाकर
करीर मूल के साथ नवनीत मिलाकर तीन बार ले २ कर कुमार के
तालु में तपावे ॥ २२ ॥ शोहजन वृक्ष के जड़ की रस को या जड़ को
नवनीत मिलाकर । “ओते म०” से अभिमंत्रण करके फेंके ॥ २३ ॥
खस के २१ जड़ को अभिमंत्रण करके पत्थर से चूर्ण करके सूक्त को
जप कर अग्नि में जलावे । तब कृमियों को देवे ॥ २५ ॥ और २१
खस की पिञ्जुली सहित को अभिमंत्रण कर रोगी को नहवावे ॥ २६ ॥
राक्षस गृहीत की दवा को कहते हैं । “आ यं विशन्ति०” सूक्त से पक्षी
के घोसले को जला कर क्षीरौदन पका कर खावे ॥२७॥ “परिद्यामिव०
सूक्त से मधु और शीर रोगी को पिलावे और सूक्त का जप करे ॥२८॥
॥२९॥ “अस्थिस्रंस०” सूक्त से शान्त वृक्ष के शकल को लाकर जल में
डालकर अग्नि जलाकर जल को गर्म कर सर्प दष्ट पुरुष को सिंचन करे
यह साँप की दवा है ॥३०॥ यह उन्तीसवी कण्डिका पूरी हुई ॥२९॥५॥
अब नेत्र की बीमारी की दवा को कहते हैं । “आवयो०” सूक्त से
सर्षप काण्डमणि को लाकर अभिमंत्रण करके सर्षप के तेल से सम्पात
वंत करके आज्य द्वारा आधान होम करके अङ्गों को सर्षप तैल से मल-
कर मणि को बान्धे ॥ १ ॥ २ ॥ और सर्षप के शाकको उसके तेल से
अभ्यक्त और अभिमंत्रण करके रोगी को खाने को देवे ॥ ३ ॥ चार शाक

Page 103Permalink

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ७१
शाकफलानि प्रयच्छति ॥४॥ क्षीरलेहमाङ्क्ते ॥५॥ अश्ना-
ति ॥ ६॥ अग्नेरिव इत्युक्तं दावे ॥ ७॥ इमा यास्तिस्र
इति वृक्षभूमौ जाताज्वालेनावसिञ्चति ॥ ८ ॥ शीर्ष
फाण्टाङ्गैः ॥ ६॥ निकटाभ्याम् ॥ १० ॥ कृष्णं नियानम-
ह्योषध्याभिश्चोतयते ॥ ११ ॥ मारुतानामप्ययः ॥ १२ ॥
हिमवत इति स्यन्दमानादन्वीपमाहार्य वलीकैः ॥ १३ ॥
पञ्च च या इति पञ्चपञ्चाशतं परशुपर्णान्काष्ठैरादीप-
यति ॥१४॥ कपाले प्रश्रुतं काष्ठेनालिम्पति ॥१५॥ किं-
फलों को रोगी को देवे और उसकी आँखों में क्षीरपाटिकालग्न मूल
क्षीर को प्राशन करा के क्षीर के लेह को आँखों में आँजे ॥५॥ ६॥
पित्त ज्वर की दवा को कहते हैं । “अग्नेरिव०” सूक्त से दावाग्नि में
अग्नि प्रणयन करके उस में ताम्बे के स्रुवा से रोगी के शिर पर सम्पात
को गिरावे ॥ ७॥ केशों के गिरने एवं बढ़ने की दवा को कहते हैं ॥ वृक्ष
भूमि पर उत्पन्न औषधियों को जलाकर उससे जल गर्म करके अभिमंत्रण
कर के प्रातः काल रोगी को अवसिंचन करे ॥ ८ ॥ “निकटावनिकटा-
भ्यां०” सूक्तों से मधु और बहेड़ का काथ बनाकर रोगी को उषः काल में
अवसिंचन करे ॥ ९ ॥ दारु हल्दी और हल्दी का काथ बना कर अभि-
मंत्रण करके उषः काल में रोगी को अवसिंचन करे ॥ १० ॥ अब उदर
तुण्ड बीमारी की दवा को कहते हैं॥ “कृष्णं नियानं०” एवं “सस्रुषीः”
इत्यादि दो सूक्तों से चिति आदि ओषधियों के सहित जल को अग्नि
में गरम करके उषः काल में रोगी को अवसिंचन करे ॥ ११ ॥ “कृष्णं
नियानं, सस्रुषीः” इन दो सूक्तों से एवं “मरुतो यजते०” से पाकयज्ञ
विधान से और “यथा वरुणं मारुतं क्षीरौदनं मारुतशृतं इत्यादि मारुत
सूक्तोक्त मंत्रों का उपयोग करे ॥ १२ ॥ अब हृदयदाह, जलोदर, कामला
रोगों की दवा को कहते हैं ॥ नदी के अनुकूल प्रवाह के जल को रोक
कर उस में छप्पर के तृणों को डाल कर रोगी को अवसिंचन करे
॥१३॥ अब गण्डमाला रोग की दवा को कहते हैं । “पञ्च च या” सूक्त से
पलाश के ५५ पत्तों को लकड़ी से जलाकर कपाल में पर्ण काठ के रस
को पकाकर पलाश के काठ से लेकर रोगी को लेपन करे और अवसे-

