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इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा

स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)

Devanagarihipublished250 पृष्ठ

शिक्षा

गन्धारों राजा धृतराष्ट्र की पत्नी बड़ी पतिव्रता थीं। इनके पति अन्धे थे, तो यह भी सारी आयु अपनी आँखों पर पड़ी बाँधे रहیں। वे महाभारत युद्ध समाप्त होने के पश्चात् एक दिन कुन्ती से जो युधिष्ठिर की माता थीं कहने लगीं कि मैं जैसी पतिव्रता हूँ वैसी तु नहीं पर मेरे सब पुत्र युद्ध में मारे गये और तेरे सब जीवित हैं इसका क्या कारण है? क्या परमात्मा के घर भी अन्धे हैं? उसने उत्तर दिया— कदापि नहीं। पतिव्रता होने का फल है कि उसका पति जीवित रहे, सो यह सीमायु तुरन्त प्राप्त है तेरा पति जीवित है, पर उसका यह फल तो नहीं कि उसके पुत्र भी जीवित रहें। इस कार्य को तुने नहीं किया मैंने किया। सो मेरे पुत्र जीवित हैं तेरे नहीं। 'जो औरों का अहित चाहता है उसका स्वयं अहित होता है।' यह बात सत्य और पुरातन है।

तुने मेरे पुत्रों को मारने के अर्थ लाक्षादि भवन बनवाया यह सोच कर कि उसमें आग लगा दी जायेगी तो सब मर जायेंगे, पर मारने वाले से जिलाने वाला बड़ा है। मुझे विदुर द्वारा पता लग गया, मैं अपने बच्चों को उसमें से निकाल ले गई। पीछे आग लगा दी गई और भीलनी पाँच पुत्रों सहित जलकर मर गयी। ऐसी दशा में तेरे पुत्र कैसे जीवित रहते।

'आज भी मूर्ख स्त्रियाँ चौराहों आदि में उतारे कराकर इस लिये रखती हैं कि उनको लौधकर औरों के बच्चे मर जायें और मेरे बच जायें। जिसका परिणाम बहुधा उल्टा ही होता है। कोई दुष्टा तो मेढ़े, बकरे, मुर्गे आदि यह समझ कर कटवाती हैं कि जीव के बदले जीव देने से मेरा बच्चा बच जायगा और एक हत्या का पाप सर पर रखती हैं। परमेश्वर को भोला बुद्ध अपना जैसा जानती हैं। ईश्वर के यहीं भी अन्धे समझ रखा है।'

पुत्रों को जीवित रखने का उपाय मैंने किया।

देख लो मेरा पति जीवित नहीं पर बच्चे जीवित हैं।

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वीरेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

मैंने लाक्षागृह से निकल कर एक चकरा नाम के एक नगर में पुत्रों सहित एक ब्राह्मणी के गृह पर निवास किया, उस ब्राह्मणी के एक पुत्र था। उस नगर में एक ब्रह्म नाम के राक्षस ने उपद्रव मचा रखा था। वह एक व्यक्ति को नगर से नित्य उठा ले जाता था और उसे खा जाता था। राजा ने तंग आकर अपनी प्रजा में से बारी नियत कर दी थी। जिसकी बारी होती वही अपने पुत्र को स्वयं एक स्थान पर पहुँचा देती थी।

एक दिन उस ब्राह्मणी के पुत्र की बारी आई। पुत्र की ममता का हाल आपको क्या बताऊँ पुत्रवती स्त्रियाँ ही जानती हैं। वह जल बिना मीन जैसे तड़पती थी। उसे व्याकुल देख मेरा भी हृदय कम्पित हो उठा, मैंने उससे कहा कि तू इतनी व्याकुल, विकल न हो मेरे साथ मेरे पाँच पुत्र हैं मैं उनमें से एक को आज तेरे पुत्र के बदले भेज दूँगी। उसने मेरी बात का विश्वास न करके अपने विद्यारानुकूल उत्तर दिया कि संसार में कहीं ऐसा हुआ है, मुझे जितनी एक की ममता है तुझे उतनी ही पाँच की होगी, हाथ की पाँच उंगलियों में से जिसे काटो उसी में दर्द होता है। क्या तुझे अपना कोई पुत्र भारू है वा कुथारा है मैंने कहा मेरे सब झींझों के तारे और प्राणों से प्यारे हैं, परन्तु सब शुभ कर्मों का निचोड़ (तत्व) परोपकार है।

