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इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा

स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)

Devanagarihipublished250 पृष्ठ

प्राणायाम

से ही नित्य यज्ञ करने की प्रथा डाली थी और यज्ञ की हवि में चीनी, मीठा मिलाया ही जाता है।

न वै स्वयं तदशीयादितिथि यन्न भोजयेत्।

धन्य यशस्यमायुष्य स्वार्थं वाजितिथिपूजनम्॥

मनु ३/१०६

अर्थ- जो अतिथि को भेजनार्थ न दे उसमें से आप भोजन न करें, यह अतिथि पूजन धन्य है, धन हितार्थ, यश, आयु तथा स्वर्ग का देने वाला है।

अब आप समझ गये होंगे कि यह पीछों यज्ञ मनुष्य जीवन में कितने उपयोगी हैं। नित्य नियमित रूप से करने के लिए स्वामी दयानन्द सरस्वती जी की लिखित पंच महायज्ञ विधि में देखें।


प्राणायाम

मनुष्य शरीर में सबसे अधिक महत्व का अंग है तो वह फेफड़े हैं। फेफड़े हर समय श्वास की गति के साथ दृषित रक्त को लेकर उसे शुद्ध करके बाहर धमनियों में भेज देते हैं। जब मशीन से कार्य नहीं लिया जाता है तो उसे जंग लग जाती है। और अन्त में वह मशीन बेकार होकर समाप्त हो जाती है। यही स्थिति हमारे फेफड़ों की है। हम जो श्वास हर समय लेते हैं वह इतनी गति का नहीं होता कि वह फेफड़े के सबसे निचले भाग में वायु पहुँचा सके। सबसे निचले भाग में वायु पहुँचाने के लिए और उसे बेकार होने से बचाने के लिए पूर्वजों ने प्राणायाम को रखा है। फेफड़े के सबसे निचले भाग में जब वायु नहीं पहुँचेगी तो फेफड़े के उस भाग के छिद्रों में रक्त शुद्ध होने के लिए नहीं पहुँचेगा, और जब रक्त शुद्ध होने के लिए नहीं पहुँचेगा तो वह भाग कर्महीन होता हुआ उसी प्रकार बेकार हो जायेगा जिस प्रकार

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वीरेन्द्र गुप्तः

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प्रयोग में न आने वाली मशीन जंग लगकर बेकार हो जाती है। इसी प्रकार फेफड़े का निचला भाग बिगड़ने लगता है जिस कारण सबसे भयंकर रोग क्षय (टी॰बी॰) हो जाती है। फेफड़े के गल जाने को ही क्षय (टी॰बी॰) कहते हैं। दूसरे हमारी आयु श्वासों पर आधारित है। नित्य के कार्यों में जैसे भागना, अधिक परिश्रम का कार्य करना, सोना, मैथुन आदि में स्वभाविक श्वैसों की अपेक्षा अधिक श्वैसों का व्यय होता है। उसकी पूर्ति करने के लिए प्राणायाम करना आवश्यक है। प्राणायाम से तेज, बल, स्मृति भी प्राप्त होती है इसलिए प्रत्येक मनुष्य को नित्य कम से कम ३ प्राणायाम तो अवश्य ही करने चाहिए। यदि इससे अधिक करें तो और भी उत्तम है। नित्य प्राणायाम के अभ्यासी को फेफड़ों का कोई भी भयानक रोग नहीं लगता; प्राणायाम से क्षय (टी.बी.) श्वैस रोग, नजला जुकाम आदि अनेक रोग शरीर से दूर रहते हैं और शरीर पुष्ट रहता है।

प्रथम श्वैस को तीव्रगति से बाहर फेंकना और बाहर ही रोकना और पुनः गहरा श्वैस तीव्रगति से भीतर खींचकर रोकना। जब दम घुटने लगे तो धीरे-धीरे श्वैस को बाहर निकालना। यह एक प्राणायाम हुआ, श्वैस को बाहर निकालने को रेचक कहते हैं और श्वैस को बाहर ही रोकने को रेचक कुम्भक कहते हैं। श्वैस को अन्दर खींचने को पूरक कहते हैं और श्वैस को अन्दर ही रोकने को पूरक कुम्भक कहते हैं। श्वैस खींचने में जितना समय लगे उससे चौगुना रोकने में, और उससे दुगुना श्वैस को बाहर छोड़ने में लगाना चाहिए।

शरद ऋतु में भत्रिका प्राणायाम करने से ठण्ड का विकार नहीं होता और फेफड़े सुदृढ़ होते हैं। भत्रिका प्राणायाम श्वैस को तीव्रगति के साथ लेना और छोड़ना। जैसे बाजे की धौकनी निरन्तर बिना रुके चलती है उसी प्रकार श्वैस बिना रोके जल्दी जल्दी लम्बे खींचना और छोड़ना।