Page 104Permalink

७२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
स्त्यश्वजाम्बीलोदकरक्षिकामशकादिभ्यां दंशयति ॥१६॥
निह्यव मा पाप्मन्निति तितउनि पूल्यान्यवसिच्याप-
विध्य ॥१७॥ अपरेद्युः सहस्राक्षायाप्सु बलींस्त्रीन्पुरोडाश-
संवर्तींश्चतुष्पथेऽवक्षिप्यावकिरति ॥१८॥६॥३०॥
यस्ते मद इति शमीलूनपापलक्षणयोः शमीशम्याके-
नाभ्युक्ष्य वापयति ॥ १ ॥ अधिशिरः ॥ २ ॥ अन्तर्दाव
इति सन्तम्अग्नेः कर्षामुष्णपूर्णायां जपंस्त्रिः परिक्रम्य
पुरोडाशं जुहोति ॥ ३ ॥ प्राग्नये प्रेत इत्युपदधीत ॥४॥
वैश्वानरीयाभ्यां पायनानि ॥५॥ अस्थाद् द्यौरित्यपवा-
चन करे ॥ १५ ॥ शंख, कुत्ते के मुँह का लार, जलौका, गृहगोधिका
और शंख से आलेपन या कुत्ते के कफ से आलेपन करे। शंख से आलेपन
करने की दशा में रोगी को जलौका से कटवावे और कुत्ते के कफ से
आलेपन करने की दशा में गृहगोधिका से ( मशक आदि से ) आलेपन
करने की दशा में तक्मनाशन गण के सूक्त के मंत्रों को जप करे ॥१६॥
“निह्यव मा पाप्मन्०” तक्मनाशन मंत्र से चालनी में पूल्यों को डाल
कर उस में जल देकर रोगी को अवसिंचन करे ॥ १७ ॥ और दूसरे
दिन लाक्षा के साथ जल में छप्पर की ओलती के तीन तृणों को और
पुरोडाश एवं सम्पातों

Page 105Permalink

तायाः स्वयंस्रस्तेन गोशृङ्गेण सम्पातवता जपन् ॥ ६ ॥
यां ते रुद्र इति शूलिने शूलम् ॥ ७ ॥ उत्सूर्य इति
शमीबिम्बशीर्णपर्ण्यावधि ॥ ८ ॥ द्यौश्च म इत्यभ्यज्या-
वमार्ष्टि ॥ ९ ॥ स्थूणायां निकर्षति ॥ १० ॥ इदमित्था
इत्यक्षतं मूत्रफेनेनाभ्युद्य ॥ ११ ॥ प्रक्षिपति ॥ १२ ॥
प्रक्षालयति ॥ १३ ॥ दन्तरजसावेदग्धि ॥ १४ ॥ स्त-
म्बरजसा ॥ १५ ॥ अपचित आ सुस्रस इति किंस्यूता-
कर पिलावे ॥ ५ ॥ बहुत बोलना, अधम में प्रवृत्त होना अपवाद कह-
लाता है। इसका भैषज्य। अभ्यातानान्त तक क्रिया करके जिस गौ
का बच्चा अपनी मा का दूध पीना छोड़ दिया हो ऐसी गौ का सींग
अपने आप टूट जाने पर उस सींग को लेकर उसमें जल डालकर अभि-
मंत्रण करके अभ्युक्षण करके "अस्थाद् द्यौः" मन्त्र से आचमन
करावे ॥ ६ ॥ पेट, हृदय, या किसी अङ्ग या सब अङ्गों में शूल पैदा
होने की दवा को कहते हैं॥ "यान्ते रुद्र०" इस सूक्त से शूलमणि को
लाकर अभिमंत्रण कर बान्धे। लोहमणि या पाषाणमणि एक ही पदार्थ
है ॥७॥ अब रक्षोग्रह की दवा को कहते हैं। "उत्सूर्य०" से चिति आदि
ओषधियों द्वारा जल भरे घड़े को अभिमंत्रण करके रोगी को अवसिंचन
करे। शमी जल से अवसिंचन करे। शमी बिम्ब जल सहित से अव-
सिंचन करे। शीर्णपर्णी जल से अवसिंचन करे ॥ ८ ॥ अब दुष्टगण्ड
विशिष्ट की दवा को कहते हैं॥ "द्यौश्च म०" मंत्र से तेल को अभिमंत्रण
करके रोगी को सम्मार्जन करे ॥ ९ ॥ और घी से अरिष्ट को अभ्यक्त
करके जखम को घीसकर स्थूणा से पीव निकाले ॥ १० ॥ अब अक्षत
व्रण की दवा को कहते हैं। गोमूत्र या मनुष्यमूत्रके फेन को “इदमित्था०"
से अभिमंत्रण करके जखम को मर्द्दन करे (जिस घाव में पीव बहने
का मुँह न हो ) और मूत्र को फेककर हाथ धो लेवे ॥ १२॥ १३॥ जखम
को दाँत के मल से सब ओर से लेप करे (जिस दुष्ट गण्डमाल घाव का
रुधिर न बहे) और तृण के लगे धूलि को अभिमंत्रण कर लेप करे
॥ १४ ॥ १५ ॥ गण्डमाला की दवा को कहते हैं। शंख को घीसकर
"अपचित०" से अभिमंत्रण करके गण्डमाला पर लेप करे। या कुत्ते
१०

