सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा

स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)

Devanagarihipublished250 पृष्ठ

नक्षत्र और ऋतु

सत्य है कि इसी गतिमानता से ही पुरुष की ऊर्जा, पौरुष अर्थात् सन्तानोत्पादकता की सामर्थ्य को आँका जाता है।

शुक्र में पूर्व वर्णित दोषों में से जो भी विकृति होगी, उसका प्रभाव शुक्र ऊर्जा पर अवश्य होगा। इसी कारण से उसमें अणु की गति, सामर्थ्य आदि न्यून होने से सक्रिय शुक्राणु कम दीखेंगे।

इस चर्चा से स्पष्ट सिद्ध हो जाता है कि वीर्य में उपस्थित ५-६ करोड़ शुक्राणुओं को जीव की संज्ञा नहीं दी जा सकती, सन्तानोत्पादक शुक्रकोट तो केवल १ अथवा २ ही उपस्थित होते हैं, जो गर्भधारण के समय ही गर्भ में प्रवेश कर जाता है।

परमात्मा की इस प्रकृति रूप सृष्टि में कोई भी वस्तु क्रिया, प्रक्रिया निरर्थक नहीं है, केवल हमारे समझाने का अन्तर हो सकता है। हम शुक्राणु और शुक्रकोट की चर्चा विस्तार से कर चुके हैं। ५-६ करोड़ शुक्राणुओं के निरर्थक नष्ट होने की शंका निराधार है।

सोऽयमायुर्वेदः शाश्वतो निर्दिश्यते

अनादित्वात्स्वभावसंसिद्ध लक्षणत्वाद्भा

स्वभावानित्य त्वाच्च ॥२४॥

यःक संहिता

आयुर्वेद शाश्वत है निरन्तर है इसका कभी क्षय नहीं होता। अनादि होने से और स्वभाव संसिद्ध लक्षण होने से और पदार्थों के नित्य स्वभाव होने से आयुर्वेद शाश्वत है। पांचों तत्व (आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी) और उनकी तन्मात्राएँ (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध) अनादि हैं, उसी में ही आयुर्वेद भी समाहित है।

वैज्ञानिक उपबिम्बियों में हर १०-१५ वर्ष के पश्चात् परिवर्तन होता रहता है परन्तु आयुर्वेद के प्रतिपादित सिद्धान्तों में कभी परिवर्तन नहीं होता।

इच्छाभाषा, संज्ञान, १९० Collection. Digitized by eGangotri

चन्द्रमा, वीर्य और तिथि

सोम नाम ओषधि राजा।

पञ्चदश पर्वास सोम

इव हीयते वर्धते च॥

अर्थ- चन्द्रमा समस्त वनस्पतियों का राजा है। जो १५ दिन तक घटता है और १५ दिन तक बढ़ता है। इसी प्रकार 'सोम' नाम वीर्य का है, और वीर्य शरीर का राजा है। शरीर में वीर्य भी चन्द्र की भाँति घटता और बढ़ता है।

जिस प्रकार आकाश में चन्द्रमा घटता और बढ़ता है, उसी प्रकार पृथ्वी पर समस्त जलाशयों में भी जल चन्द्रमा की कलाओं के साथ घटता और बढ़ता है। इसी प्रकार पुरुष शरीर में वीर्य भी घटता और बढ़ता है। अमावस्या को चन्द्रमा नहीं दीखता तो आप उस दिन देखेंगे समुद्र में तथा कुओं में जल कम होगा। प्रमाण के लिए आप अमावस्या के दिन कुँए में रस्सी डालकर नाप लें और समुद्र किनारे पर छड़ी गाड़ दें आपको स्वयं अनुभव हो जायगा और पुरुष के शरीर में वीर्य भी कम होगा। जिस प्रकार चन्द्रमा बढ़ता जाता है उसी प्रकार जलाशयों में जल और शरीरों में वीर्य बढ़ता जाता है। पूर्णमासी को आकाश में जब चन्द्रमा पूर्ण होता है तो उसी दिन समुद्र, कुओं आदि में पूर्ण जल बढ़ जाता है और समुद्र में तो जल अपनी सीमा के बाहर भी आ जाता है। अब आप पूर्णमासी के दिन उसी रस्सी को उसी कुँए में डालकर नापेंगे तो कुँए में आपको स्वयं अनुभव हो जायगा कि आज जल बढ़ा हुआ है इसी प्रकार समुद्र के किनारे पर गाड़ी हुई छड़ी से ज्ञात हो जायगा कि समुद्र भी पूर्णमासी के दिन अपनी सीमा के बाहर आ जाता है। इसी प्रकार वीर्य भी उस दिन वीर्य कोष से बाहर सारे शरीर में फैल जाता है अमावस्या को वीर्यहीन

