इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा
स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)
प्रसव
मिनट में १२० सुनाई पड़े तो पुत्र है और केवल २० या २२ की ध्वनि सुनाई पड़े तो पुत्री जानो।
गर्भ स्थिति के २॥। मास हो जाने पर प्रातः काज निहार मुंह गर्भिणी को खाण्ड के एक बताशे में बद्ध की टहनी तोड़ कर दो बूँद दूध टपका कर ताजे जल से सेवन करा दें। यदि पच जाये तो पुत्र है। वमन हो जाय तो कन्या।
सन्तान का गौर वर्ण बनाना
इसके लिए १ माशा बंसलोचन, ५ नग बादाम की मींग छिलका उतारी हुई पीसकर बूरा मिलाकर सेवन करायें। दूध की खीर का भोजन नित्य करायें। गोला मिश्री का सेवन। टमाटर बीज रहित, अमरूद, अनार, सेब, सन्तरा आदि का अधिक प्रयोग करें। शुद्ध केशर पान में रखकर या दूध में डालकर पीना चाहिए। बंसलोचन ५ तोला बबूल की पत्ती २० तोला, कमल गट्टे की मींग २० तोला। कमल गट्टे की मींग की जीभ निकाल देनी चाहिए यह मींग के बीच में पीले रंग की होती है, इसमें विष का अंश होता है। तीनों को पीस कर २ माशा दूध के साथ सेवन करें। बंसलोचन १ तोला, सितोपलादि चूर्ण १ तोला, केशर १ माशा, तीनों को बारीक पीसकर रखलें इसमें से १ माशा नित्य दूध के साथ सेवन करें। पत्ते वाले शाकों का प्रयोग करने से सन्तान का वर्ण श्याम होता है। यह सब उपचार सन्तान का गौर वर्ण करने के लिए गर्भ के छठे मास से प्रारम्भ करके अन्त तक करना चाहिए।
नोट- टमाटर का बीज सावक होता है इससे गर्भ पात हो जाता है इसलिये टमाटर का बीज गर्भणी को नहीं देना चाहिए।
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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संस्कार
मानव को छोड़कर परमपिता परमात्मा ने सभी जीव जन्तुओं को उनकी प्रकृति के अनुसार जन्म से ही कुछ प्रकृतियों प्रदान की हैं। जिनमें कभी परिवर्तन नहीं होता। परन्तु उस जगत्तियन्तना ने मानव को कोई भी प्रकृति प्रदान नहीं की। मानव की प्रकृति जल रूप बनाई है। जिस प्रकार जल दूध के साथ मिलकर अपने रूप को त्याग कर दूध रूप हो जाता है। आप जल का जिस वस्तु के साथ संयोग कर देंगे, जल उसी वस्तु के अनुरूप हो जायगा और अपना अस्तित्व त्याग देगा। ठीक इसी प्रकार मानव की प्रकृति है।
एक बार मानव के बच्चे को भेड़िया उठाकर ले गया। वह मानव का बच्चा जंगल में भेड़ियों के साथ पलता रहा। वह भेड़ियों की-सी बोली बोलता, भेड़ियों का ही भोजन पाता, भेड़ियों की तरह उछल कूद करता और भेड़ियों की ही तरह नग्न रहता। किसी प्रकार वह मानव का बच्चा पकड़वा कर नगर में लाया गया। नगरवासियों ने उसे रोटी दी, वह उसे सँध कर फँक देता, पहनने के लिये वस्त्र दिये उसे भी फाड़कर फँक देता और अपनी मानवीय बोली न बोलकर भेड़ियों की ही बोली बोलता।
अब आप दूसरी ओर देखिये! इसी प्रकार एक सिंह का बच्चा भेड़ियों के झुण्ड में फँस कर उन्हीं के साथ चला गया, और भेड़ियों के साथ रहने लगा। उस सिंह के बच्चे में भी भेड़ियों जैसी उछल कूद कायरता आ गई। वह भी सिंह को देख कर भेड़ियों के साथ भयभीत होकर भाग जाता। परन्तु प्रकृति ने उसे जो अपनी बोली दी थी वह उसे न भूला और वह अपनी ही बोली बोलता। एक बार सिंह ने देखा कि हमारा एक बच्चा भेड़ियों के साथ रहकर भेड़ियों जैसा कायर हो गया है। सिंह भेड़ियों के झुण्ड पर झपटा और सिंह के बच्चे को पकड़ नदी के किनारे लाकर
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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