२. अध्याय ४-७: उपनयन, वेदारम्भ, मेधा-जनन, विवाह एवं स्त्री-संस्कार

Page 106Permalink

७४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
दीनि ॥१६॥ लोहितलवणं संक्षुद्याभिनिष्ठीवति ॥१७॥
अन्तरिक्षेणेति पक्षहतं मन्त्रोक्तं चङ्क्रमया ॥१८॥ कीटेन
धूपयति ॥१९॥ ग्लौरित्यक्षतेन ॥२०॥ वीहि स्वामित्य-
ज्ञातारुः शान्त्युदकेन सम्प्रोक्ष्य मनसा सम्पातवता
॥ २१ ॥ या ओषधय इति मन्त्रोक्तस्यौषधीभिर्धूपयति
॥२२॥ मधूदश्वित्पाययति ॥२३॥ क्षीरोदश्वित् ॥२४॥
उभयं च ॥२५॥ देवा अदुरिति वल्मीकेन बन्धनपायना-
चमनप्रदेहनमुष्णेन ॥ २६ ॥ यथा मनोऽव दिव इत्यरि-
के लार का लेप करे । जोंक को अभिमंत्रण करके गण्डमाला में लगा
देवे । या गृहगोधिका को अभिमंत्रण के गण्डमाला में लगा देवे ॥१६॥
सैंधव नून को चूर्ण करके अभिमंत्रण कर गण्डमाला पर छींटे और उस
पर थूक देवे एवं मुख के लार को उस पर डाल देवे ॥ १७ ॥ पक्षी के
काटने से जखम होने पर उसकी दवा को कहते हैं । “अन्तरिक्षेण०”
से कुत्ते के पैर के नीचे की मट्टी को अभिमंत्रण करके काटे जखम पर
लेप करे ॥१८॥ कुत्ते के शरीर पर के कीट को अभिमंत्रण करके उसे अग्नि
में डालकर धूप देवे ॥ १९ ॥ “ग्लौरितः प्रपतिष्यति०” इस आधी
ऋचा से गोमूत्र को अभिमंत्रण करके गण्डमाला को मर्दन करे प्रक्षालन
करे और दाँत के मल से प्रलेप करे और तृणरज का लेप करे ॥ २० ॥
अब गदहे आदि के ऊरुगण्ड की दवा को कहते हैं । “वीहि स्वां०” मंत्र
से शान्तिजल को अभिमंत्रण करके जखम को प्रोक्षण करे । आज्य की
आहुति देवे । तब मन से संकल्प करे और सम्पातों को देवे ॥२१॥ पाप-
गृहीत जलोदर की दवा को कहते हैं । “या ओषधय०” से दूधवाली दवा-
ओं का धूप देवे । और आधा पानी महा हुआ तक्र रोगी को पिलावे ।
दूध, और उदश्वित् रोगी को पिलावे ॥२२॥२३॥२४॥ दोनों ही को पिलावे
॥ २५ ॥ विष, उपविष, स्थावरविष, जङ्गमविष, मधुमक्षिकाविष, इनकी
दवा को कहते हैं । “देवा अदुः” सूक्त द्वारा दीमक की मट्टी को बान्धे,
पिलावे, आचमन करावे, एवं उसको गरम करके रोगी को लेप करे
॥२६॥ कास और कफ गिरने की दवा को कहते हैं । “यथा मनोऽव
दिव०” से अरिष्ट गृहीत व्यक्ति को भोजन को अभिमंत्रण करके देवे । सत्तु

