कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
by महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह)
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Read in context७८ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
रुदकान्ते शान्ता अधिशिरोऽवसिञ्चति ॥२८॥ आव्रजितायै
पुरोडाशप्रमन्द्धालङ्कारान् सम्पातवतः प्रयच्छति ॥२९।८।३२॥
वषट् ते पूषन्निति चतुर उदपात्रे सम्पातानानीय
चतुरो मुञ्जान्मूर्ध्नि विबृहति प्राचः ॥१॥ प्रतीचीरिषीकाः
॥२॥ छिद्यमानासु संशयः ॥३॥ उष्णेनाप्लावयति दक्षि-
णात्केशस्तुकात् ॥४॥ शालान् ग्रन्थीन् विचृतति ॥५॥ उभ-
करे या अंहोलिङ्गगण द्वारा करे ॥ उन रोगों की परिगणना की जाती है
॥२७॥ अब तात्पर्य यह है कि जिन ओषधियों और वनस्पतियों का प्रति-
षेध वैद्यक शास्त्र में किया गया है—व्याधि निदान सम्बन्धि
भैषज्य के मंत्रों का उपदेश वैद्यक शास्त्रों में नहीं किया गया है
क्योंकि मंत्रों, तन्त्रों, यन्त्रों आदि द्वारा रोगों तथा रोगों के अदृष्ट वा
अप्रत्यक्ष कारण अदृष्ट शक्ति द्वारा ही जाना जाता है। अतएव अथर्ववेद
की शाखाओं तथा ब्राह्मण, गण, सूत्र आदि प्रोक्त विधि अनुसार यहां कहा
जाता है। जैसे स्त्री कर्मसंहिता का वर्णन किया जाता है—“य आशा-
नामाशापाला अग्नेर्मन्व०” ये सूक्त और “या ओषधयः सोमराज्ञीर्वैश्वा-
नरो न आगमच्छुम्भनी द्यावापृथिवी यदर्वाचीनमग्निं ब्रूमो वनस्पतीन्”
मुञ्चन्तु मा भवाशर्वौ यादेवीर्यन्मातली रथक्रीतम्”—इन चार को छोड़
कर अंहोलिङ्गगण है ॥३२॥ “अग्नेर्मन्व०” ये सात सूक्त हैं ॥ “पूर्वं
त्रिषप्रीयं०” पुत्र कामना मृतवत्सा के लिये। शान्ता ओषधियों से रोगी
के शिर पर अवसिंचन करे। प्रवास से घर पर वापस आने वाले के
लिये पुरोडाश, प्रमन्द, अलंकारों को सम्पातवन्त करके देवे ॥२७॥२८
॥२९॥८॥ यह बत्तीसवीं कण्डिका समाप्त हुई ॥३२॥
अब प्रसूति करण (प्रसव काल में सुख पूर्वक सन्तान पैदा हो) को
कहते हैं। “वषट् ते पूषन्०” इस सूक्त से चार जलपात्र में चार कुशों
को गर्भिणी के शिर पर पूर्वाग्र और पश्चिमाग्र कर उच्छ्रित करे ॥१॥२॥
शिर पर के डाले कुशों के टूट जाने पर गर्भस्थ बच्चे का मरण होने का
सन्देह होता है ॥३॥ गर्भिणी के शिरके दक्षिण केश-समुदाय को गर्म
जल से नहवावे ॥४॥ सूक्त पढ़ने के अन्त में सूतिका घर के बन्धनों
को काट डाले ॥५॥ और गाड़ी के जूये के दोनों कील को गर्भिणी के