इच्छानुसार सन्तान

१११

वीरेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

होने से और पूर्णमासी को वीर्य सारे शरीर में फैल जाने के कारण यदि वीर्य का क्षय अर्थात् स्त्री समागम करने से क्षय रोग (टीन्बी॰) हो जाती है क्योंकि अमावस्या को वीर्य न्यून होता है इसलिए उस दिन वीर्य क्षय होने से अवश्य ही शरीर में क्षीणता होगी और पूर्णमासी को वीर्य, वीर्य कोष से बाहर निकलकर सारे शरीर में फैल जाता है। इस कारण वीर्य अधिक पात होगा जिससे शरीर के सारे अंगों पर खिचाव पड़ेगा तो शरीर स्वयं क्षीणता को प्राप्त होगा। इसलिए गर्भाधान के लिए कृष्ण और शुक्ल दोनों पक्षों की पंचमी, षष्ठी, सप्तमी और नवमी यह तिथियाँ ही उत्तम हैं।


नक्षत्र और ऋतु

चन्द्रमा पृथ्वी को परिक्रमा करता हुआ जिस- जिस नक्षत्र के सामने आता है उस दिन वही नक्षत्र कहलाता है। गर्भाधान के लिए कुछ उपयुक्त नक्षत्रों की विवेचना करते हैं।

कृतिका नक्षत्र- नक्षत्र प्रायः अनेक तारों के समूह को कहते हैं। कोई नक्षत्र तो केवल एक तारा है, कोई दो तारों का समूह है, कोई तीन का और कोई चार तारों का समूह है। कृतिका नक्षत्र में सबसे अधिक तारों का समूह है। कृतिका नक्षत्र में गर्भाधान करने से बहुत से तारों के साथ सम्बन्ध हो जाता है और तारों का गर्भाधान पर विशेष प्रभाव पड़ता है। कृतिका नक्षत्र का अग्नि तारे के साथ रहना दो बातों को प्रगट करता है। एक तो यह कि दोनों का मिथुन भाव है और गर्भाधान भी मिथुन कृत्य है, दूसरे अग्नि तारे के साथ रहना अर्थात् अग्नि सम्बन्धी कृत्य करना और कराना। गर्भाधान का कृत्य तभी सार्थक होता है जब स्त्री पुरुष दोनों में कामाग्नि प्रज्वलित हो। इसलिए कृतिका नक्षत्र में गर्भाधान करना उचित है।

इच्छा-काम-संतोष Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

रोहिणी नक्षत्र- रोहिणी नक्षत्र में गर्भाधान करने से प्रजा की अधिक वृद्धि होती है। जिस प्रकार रोहिणी नक्षत्र में समस्त तारे एक समान ही तेज और रूप के हैं उसी प्रकार रोहिणी नक्षत्र में गर्भाधान की हुई सन्तान भी एक जैसे रंग रूप की होंगी।

मृगशीर्ष नक्षत्र- मृगशीर्ष नक्षत्र का दूसरा नाम प्रजापति भी है। प्रजापति प्रजा का पति होने से सब देवों (शक्तियों) में श्रेष्ठ है। सब देवों की श्री है। इसलिए मृगशीर्ष नक्षत्र में गर्भाधान करने से सन्तान भी मनुष्यों में प्रजापति के समान श्रीमान और श्रेष्ठ होती है।