Page 107Permalink

[Page Header: अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ७५]

ष्टेन ॥२७॥ देवी देव्यां यां जमदग्निरिति मन्त्रोक्तफलं
जीव्यलाकाभ्याममावास्यायां कृष्णवसनः कृष्णभक्षः
पुरा काकसम्पातादवनक्षत्रेऽवसिञ्चति ॥२८॥७॥३१॥
यस्ते स्तन इति जम्भगृहीताय स्तनं प्रयच्छति
॥१॥ प्रियङ्गुतण्डुलानभ्यवदुग्धान्पाययति ॥२॥ अग्ना-
विष्णू सोमारुद्रा सिनीवालि वि ते मुञ्चामि शुम्भनी
इति मौञ्जैः पर्वसु बद्धा पिञ्जलीभिराप्लावयति ॥३॥ अवसि-
ञ्चति ॥४॥ तिरश्चिराजेरिति मन्त्रोक्तम् ॥५॥ आकृतिलोष्ट-
वल्मीकौ परिलिख्य ॥६॥ पायनानि ॥७॥ अपचिता-


के मंथ को अभिमंत्रण करके देवे । एवं सूर्य का उपस्थान करे और अभि-
मंत्रित जल से आचमन करावे ॥ २७ ॥ “देवी देव्यां०” मंत्रोक्त फल
काचीमाची फलमणिको भृङ्गराजमणि को बान्धे । जीवन्ती फलको बांधे ।
भृङ्गराज को बान्धे । केशों को दृढ़ करने, केशों के उत्पन्न होने, छोटे
केशों के बढ़ने की दवा कही गयी है । माष ( उड़ीद ) तिलादि काले
अन्न को खिलाकर काची माची फल को भृङ्गराज के द्वारा जल के
साथ अभिमंत्रण करके रात्रि में ब्राह्ममुहूर्त्त में अवसिंचन करे ॥२८॥
७ ॥ ३१ ॥ यह इकतीसवीं कण्डिका पूरी हुई ॥
जिस शिशु को जम्भु आदि पकड़ लिया हो उसकी माता के स्तनों
को “यस्ते स्तन०” मंत्र से अभिमंत्रण करके बच्चे के मुखमें लगा देवे
॥ १ ॥ इस क्रिया को उसका पति करे ॥ दुःखनाशके भैषज्य को कहते हैं
मालकौनी के चावलों को, बच्चे की मां या बाप बालक को पिलावे, तब
उसे दूध पिलावे ॥ २ ॥ “अग्नाविष्णू०” इत्यादि से मूँज को गांठों में
बांध कर उसकी पिंजुलियों से बच्चे को नहवावे या सिंचन कर ॥ ३ ॥
बिच्छु काटने की दवा । “तिरश्चिराज०” इन आठ ऋचाओं से जेठी-
मधु को पीस कर अभिमंत्रण करके बिच्छु काटे व्यक्ति को पिलावे
॥ ४ ॥ ५ ॥ खेत की मट्टी को जीव कोषणी के चमड़े में लपेट,करके
मणि बना करके भूमि पर धरकर अभिमंत्रण करके रोगी को बान्ध देवे
॥ ६ ॥ विषदूषण में जो उपायन ओषधियां कही गईं हैं, वे “तिरश्चि-
राज०” सूक्त पठित जानो । बिच्छू, मशक, पिपीलिका, शार्कोटक,