आत्मार्थ जीवलोकेऽस्मिन्तनको न जीवति मानवः।

परपरोपकारार्थ योजीवति सजीवति॥

परोपकार शून्यस्य धिड् मनुष्यस्य जीवितम्।

धन्यास्ते पशवो येषां चर्मोप्युपकरिष्यति॥

अर्थ- अपने लिए तो सभी जीते हैं पर जीना उसका है जो दूसरों के लिए जीता है। जो उपकारी नहीं उससे तो पशु ही अच्छे हैं जो मरने पर भी चमड़े से उपकार करते हैं।

अन्त को मैंने भीम को उस दुष्ट राक्षस की भेंट के लिये भेजा। इसने जाकर प्रथम तो सब पकवानादि जो स्त्रियाँ लायी थीं

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योगेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

खा लिया और कहा जब वह मुझे खायेगा तो सब उसके पेट में पहुँच जायगा। फिर जब वह राक्षस आया और नित्य जैसा मीठा आदि और व्यक्ति नहीं देखा तो बड़े भयंकर शब्द से गंजा, तभी भीम ने भी उससे ऊँचे स्वर से उत्तर दिया कि सामान तो मैंने खा लिया है अब तू मुझे खा ले सब तेरे पेट में पहुँच जावेगा व्यर्थ क्यों चिल्लाता है। पर वह ज्यों ही इसकी ओर झपटा तभी भीम ने उसे पकड़ कर भूमि पर दे पटक और उसके दोनों पैर चीर कर फेंक दिये। उसके मरते ही वहाँ जय-जयकार की ध्वनि चहुँ ओर गुँज उठी। 'भीम ने केवल उस ब्राह्मणी का ही कष्ट दूर नहीं किया वरन् नगर के सभी बालकों को प्राण दान दिया। इसलिए मेरे बच्चे कैसे मरते।'

जो दूसरों की रक्षा करने के लिये अपने आपको और अपने बच्चों की आहुति देता है, उसे तथा उसके बच्चों की रक्षा ईश्वर करता है और चिरंजीवी होने का वरदान देता है।


शिक्षा

भारत में स्वतन्त्र होने से पूर्व राज्य कार्य, बोलचाल तथा शिक्षा आदि सभी कार्य उर्दू भाषा के माध्यम से होते थे। उसी समय में एक धनी पुरुष सेठ मोतीचन्द के एक इकलौता पुत्र था। उनके और कोई सन्तान न थी। देश में उर्दू का प्रचार होने के कारण सेठ मोतीचन्द ने एक मौलाना लड़के को पढ़ाने के लिए लगा लिया। वह मौलाना कई वर्ष तक लड़के को पढ़ाते रहे। अपने स्वभाव के अनुसार मौलाना साहब पौन घण्टा लड़के को उर्दू पढ़ाते और शेष पाव घण्टे में अपने मजहब की प्रशंसा करते। जिसका लड़के पर यह प्रभाव पड़ा कि उसने मुसलमान होना स्वीकार कर लिया और अपने माता-पिता से कह दिया कि मैं मुसलमान मजहब

