कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
by महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह)
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Read in contextअथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ६७
रोहिणीत्यवनक्षत्रेऽवसिञ्चति ॥ ५ ॥ पृषातकं पायय-
त्यभ्यनक्ति ॥६॥ आ पश्यतीति सदंपुष्पामणिं बध्नाति
॥ ७ ॥ भवाशर्वाविति सप्त काम्पीलपुटानपां पूर्णान्
सम्पातवतः कृत्वा दक्षिणेनावसिच्य पश्चादपविध्यति
॥ ८ ॥ त्वया पूर्वमिति कोशेन शमीचूर्णानि भक्ते ॥ ६ ॥
अलङ्कारे ॥ १० ॥ शालां परितनोति ॥ ११ ॥ उतामृतासु-
रिह्यमतिगृहीतस्य भक्तं प्रयच्छति ॥ १२ ॥ कुष्ठलिङ्गा-
भिर्नवनीतमिश्रेणाप्रतीहारं प्रलिम्पति ॥ १३ ॥ लाक्षा-
लिङ्गाभिर्दुग्धे फाण्टान् पाययति ॥ १४ ॥ ब्रह्म जज्ञा-
रुग्ण प्रदेश को अवसिंचन करे । यह क्रिया उषः काल में करे ॥ ५ ॥
घी मिले दूध को रोगी को पिलावे एवं इसी को शरीर में लगावे ॥ ६ ॥
“आ पश्यति०” सूक्तसे सदंपुष्पा मणि को रोगी के अङ्गों में बाँधे ॥७॥
“भवाशर्वौ” सूक्त से सात कम्पील जल पूर्ण पुटों को लाकर बायें हाथ
से रोगी को एक एक पुट को रोगी को अवसिंचन कर २ के रोगी के पीछे
फेकता जावे ॥ ८ ॥ “त्वया पूर्वं०” से शमी के पत्तों के चूर्ण को शमी
फल में डाल कर अभिमंत्रण करके रोगी को खिलावे, शमी फल को डाल
कर अभिमंत्रण करके अलङ्कार में देवे । और उसी प्रकार करके चूर्ण को
रोगी के घर में बखेर देवे ॥ ९ ॥ १० ॥ ११ ॥ “उतामृतासु०” से
बुद्धि भ्रष्ट पुरुष को इस ओषधि को खिलावे ॥ “ये गिरेष्वजायन्त०”
सूक्त, “अश्वत्थो देव सदन०” सूक्त, ये दो सूक्त, एवं “गर्भोऽसि० ”
इत्यादि तीन ऋचाओं से अर्थात् उक्त दो सूक्त और इन तीन ऋचाओं से
कुष्ठ ( कूट ) पिसा हुआ को मिला कर इसे अभिमंत्रण करके रोगी को
पिलावे और उस के शरीर में लगा तार प्रलेप करे ॥ १२ ॥ १३ ॥ शस्त्र
के अभिघात के भैषज्य को कहते हैं ॥ “रात्रि माता०” इस सूक्त से दूध
और लाख का काथ तय्यार कर अभिमंत्रण करके रोगी को खिलावे ।
शस्त्र, काठ, पत्थर, अग्नि से सारा जल जाने पर इन जख्मों की दवा समाप्त
हुई ॥ १४॥ अब स्त्री के सूति का रोग की दवा को कहते हैं । “ब्रह्म
जज्ञानं०” सूक्त से भात को अभिमंत्रण करके सूतिकादि अरिष्ट रोगिणी