Page 108Permalink

७६ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
मिति वैणवेन दार्भ्यूषेण कृष्णोर्णाज्येन कालबुन्दैः स्तुका-
ग्रैरिति मन्त्रोक्तम् ॥८॥ चतुर्थ्याभिनिधायाभिविध्यति
॥९॥ ज्यास्तुकाज्वालेन ॥१०॥ यः कीकसा इति पिशील-
वीणातन्त्रीं बध्नाति ॥११॥ तन्त्र्या क्षितिकाम् ॥ १२॥
वीरिणवध्री स्वयंम्लानं त्रिः समस्य ॥१३॥ अप्सु त इति
वहन्त्योर्मध्ये विमिते पिञ्जुलीभिराप्लावयति ॥ १४ ॥
अवसिञ्चति ॥१५॥ उष्णाः सम्पातवतीरसम्पाताः ॥१६॥
नमो रुरायेति शकुनीनिवेषीकाङ्घ्रिमण्डूकं नीललोहिता-
भ्यां सूत्राभ्यां सकक्षं बद्ध्वा ॥१७॥ शीर्षक्तिमित्यभिमृ-
जोंक की दवायें कही गई जानो ॥ ७ ॥ फिर गण्डमाला की दवा को
कहते हैं । “अपचितां०” इन दो एवं “आसुस्रसः” इस एक, इन तीन
ऋचाओं से बांस के धनुष को काले रंग के भेड़के दुम की ज्या बनाकर
चित्रित शर से गण्डमाला को प्रत्येक ऋचा से विद्ध करे । तीन ऋचायें
हैं एवं तीन ही शर हैं । चौथी ऋचा-“या ग्रैव्या अपचित०” से गण्ड-
माला पर धरकर विद्ध करे और अवसिंचन करे ॥ ८ ॥ ९ ॥ काले रंग
के भेड़े के स्तुकाग्रको जलाकर उसपर जलको गरम करके उससे उषः-
काल में रोगी को अवसिंचन करे ॥ १० ॥ अब राजयक्ष्मा रोग के भैष-
ज्य को कहते हैं। “यः कीकसार्क०” इन तीन ऋचाओं से वीणातंत्री खण्ड
को डालकर अभिमंत्रण करके बान्धे ॥ ११॥ वीणा के गस्वर को विष्णो
वाद्य वीणाकंठ शिखण्ड को वीणा तंत्री बांधकर भूमि पर डालकर अभि-
मंत्रण करके बान्धे ॥ १२ ॥ स्वयं पतित वीरिण के खण्डों को एकत्र बांध
कर डालकर अभिमंत्रण कर बान्धे ॥ १३ ॥ जलोदर रोग जो वरुण से
पकड़ा गया हो उसकी दवा । “अप्सु त०” से दो बहती नदियों के संगम
पर घर बनाकर रोगी को संगम के जल से नहवाया करे ॥ १४ ॥ या
उस जल से अवसिंचन करे ॥ १५ ॥ जिसको रोगी पर डाले वह गरम
जल होना चाहिये । और जो असम्पात जल हो शीतल होना चाहिये
जिससे आसिंचन करे ॥ १६ ॥ “नमो रुराय०” ( तक्म नाशन गण )
इन दो सूक्तों से रोगी को खाट पर कर देवे और उसके नीचे हरे सूत
से रोगी के बांये जंघा में बान्धे । बाण की भाँति रेखा को इषीका कहते

Page 109Permalink

शति ॥१८॥ उत्तमाभ्यामादित्यमुपतिष्ठते ॥१६॥ इन्द्रस्य
प्रथम इति तक्षकायैस्त्युक्तम् ॥२०॥ पैद्वं प्रकृष्य दक्षिणे-
नाङ्गुष्ठेन दक्षिणस्यां नस्तः ॥२१॥ अहिभये सिच्यवगृह-
यति ॥२२॥ अङ्गादङ्गादित्या प्रपदात् ॥२३॥ दंष्ट्रोत्त-
मया निताप्याहिमभिनिरस्यति ॥२४॥ यतो दष्टः ॥२५॥
ओषधिवनस्पतीनामनूक्तान्यप्रतिषिद्धानि भैषज्यानाम्
॥२६॥ अंहोलिङ्गाभिः ॥२७॥ पूर्वस्य पुत्रकामावतोकयो-
हैं । उसको नीले तथा लाल सूत से दोनों कक्षों में बान्धकर शकुनी की
भांति करे ॥ १७॥ “शीर्षक्ति०” सूक्त से रोगी को अभिमर्शन करे
॥ १८॥ और इस सूक्त के प्रथम दो ऋचाओं से सूर्य का उपस्थान करे
॥ १६॥ एवं “इन्द्रस्य प्रथम ब्रह्मणो यज्ञ०” सूक्त से रक्षक देवको हाथ
जोड़कर प्रणाम करे ॥२०॥ एवं उक्त सूक्त से पैद्वनामक कीट (तालिणी )
को पीसकर अभिमंत्रित करके सर्पदष्ट रोगी के नाक के दहिने छिद्र में
नस्य देवे ॥ २१॥ और जिस घरमें सर्प का भय हो, वहां पैद्व
को सफेद वस्त्र में लपेट करके स्थापित करके उसके सारे अङ्गों को
मार्जन करे । और “आरे अभूत्०” इत्यादि तीन ऋचाओं से उल्मुक को
अग्नि में तपाकर अभिमंत्रण करके विष के जखम को देखकर उस ओर
उल्मुकको छोड़ देवे । सर्प भय एवं सर्प दष्टकी दवा समाप्त हुई ॥२२॥
२३॥२४॥२५॥ कौशिक सूत्रों में जिन सब रोगों की ओषधियाँ कही
गयीं और नहीं कही गयीं उनकी पूर्त्ति में सब रोगों के भैषज्य
को कहते हैं । सब रोगों के उपचार में मंत्र ओषधियां ( वनस्पतियाँ )
और जो २ नहीं कही गयीं या जिनका प्रतिषेध नहीं किया गया—ऐसे
भैषज्यों का ज्ञान “अंहोलिङ्गिक” गण के द्वारा करना चाहिये । जैसे,
“आशानामाशापालेभ्यः”०-यह एक । अंहोलिङ्गगण ॥ और जो २
प्रतीकें कही जाती हैं उनके द्वारा अभिमंत्रण करने से सब रोगों के
भैषज्य होते हैं—उनका वर्णन किया जाता है । “अक्षिभ्यां ते, मुञ्चामि
त्वा, उत देवाः, आवतस्य, शीर्षक्ति ॥ अंहोलिङ्ग गण ॥ इन पांच प्रतीकों
द्वारा या इनमें से किसी एक प्रतीक से अभिमंत्रण करना चाहिये ॥
अंहोलिङ्गगण । ( यह सब रोगों की दवायें हैं ) या उन सब सूक्तों द्वारा

