कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
by महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह)
Page 96 of 361
Read in context६४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
भिराप्लावयति ॥७॥ अवसिञ्चति ॥८॥ पार्थिवस्येत्युद्यति
पृष्ठसंहितावुपवेशयति ॥९॥ प्राङ्मुखं व्याधितं प्रत्यङ्मु-
खमव्याधितं शाखासूपवेश्य वैतसे चमसे उपमन्थ-
नीभ्यां तृष्णागृहीतस्य शिरसि मन्थमुपमथ्यातृषि-
ताय प्रयच्छति ॥ १०॥ तस्मिंस्तृष्णां संनयति ॥ ११ ॥
उद्धृतमुदकं पाययति ॥ १२ ॥ सवासिनाविति मंत्रो-
क्तम् ॥ १३ ॥ इन्द्रस्य या महीति खल्वञ्जान्लाण्डून्
हननान् घृतमिश्राञ्जुहोति ॥१४॥ बालान्कल्माषे काण्डे
सव्यं परिवेष्ट्य संभिनत्ति ॥ १५ ॥ प्रतपति ॥ १६ ॥
आदधाति ॥१७॥ सव्येन दक्षिणामुखः पांसून्नुपमथ्य परि-
किरति ॥१८॥ संमृद्नाति ॥१९॥ आदधाति ॥२०॥ उद्य-
सूक्त से कुश पिञ्जली से रोगी को नहवावे ॥७॥ या अवसिञ्चन
करे ॥ ८॥ भगवान् सूर्य का उदय रहते क्षेत्रिय तथा उदक तृष्णार्त
रोगी को एक पीछे दूसरे को इस भाँति बैठावे ॥ ९॥ पूर्व मुख रोगी
को एवं पश्चिम मुख निरोगी को बेत की शाखाओं पर बिठलाकर चमसे
में सत्तू धर कर उस में जल छोड़ देवे और दोनों उप मन्थनियों
द्वारा तृष्णा गृहीत के शिर पर मन्थ को मथन करके तृष्णा रहित रोगी
को तृष्णा को संक्रमण करावे ॥ १०॥ ११॥ कूप से निकले जलको उसे
पिलावे ॥ १२॥ "सवासिनौ०" इस सूक्त से मन्थ घट को अभिमंत्रण
करके पिलावे । रोगी और रोग रहित दोनों एकही प्रकार के वस्त्र पहने
हुए हों ॥ १३ ॥ अरुषी, उदर, गण्डुलक के भैषज्य को कहते हैं । "इन्द्र-
स्य या मही०" इस सूक्त से काले चणों को घी में मिलाकर आहुति देवे,
गोवाल से चित्रित शर मध्य को लपेट कर पत्थर से चूर्ण कर अग्नि
में तपावे, तब सूक्त के अन्त में अग्नि में आधान करे । वाम हाथ में
धूलि लेवे और दहिने हाथ से मार्जन करके दक्षिण मुँह हो सूक्त को जप
करके रोगी के ऊपर छीटे । यह अरुषी गण्डुलक के भैषज्य है ॥१४॥१५॥
१६॥१७॥१८॥ पलाश, गूलरकी समिधों का आधान करे ॥१९॥ सूर्य भग-
वान् का उदय रहते "उद्यन्नादि०" सूक्त से गौ के मालिक से कहे कि 'गौ का