इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा
स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)
संध्या समय
संध्या समय
कुर्वैलिन दन्तलोपधारिणं
बाहवशिणं निष्कुरभाषिणं च।
सूर्यादये चास्तिमिते शयान
विमुञ्चति श्रीयदि चक्रपाणिः॥
चाणक्य नीति १५/४
अर्थ- मलीन वस्त्र वाले को, दांतों के मल को दूर न करने वाले को, बहुत भोजन करने वाले को कटुभाषी को और सूर्य के उदय और अस्त के समय में सोने वाले को लक्ष्मी छोड़ देती है। चाहे वह विष्णु भी हों।
संध्या समय १. भोजन २. मैथुन ३. अध्ययन और ४. निद्रा यह चार कार्य मत करो, क्योंकि संध्या के भोजन से रोग मैथुन से भयंकर सन्तान होती है।
जब दिति स्त्री धर्म से शुद्ध हुई तब उसने संध्या समय भोग करने की इच्छा करके कश्यप जी अपने पति के पास जाकर कहा, कि इस समय मुझे कामदेव दुःख दे रहा है व मेरे सौत के बेटे राजसिंहासन का सुख भोगते हैं। यह दुःख मुझसे सहा नहीं जाता, सो मेरी चिन्ता दूर कीजिए। यह वचन सुनकर मरीचि के बेटा कश्यप मुनि बोले हे दिति! इस समय तेरे साथ भोग व विलास, जो बहुत बुरा काम है नहीं कर सकता, संध्या से चार घड़ी रात बीते तक व चार घड़ी रात रहे से प्रातः काल तक सवाय लेने नाम व करने ध्यान परमेश्वर के दूसरा काम न करना चाहिए। इसलिए तू चार घड़ी और धैर्य रख जिसमें परमेश्वर के भजन व स्मरण का समय बीत जावे। उस समय दिति कामदेव के मद में ऐसी मतवाली हो रही थी कि अपने पति के समझाने पर भी उसने सन्तोष नहीं करके लाज व शर्म को छोड़ दिया व
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वीरेन्द्र गुप्तः
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कश्यप जी के शरीर का कपड़ा पकड़ कर भोग करने के वास्ते हठ किया तब कश्यप जी ने हार मानकर उसके साथ भोग करके कहा- हे दिति! इस समय तुने जो यह अधर्म किया। इस पाप करने से तेरे दो पुत्र, ब्राह्मण व ऋषि आदि सब जीवों को दुःख देने वाले ऐसे बलवान् उत्पन्न होंगे कि कोई देवता या दैत्य या मनुष्य उनसे लड़ाई में सामना करने से जीत न सकेगा। दिति ने यह बात सुनते ही बहुत उदास होकर अपने पति से हाथ जोड़कर विनय की, महाराज मेरी इच्छा यह थी कि मेरे बेटे देवताओं को जीतकर अमरावती पुरी का राज्य करके सुख भोगें मुझको यह कामना नहीं थी कि मेरे बालक अधर्मी होकर ब्राह्मण आदि जीवों को दुःख देंगे, ऐसे पापी बेटे लेकर मैं क्या करूँगी। दिति का यह बचन सुनकर व उसे बहुत उदास देखकर कश्यप मुनि बोले, हे दिति! अब क्या किया जाय इस समय भोग करने का प्रभाव यही है इसी वास्ते में मना करता था परन्तु कुकर्म करने के पीछे शांच करता है। दिति के दोनों पुत्रों का नाम है- १. हिरण्याक्ष २. हिरण्यकशिपु। वास्तव में दोनों ही भयंकर सन्तानों के रूप थे।
सुखसागर तीसरा स्कन्ध,
१४ अध्याय
अध्यायन से आयु क्षय और निद्रा से दरिद्रता होती है किन्तु संध्या समय ईश्वराधना यह सर्वोत्तम कार्य सबको करना योग्य है।
नाशनीयात्संधिवेलायां न गच्छेन्नापिसिंविशैत्।
न चैव प्रलिखेदभूमिं नात्पनोपहरेत्स्वजम्॥
मनु ४/५
अर्थ- संध्याकाल में भोजन, शयन, यात्रा न करे और न भूमि पर लकीर खींचे और पहनी हुई माला को न निकाले।
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