Page 110Permalink

७८ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
रुदकान्ते शान्ता अधिशिरोऽवसिञ्चति ॥२८॥ आव्रजितायै
पुरोडाशप्रमन्द्धालङ्कारान् सम्पातवतः प्रयच्छति ॥२९।८।३२॥
वषट् ते पूषन्निति चतुर उदपात्रे सम्पातानानीय
चतुरो मुञ्जान्मूर्ध्नि विबृहति प्राचः ॥१॥ प्रतीचीरिषीकाः
॥२॥ छिद्यमानासु संशयः ॥३॥ उष्णेनाप्लावयति दक्षि-
णात्केशस्तुकात् ॥४॥ शालान् ग्रन्थीन् विचृतति ॥५॥ उभ-
करे या अंहोलिङ्गगण द्वारा करे ॥ उन रोगों की परिगणना की जाती है
॥२७॥ अब तात्पर्य यह है कि जिन ओषधियों और वनस्पतियों का प्रति-
षेध वैद्यक शास्त्र में किया गया है—व्याधि निदान सम्बन्धि
भैषज्य के मंत्रों का उपदेश वैद्यक शास्त्रों में नहीं किया गया है
क्योंकि मंत्रों, तन्त्रों, यन्त्रों आदि द्वारा रोगों तथा रोगों के अदृष्ट वा
अप्रत्यक्ष कारण अदृष्ट शक्ति द्वारा ही जाना जाता है। अतएव अथर्ववेद
की शाखाओं तथा ब्राह्मण, गण, सूत्र आदि प्रोक्त विधि अनुसार यहां कहा
जाता है। जैसे स्त्री कर्मसंहिता का वर्णन किया जाता है—“य आशा-
नामाशापाला अग्नेर्मन्व०” ये सूक्त और “या ओषधयः सोमराज्ञीर्वैश्वा-
नरो न आगमच्छुम्भनी द्यावापृथिवी यदर्वाचीनमग्निं ब्रूमो वनस्पतीन्”
मुञ्चन्तु मा भवाशर्वौ यादेवीर्यन्मातली रथक्रीतम्”—इन चार को छोड़
कर अंहोलिङ्गगण है ॥३२॥ “अग्नेर्मन्व०” ये सात सूक्त हैं ॥ “पूर्वं
त्रिषप्रीयं०” पुत्र कामना मृतवत्सा के लिये। शान्ता ओषधियों से रोगी
के शिर पर अवसिंचन करे। प्रवास से घर पर वापस आने वाले के
लिये पुरोडाश, प्रमन्द, अलंकारों को सम्पातवन्त करके देवे ॥२७॥२८
॥२९॥८॥ यह बत्तीसवीं कण्डिका समाप्त हुई ॥३२॥
अब प्रसूति करण (प्रसव काल में सुख पूर्वक सन्तान पैदा हो) को
कहते हैं। “वषट् ते पूषन्०” इस सूक्त से चार जलपात्र में चार कुशों
को गर्भिणी के शिर पर पूर्वाग्र और पश्चिमाग्र कर उच्छ्रित करे ॥१॥२॥
शिर पर के डाले कुशों के टूट जाने पर गर्भस्थ बच्चे का मरण होने का
सन्देह होता है ॥३॥ गर्भिणी के शिरके दक्षिण केश-समुदाय को गर्म
जल से नहवावे ॥४॥ सूक्त पढ़ने के अन्त में सूतिका घर के बन्धनों
को काट डाले ॥५॥ और गाड़ी के जूये के दोनों कील को गर्भिणी के

