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कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

by महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह)

DevanagariHindipublished361 pages

Page 104 of 361

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Page 104

७२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
स्त्यश्वजाम्बीलोदकरक्षिकामशकादिभ्यां दंशयति ॥१६॥
निह्यव मा पाप्मन्निति तितउनि पूल्यान्यवसिच्याप-
विध्य ॥१७॥ अपरेद्युः सहस्राक्षायाप्सु बलींस्त्रीन्पुरोडाश-
संवर्तींश्चतुष्पथेऽवक्षिप्यावकिरति ॥१८॥६॥३०॥
यस्ते मद इति शमीलूनपापलक्षणयोः शमीशम्याके-
नाभ्युक्ष्य वापयति ॥ १ ॥ अधिशिरः ॥ २ ॥ अन्तर्दाव
इति सन्तम्अग्नेः कर्षामुष्णपूर्णायां जपंस्त्रिः परिक्रम्य
पुरोडाशं जुहोति ॥ ३ ॥ प्राग्नये प्रेत इत्युपदधीत ॥४॥
वैश्वानरीयाभ्यां पायनानि ॥५॥ अस्थाद् द्यौरित्यपवा-
चन करे ॥ १५ ॥ शंख, कुत्ते के मुँह का लार, जलौका, गृहगोधिका
और शंख से आलेपन या कुत्ते के कफ से आलेपन करे। शंख से आलेपन
करने की दशा में रोगी को जलौका से कटवावे और कुत्ते के कफ से
आलेपन करने की दशा में गृहगोधिका से ( मशक आदि से ) आलेपन
करने की दशा में तक्मनाशन गण के सूक्त के मंत्रों को जप करे ॥१६॥
“निह्यव मा पाप्मन्०” तक्मनाशन मंत्र से चालनी में पूल्यों को डाल
कर उस में जल देकर रोगी को अवसिंचन करे ॥ १७ ॥ और दूसरे
दिन लाक्षा के साथ जल में छप्पर की ओलती के तीन तृणों को और
पुरोडाश एवं सम्पातों