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वीरेन्द्र गुप्तः

CC-0: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

को ग्रहण करैगा। पिता के अधिक समझाने पर उसने कहा- 'मेरे कुछ प्रश्न हैं उनका समाधान हो जाने पर मैं मुसलमान नहीं बर्नुंगा। पिता ने अनेक विद्वान पण्डितों को बुलाकर लड़के की शंकाओं का समाधान कराया, परन्तु वह सन्तुष्ट न हुआ। तब फिर लड़के ने पिता से कहा- 'मुझे स्वर्ग में जाना है, संसार में ऊँचा उठना है। यह सब मुसलमान बनने से ही हो सकेगा, हिन्दू रहने से नहीं।' पिता ने कहा- 'एक सप्ताह और छहरो।'

एक दिन सार्यकाल समय सेठ जी दुकान पर बैठे थे उस समय एक सन्यासी ने आकर सेठ जी से भोजन की पिशा माँगी। सेठ जी ने सन्यासी को घर ले जाकर भोजन तैयार कराया। सेवक भोजन लेकर आया और सन्यासी के सामने रखकर चला गया। इसी बीच में सन्यासी ने सेठ की मुद्रा देखी फिर सामने भोजन तैयार करते हुए सेठानों को तथा सेवक को भी, यही तक भवन की चाहर दीवारी को भी उदास, चिन्तित और खिन्न देख ऐसा अनुभव होता था कि भवन में चहुँ और दीवारों से औसू टपक रहे हों। यह दृश्य देखकर सन्यासी कम्पित हो उठा और मन ही मन कहने लगा- 'कि हम सन्यासियों का यह कर्तव्य नहीं कि भोजन माँगें और खाकर चले जायें। परन्तु हमारा यह भी कर्तव्य है कि हम गृहस्थियों के कष्ट को सुनें और उसे दूर करने का भरसक प्रयत्न करें।' यह सब विचार कर और अपने ऊपर इस कर्तव्य पालन का भार समझते हुए सन्यासी ने सेठ जी से इस अशान्त वातावरण का कारण जानना चाहा। सेठ जी ने उत्तर दिया- 'महाराज यह सब गृहस्थ के धन्धे हैं आप तो भोजन पाइये।' सन्यासी ने कहा- 'सेठ जी जब तक आप इसका कारण नहीं बतायेंगे मैं भोजन नहीं पाऊँगा।' लाचार हो सेठ जी ने पुत्र को मुसलमान होने की सारी व्यथा सुनाई। सुनकर सन्यासी ने कहा 'सेठ जी आप लड़के को बुलावायें और यह भोजन उठवा लीजिये। मैं अब भोजन तब पाऊँगा जब आपके पुत्र को पुनः

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वीरेन्द्र गुप्तः

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आपके चरणों में न ला दूँ। लड़के और सन्यासी की बातोंलाप हुई। सन्यासी ने अनेक युक्तियाँ देकर लड़के को समझाया, परन्तु वह कुछ न समझा। यह देखकर सन्यासी ने एक प्रश्न लड़के के सामने रखा 'देखो बच्चा एक नदी है उसके पार एक व्यक्ति खड़ा है और एक इस ओर खड़ा है दोनों में संकेतों से बातचीत हो रही है, और दोनों ही एक दूसरे की बात का अर्थ उल्टा लगा रहे हैं। तो यह बताओ दोनों में किस प्रकार बातचीत हो।' लड़के ने कहा, 'दोनों में से किसी को तैर कर एक ही किनारे पहुँचकर बातचीत करनी चाहिए।' सन्यासी ने कहा- 'बस मेरे और तुम्हारे बीच यही अन्तर है।' लड़के ने कहा- 'यह बात मेरी समझ में नहीं आई।' सन्यासी ने कहा- 'देखो बेटा! तुम तो कोरे अरबी, फारसी के विद्वान् हो और मैं संस्कृत का, अब तुम्हें बताओ हम दोनों एक दूसरे की बात को कैसे समझ सकते हैं जब तक दोनों एक भाषा को न जानते हों। देखो मैं तो वृद्ध हूँ इस कारण अरबी आदि पढ़ने में अधिक समय लगेगा, और तुम युवक हो, तुम्हारी पढ़ने में रुचि भी है इस कारण तुम पहले संस्कृत भाषा पढ़ो।'

