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कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

by महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह)

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DevanagariHindipublished361 pages

Page 97 of 361

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Page 97

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ६५

नादित्य इत्युद्यति गोनामेह्याहासाविति ॥२१॥ सूक्तान्ते
ते हता इति ॥२२॥ दर्भैरभ्यस्यति ॥२३॥ मध्यन्दिने
च ॥ २४ ॥ प्रतीचीमपराह्णे ॥२५॥ बालस्तुकामाच्छिद्य
खल्वादीनि ॥२६॥ अक्षीभ्यां त इति वोद्बहम् ॥२७॥
उदपात्रेण सम्पातवतावसिञ्चति॥२८॥ हरिणस्येति बन्धन-
पायनाचमनशङ्खवानज्वालेनावनक्षत्रेऽवसिञ्चति ॥२९॥
अमितमात्रायाः सकृद्गृहीतान्यवानावपति ॥३०॥ भक्तं
प्रयच्छति ॥३१॥ मुञ्चामि त्वेति ग्राम्ये पूतिशफरोभिरो-
दनम् ॥३२॥ अस्थ्ये तिलशणगोमयशान्ताज्वालेनाव-
नाम कहा—उत्तर में वह कहे "असौ" ( जो नाम हो ) । सूक्त के अन्त
में अन्य पुरुष बोले "ते हताः" ऐसा ॥२०॥२१॥२२॥ कुशों से बार २
इसी प्रकार करे । और मध्यान्ह काल में भी करे ॥ २३ ॥ २४ ॥ घाव
पर बाल, जटा ढाक देवे । और खलवादी और अलगण्डू को घी मिला-
कर "उद्यन्नादित्य०" सूक्त से आहुति देवे "अक्षीभ्यां त०" सूक्त से मार्जन
कर गाँठों को खोल देवे । अब सर्वव्याधि भैषज्य को कहते हैं ॥ आज्य
तंत्र करके रोगी को गाँठों में बान्ध कर "अक्षीभ्यां त०" सूक्त से जलपात्र
को धोकर पुनः सूक्त को जप करके रोगी को अवसेचन करे । आँख,
कान, नाक, जीभ, गर्दन, राजयक्ष्मादि रोगों का भैषज्य समाप्त हुआ
॥ २५ । २६ । २७ । २८ ॥ "हिरण्यस्य०" तक्मनाशन सूक्त से हरिण के
सींगमणि को बान्धे । उसी शृङ्ग में जल धर कर आचमन करे । उसी
से पान करे, और हरिण के लोममणि को शङ्खुधान को मिलाकर
जलावे और जल से उसे बुताकर उसी ठण्डे जल से उषः काल में क्षेत्रिय
रोगी को अवसिंचन करे ॥ २९ ॥ और अपरिमित परिमाण यव
राशि में से एकही बार हाथ से यव को पकड़ कर प्रत्येक ऋचा से
आहुति देवे ॥३०॥ रोगी को भात खाने को देवे ॥३१॥ "मुञ्चामि त्वा०"
तक्मनाशन सूक्त से ग्राम्य रोग ( मैथुन संयोग से हुए रोग ) में पूति-
गन्धा मछली को भात के साथ रोगी को खाने को देवे ॥ ३२ ॥ जंगली
तिल, जंगली गोबर, जंगली शण, ये शान्त ओषधियाँ हैं । इनको अभि-
मंत्रण करके इससे रोगी को अवसिंचन करे। यह यक्ष्मा रोग की दवा है।
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