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कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

by महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह)

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DevanagariHindipublished361 pages

Page 95 of 361

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Page 95

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ६३

॥४१॥ अपेयमिति व्युच्छन्त्याम् ॥४२॥ बभ्रोरिति
मन्त्रोक्तमाकृतिलोष्टवल्मीकौ परिलिख्य जीवकोषण्या-
मुत्सीव्य बध्नाति ॥४३॥२॥२६॥
नमस्ते लाङ्गलेभ्य इति सीरयोगमधिशिरोऽवसि-
ञ्चति ॥१॥ नमः सनिस्स्रासेभ्य इति शून्यशालायामप्सु
सम्पातानानयति ॥२॥ उत्तरं जरत्खाते सशालतृणे॥३॥
तस्मिन्नाचामयन्त्याप्लावयति ॥ ४ ॥ दशवृक्षेति शाकलः
॥ ५ ॥ दश सुहृदो जपन्तोऽभिमृशन्ति ॥ ६ ॥ क्षेत्रिया-
त्त्वेति चतुष्पथे काम्पीलशकलैः पर्वसु बद्धा पिञ्जूली-
मणि बनाकर पहने या बान्धे ॥३३-४०॥ अब क्षेत्रिय (कुल परम्परा से
होने वाले रोग) रोगों के भैषज्य को कहते हैं ॥ “उद्गाताम्” तक्म-
नाशन गण के मंत्र से घर के बाहर प्रातः काल उषः काल में क्षेत्रिय
(कोढ़, क्षय रोग, संग्रहणी आदि) रोगी को स्नान करावे और “बभ्रोर-
र्जुन काण्डस्य०” इन तीन ऋचा से अर्जुन काठ को, जौके भूसा, तिल-
पिञ्जिका, आकृति लोष्ट, वल्मीक इन को भली-भाँति चूर्ण करके जीते
पशु के चर्माङ्गस्थलिका में डालकर सूई से उसे सी करके रोगी को
बान्ध देवे ॥ ४१।४२।४३ ॥ यह छब्बीसवीं कण्डिका समाप्त हुई ॥२६॥
क्षेत्रिय रोगी को हलयुक्तबैलों द्वारा शिरपर “नमस्ते लाङ्गलेभ्य०”
से जलपात्र से अवसेचन करे ॥ १ ॥ शून्य घर में पुराने गर्त में घरके
छप्पर की ओलनी के खर्रों को डाल कर उत्तर सम्पातों को “नमः स-
निस्रसा०” मंत्र से लावे ॥२॥ रोगी को उस पुराने गर्त में खड़े कर देवे
एवं सम्पातोदक से उसे आचमन करावे और स्नान करा देवे ॥३॥४॥
क्षेत्रिय रोग के भैषज्य की समाप्ति हुई ॥ अब ब्रह्मग्रह के भैषज्य को कहते
हैं ॥ तक्म नाशन गण “दशवृक्ष०” इस सूक्त से दश शान्त वृक्षों के
शकलों को लेकर लाख एवं सोने से वेष्टित मणि बना कर दश मित्र मिल-
कर इस सूक्त का जप करें और पिशाच गृहीत को अभिमर्शन करे ॥६॥
फिर क्षेत्रिय रोगी के भैषज्य को कहते हैं । क्षेत्रिय रोगी को चौराहे पर
लेजाकर काम्पील शकलों से गांठों में बान्धकर “क्षेत्रियात्त्वा०” इस