सन्यासी ने लड़के को संस्कृत पढ़ाना प्रारम्भ कर दी। और अपने लिए अन्य स्थानों से भिक्षा लेकर उदर पूर्ति करने लगे। अपनी तीव्र बुद्धि की कुशलता के कारण लड़के ने कुछ ही समय में संस्कृत भाषा की योग्यता प्राप्त कर ली। सन्यासी ने जब यह देखा कि वह संस्कृत में भली प्रकार चलने लगा है, तो एक दिन उसके सामने संस्कृत का एक वाक्य 'आपः' रखा और कहा कि इसका अर्थ बताओ। लड़के ने शीघ्र ही उत्तर दिया 'आपः' का अर्थ जल होता है। सन्यासी ने कहा- 'क्या इसका और कोई अर्थ हो सकता है' लड़के ने कहा- 'स्वामी जी मेरी समझ में तो इसका अर्थ और कोई नजर नहीं आता।' सन्यासी ने कहा 'बेटा! इस आपः शब्द के अनेक अर्थ हैं, जैसे आपः का अर्थ है अक्षिति (जो कभी क्षीण न होता हो) यज्ञ, वीर्य, प्राण,

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वीरेन्द्र गुप्तः

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श्रद्धा, शान्ति, रस, सूर्य, चन्द्र, अग्नि, जल, वायु, विद्युत और यहाँ तक ही नहीं संस्कृत साहित्य में कहा है 'आपः सर्वे देवाः वसन्ति'। लड़का सुनता रहा और मन ही मन कहने लगा कितनी अपार विद्या है। सन्यासी ने फिर एक निम्नलिखित वेद मन्त्र रखा और कहा कि इसका अर्थ करो।

स पय्यंगाच्छृङ्गकमकायमव्रणमस्नाविर श्च शुद्धमपाविद्धम्।

कविर्मनीषि परिभूः स्वयम्भूयाथातथ्यतोऽथान्

व्यदधाच्छारवतीभ्यः समाभ्यः ॥

यजुर्वेद ४०/८

लड़के ने मन्त्र पढ़ा और उस पर विचार किया, कुछ समझ में न आया। तब लड़के ने कहा 'गुरु जी अब इस पर कल विचार होगा।' रात्रि को चारपाई पर पड़े-पड़े लड़का वेद मन्त्र के अर्थ पर विचार करने लगा। वह उसमें इतना तल्लीन हो गया कि उसे रात्रि के व्यतीत होने का अनुभव ही नहीं हुआ। चारपाई से उठा तो उसके चेहरे पर प्रसन्नता, आनन्दमयी विलक्षणता प्रतीत हो रही थी। उसके मुख को देखने से ऐसा आभास होता था कि मानो इसे कोई विलक्षण वस्तु प्राप्त हुई हो।

प्रातः कालिक नित्य कर्म से निवृत्त हो अत्यन्त हर्ष के साथ सन्यासी के सामने आकर नत मस्तक हो कहने लगा 'गुरुजी आज मेरी समस्त शंकाओं का समाधान हो गया, अब मुझे वह मजहब मिट्टी के ढेर के समान दीखता है। मैं अब कभी भी मुसलमान नहीं बर्नुंगा।'

गुरुजी मैंने अपने माता पिता को जो कष्ट दिया है वह अनजाने का था इसमें मेरा कोई दोष नहीं। क्योंकि! मुझे मेरा धर्म नहीं बताया गया था इस कारण मैं कुछ भी अपने धर्म से तुलना न कर सका। वह कहावत सत्य है 'एक ओर की बात गुड से भी अधिक मीठी होती है।' सो वही हुआ।

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वीरेन्द्र गुप्तः

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