Page 111Permalink

ननं व्याख्यातम्"
"स्रजेनौषधिखननं" - स्र-जे-नौ-ष-धि-ख-न-नं.
Everything is clear and accurate.thought
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ७९
यतः पाशं योक्त्रमाबध्नाति ॥६॥ यदि सोमस्यासि राज्ञः
सोमात्त्वा राज्ञोऽधिक्रीणामि यदि वरुणस्यासि राज्ञो
वरुणात्त्वा राज्ञोऽधिक्रीणामीत्येकविंशत्या यवैः स्रजं
परिकिरति॥७॥अन्या वो अन्यामवत्वन्यान्यस्या उपावत
सध्रीचीः सव्रता भूत्वास्या अवत वीर्यमिति संनयति
॥ ८ ॥ मा ते रिषन्खनिता यस्मै च त्वा खनामसि ।
द्विपाच्चतुष्पादस्माकं मा रिषद्देव्योषधे ॥ स्रजो नामासि
प्रजापतिष्टामखनदात्मने शल्यसंसनम् ॥ तां त्वा वयं
खनामस्यमुष्मै त्वा शल्यस्रंसनमिह्यस्तमिते छत्रेण चान्त-
र्धाय फालेन खनति ॥६॥

Page 112Permalink

curve down.
Now look at the digit in L11: it has a loop on the left and a curve down! Wait, did the typesetter accidentally put ॥१९॥?
Wait, look at L16:
॥१८॥॥२०॥६॥? Wait! In L16, the first number is ॥ १८ ॥ or ॥१९॥?
Wait, look at the two numbers in L16:
First: ॥१८॥? No, wait!
Look at the digits in L16:
First is ॥ then १ then ८? No, look at the loop: it has a loop at top and bottom? No, wait, in L16:
First number: ॥ then १ then ८? No, ॥२०॥ is the second one!
Wait, look at L16:
There is ॥ then ? then ॥ then २० then ॥ then ६ then ॥!
Wait, what is that first number? It's १८ or १९?
If L11 has ॥१९॥? Wait, if L11 has ॥१८॥, then L16 has ॥१९॥!
Let's look at L11 again:
In L11: ॥ १८ ॥ or ॥ १९ ॥?

Page 113Permalink

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ८१
कृष्णं व्रजति ॥६॥ आदीप्य ब्रह्मा ॥७॥ एवं पूर्वयोः पृथक्
संभार्ये ॥८॥ शाखासूक्तम् ॥९॥ पश्चादग्नेरभितः काण्डे
इषीके निधायाध्यधि धायिने औदुम्बरीराधापयति ॥१०॥
उत्तमाव्रजितायै ॥११॥ पतिवेदनानि ॥१२॥ आ नो अग्न
इत्यागमकृशरमाशयति ॥१३॥ मृगाखराद्वेद्यां मन्त्रो-
क्तानि सम्पातवन्ति द्वारे प्रच्छति ॥१४॥ उदकंसे
व्रीहियवौ जाम्यै निशि हुत्वा दक्षिणेन प्रक्रामति ॥१५॥
पश्चादग्नेः प्रक्षाल्य संधाव्य सम्पातवतीं भगस्य नाव-
मिति मन्त्रोक्तम् ॥१६॥ सप्तदाम्यां सम्पातवत्यां वत्सान्
प्रह्यन्तान्प्रनृत्तन्तो वहन्ति ॥१७॥ अहतेन सम्पातवता
ऋषभमभ्यस्यति ॥ १८ ॥ उदर्दयति यां दिशम् ॥१९॥
पश्चिम में कर्म किया है उसी प्रकार पूर्व के दोनों घरों में कर्म होना
चाहिये । इस सूक्त के शिंशापादि की शाखाओं में उदक तक कर्म होता है।
समिदाधानाग्नि के पश्चिम भाग में काष्ठ द्वारा इषीका डालकर उसपर
उदुम्बर की लकड़ी धरे—तोरण के आकार का आधान करे । पुरोडाश,
प्रमन्द, अलंकार को धर कर देवे ॥४॥५॥६॥७॥८॥९॥१०॥११ अब पति
लाभ फल कर्मों को कहते हैं ॥१२॥ "आनो अग्न०" से तिल चावल का
भात बना कर स्त्री को खिलावे ॥१३॥ मृगाओं से नित्य सेवित देश को
"मृगाखर" कहते हैं । वहां से मिट्टी लाकर वेदि बनावे । इसमें
सम्पात करके आखर, सोना, गुग्गुल, गजोदक जामिक मातृका
इसका कर्म है । यथोक्त सम्पादन कर बन्धन, धूपन प्रलेपन करे । उस
घर के दक्षिण भाग में बहिन एवं भ्राता कुमारी को अपक्रमण करावे
॥१४॥१५ अग्नि के पश्चिम भाग में नाव को प्रक्षालन कर सम्पातवती
करके कुमारी को नाव पर चढ़ावे "भगस्य नावम्०" मंत्र जप कर
नाव से कुमारी को उतारे ॥१६॥ और सप्तदान तंत्री से वत्सों को बांध
करके धर कर अभिमंत्रण कर कुमारी से छुड़वावे । यदि कुमारी से
प्रदक्षिण पूर्वक छोड़वाई जावे तो पति लाभ होगा। और नये वस्त्र
पहनकर वृषभ को छोड़े ॥१७॥१८॥ वृषभ जिस ओर को जावे उसी
११