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प्राणायाम के अनेक भेद हैं जिन्हें समझने के लिए किसी योग्य शिक्षक की आवश्यकता है। परन्तु प्रत्येक व्यक्ति को योग्य शिक्षक मिल जाय, यह सम्भव नहीं। इसी कारण अधिकांश व्यक्ति प्राणायाम के लाभ से वंचित रह जाते हैं। शुद्ध खाद्य पदार्थों के अभाव में मानव की जठराग्नि दिन प्रतिदिन क्षीण होती जा रही है जिसके कारण से मानव में 'वात और कफ' सम्बन्धी रोग बढ़ते चले जा रहे हैं। शरीर में ऊष्मा कम होने पर ही शरीर शिथिल होने लगता है। शरीर की ऊष्मा को सही अनुपात में स्थित रखने के लिए हमारे योगियों ने 'भस्त्रिका' प्राणायाम करने की व्यवस्था दी है, जिसके द्वारा शरीर में ऊष्मा उचित मात्रा में उत्पन्न होकर जठराग्नि को बलिष्ठ बनाता है और जठराग्नि के बलिष्ठ होने से पाचन क्रिया सही होती है, पाचन क्रिया सही होने से भोजन का रस उत्तम बनता है और उत्तम रस से शरीर की सभी धातुएँ पुष्ट होकर शरीर निरोगी बनता है और 'वात-कफ' सम्बन्धी समस्त रोगों से मुक्ति पाता है। 'भस्त्रिका' प्राणायाम को प्रत्येक व्यक्ति बड़ी सुामता से घर बैठे कर सकता है, यह प्राणायाम कई प्रकार से होता है उसके कुछ प्रकार हम यहाँ प्रस्तुत करते हैं।

१- पद्यासन या सुखासन में बैठ कर अपने दाहिने हाथ का अंगूठा नासिका को दाहिनी ओर रखें और बाँच की दो अंगुलियाँ नासिका के बायीं ओर रखें पहले अंगुलियों से बायें नथने को दबा कर बन्द करें और दाहिने नथने से लम्बा श्वास खींच कर अंगूठे से दबा कर बन्द करें बायें नथने से अंगुलियाँ हटाकर श्वास को लम्बाई के साथ बाहर छोड़ें, जब पूरा श्वास बाहर निकल जाये तो उसी नथने से श्वास खींचें। इसी प्रकार जिस नथने से श्वास खींचा है उससे दूसरे नथने से श्वास छोड़ें और जिससे श्वास छोड़ी है उसी से श्वास खींच कर दूसरे नथने से छोड़ें। इसी प्रकार इस क्रिया को करते रहना चाहिए। अपनी सामर्थ्य के अनुसार क्रिया को तीव्र करते रहें और पहले २ मिनट से अध्यास

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करें और शनैः शनैः समय बढ़ाते जायें।

२- केवल एक नथने को बन्द करके दूसरे नथने से लम्बे-लम्बे श्वैस खींचना और छोड़ना, कुछ देर पश्चात् इसी क्रिया को दूसरे नथने से करना।

३- सीधे बैठ कर नासिका को बिना हाथ लगाये दोनों नथनों से एक साथ श्वैस खींचना और छोड़ना।

४- सीधे बैठ कर बाँयें हाथ को कमर के पीछे भूमि पर पंजा खोल कर रखें हाथ का अंगूठा नितम्ब के मध्य रीढ़ की हड्डी के पास लगा दो दाहिने हाथ के अंगूठे से नासिका के दायें नथने को बन्द करके और ठोड़ी को बायें कन्धे के पास तक घुमाकर बायें नथने से लम्बे लम्बे श्वैस खींचें और छोड़ें इसी प्रकार दायी हाथ कमर के पीछे रखकर हाथ का अंगूठा नितम्ब के मध्य रीढ़ की हड्डी के पास लगाकर बायें हाथ के अंगूठे से बायीं नथना बन्द करके और ठोड़ी को दायें कन्धे के पास घुमाकर दायें नथने से लम्बे लम्बे श्वैस खींचें और छोड़ें।

५- सीधे बैठ कर दोनों नथनों से एक साथ सीधा श्वैस न खींच कर उसे समान बराबर के छः टुकड़ों में खींचें और इसी अनुपात के तीन टुकड़ों के समय तक रोकने के पश्चात् उपरोक्त छः टुकड़ों के समान ही छः टुकड़ों में बाहर छोड़ें और उसी अनुपात के तीन टुकड़ों के समय तक बाहर ही रोकें यह एक प्राणायाम हुआ इसी प्रकार पांच प्राणायाम करें और सामर्थानुसार बढ़ाते जायें।

यह पांचों प्रकार के प्राणायाम भक्तिका प्राणायाम ही हैं, यह दोष रहित प्राणायाम हैं, इनके करते रहने में किसी भी प्रकार की हानि पहुँचने की सम्भावना नहीं है। हर प्रकार के प्राणायाम के समय कमर, रीढ़ की हड्डी सीधी रहनी चाहिये और मूलबन्ध बराबर लगा रहना चाहिए मूलबन्ध का अर्थ है गुदा और मूत्रेन्द्रिय को ऊपर खींचे रहना। प्रत्येक प्रणायाम को पहले हल्के-हल्के

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