Page 114Permalink

८२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
जाम्यै प्र यदेत इत्यागमकृशरम् ॥२०॥ इमा ब्रह्मेति
स्वस्रे ॥२१॥ अयमा यातीति पुरा काकसम्पातादर्यम्णे
जुहोति ॥२२॥ अन्तःस्रक्तिषु बलीन् हरन्ति ॥२३॥
आपतन्ति यतः ॥२४॥१०॥३४॥
पुंसवनानि ॥१॥ रजउदासायाः पुंनक्षत्रे ॥२॥ येन
वेहदिति बाणं मूर्ध्नि विवृहति बध्नाति ॥३॥ फालचमसे
सरूपवत्साया दुग्धे व्रीहियवाववधाय मूर्च्छयित्वाध्य-
ण्डे बृहतीपलाशविदर्यौ वा प्रतिनीय पैद्वमिव ॥४॥ पर्व-
ताद्दिव इत्यागमकृशरमाशयति ॥५॥ युगतर्द्धना सम्पा-
तवन्तं द्वितीयम् ॥६॥ खे लूनींश्च पलाशत्स्रुन्निवृत्ते
ओर को जाने देवे ॥१९॥ “जाम्यै प्र यदेत०” से भाई बहिन दोनों को
और “इमा ब्रह्म०” से बहिन को आगम कृशर खिलावे ॥२०॥२१॥ प्रातः
काल “अर्यम्णे०” से सूर्य्य को आहुति देवे । ॥२२॥ इसके अनन्तर
‘अर्यम्णे०” आधी ऋचा से घर के भीतर कोणों में बलि देवे । जिस
दिशा से प्रातःकाल काकों का आगमन हो, उसी दिशा से पति लाभ
जानो ॥२४॥१०॥३४॥ यह चौतीसवीं कण्डिका समाप्त हुई ॥३४॥
अब पुंसवन संस्कार को कहते हैं । यह संस्कार गर्भ से पञ्चम
मास में होता है ॥१॥ रजोधर्म से शुद्ध हुई स्त्री को स्नान कर लेने पर
पुंनामक नक्षत्र में “येन वेहत्०” मंत्र से शरमणि को लाकर अभि-
मंत्रण करके स्त्री के गले में बांधे ॥२॥३॥ फाल के बने चमसे में सरूप-
वत्सा गौ के दूध में व्रीहि और यव को डालकर मूर्छन करके या अध्य-
ण्डमें बृहती, पलाश और विदारी को डालकर पैद्व (बूटी) की भाँति स्त्री
के पति नाक के दहिने छिद्र में दहिने हाथ के अंगूठे से नस्य देवे ॥४॥
रजोधर्म के पश्चात् चौथे दिन “पर्वताद्दिव०” सूक्त से आज्य की आहुति
करे । भात में तिल मिश्र आगम कृशर को गर्भिणी को खिलावे और
इसी सूक्त से दूसरे कृश्न आगम कृशर को गाड़ी के युग छिद्र में डाल
कर गर्भिणी को खिलावे । ‘पुष्पवतीः’० मंत्र से ॥५॥६॥ पलाश काष्ठ
की बनी तलवार की मूठ ( त्सरु ) । टूटी हुई पलाश त्सरु निवृत्त पर