पुनर्वसु नक्षत्र- पुनर्वसु नक्षत्र में पुनराधान करना श्रेष्ठ है। यदि गर्भस्थिति ठीक न हो तो पुनराधान पुनर्वसु नक्षत्र में करने से निश्चय ही गर्भ स्थित होता है। परन्तु स्त्री पुरुष में कोई रोगदि न हो।

फाल्गुनी नक्षत्र- फाल्गुनी नक्षत्र का दूसरा नाम अर्जुनी है और यह नाम गूढ है। फाल्गुनी अर्थात् फल का देने वाला नक्षत्र। फल देने की दृष्टि से फाल्गुनी नक्षत्र को इन्द्र नक्षत्र भी कहते हैं। यदि आप चाहते हैं कि मेरी सन्तान में अर्जन करने की क्षमता अधिक हो अर्थात् धन के संग्रह करने में पूर्ण समर्थ हो और सम्पत्ति का अर्जन करते हुए परम ऐश्वर्यशाली इन्द्र के समान हो तो फाल्गुनी नक्षत्र में गर्भाधान करें। फाल्गुनी नक्षत्र दो हैं। एक पूर्वाफाल्गुनी और दूसरा उत्तराफाल्गुनी। पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में गर्भाधान करने से सन्तान धनपति उन्नीतशील होती है और उत्तराफाल्गुनी में गर्भाधान करने से सन्तान उत्तरोत्तर उन्नीतशील होती है और उसके आगे उसकी सन्तान भी श्रेय और श्री को पाने वाली होती है।

हस्ता नक्षत्र- हस्त नक्षत्र का हाथ से विशेष सम्बन्ध है। हस्ता नक्षत्र में गर्भित बालक हाथ का उदार दानी, परोपकारी होता है। अर्थात् अपने द्वार से किसी को खाली नहीं जाने देता है। यदि आप उदार दानी, परोपकारी सन्तान चाहते हैं तो हस्त नक्षत्र में गर्भाधान करें।

इच्छानुसार सन्तान

११३

वीरेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

चित्रा नक्षत्र- चित्रा नक्षत्र का चित्त (हृदय) से विशेष सम्बन्ध है। चित्रा नक्षत्र में गर्भाधान की हुई सन्तान के अन्दर दूसरे को अपनी ओर आकर्षित कर लेने की विशेष शक्ति होती है। वह अपने शत्रुओं के हृदय सुगमता से जीत लेता है। दूसरे चित्रा नक्षत्र का बालक युद्ध में भी अपने शत्रुओं को परास्त कर विजयी होता है। यह नक्षत्र क्षत्रियों और सैनिकों को गर्भाधान करने के लिए अति उत्तम है। चित्रा नक्षत्र का बड़ा महत्व है। वह अपने शत्रुओं को रौंदता हुआ विजय को प्राप्त करता चला जाता है। सचमुच जो क्षत्रिय विद्वान् चित्रा नक्षत्र में गर्भाधान करता है उसकी सन्तान शत्रुओं पर विजय ही प्राप्त करती चली जाती है।

नक्षत्रों का सूर्य से घनिष्ठ सम्बन्ध है। गर्भाधान के लिए जो नक्षत्र चुना हो यदि उस नक्षत्र से युक्त सूर्य भी हो तो नक्षत्र की विशेषता कई गुना अधिक हो जाती है।

जिस प्रकार मास के दो पक्ष होते हैं, जिसमें से एक पक्ष में चन्द्र की कला का क्षय होता है और दूसरे पक्ष में चन्द्र की कला में वृद्धि होती है। इसी प्रकार वर्ष के भी दो पक्ष हैं। एक पक्ष में सूर्य की कला क्रमशः क्षय होती है और दूसरे पक्ष में वृद्धि। इसके एक पक्ष को उत्तरायण कहते हैं जिसमें सूर्य कला में वृद्धि होती है और दूसरे पक्ष को दक्षिणायन कहते हैं जिसमें सूर्य की कला का क्षय होता है। जिस प्रकार चन्द्र की कला का वीर्य पर प्रभाव पड़ता है उसी प्रकार सूर्य का भी प्रभाव पड़ता है। यह तो सत्य ही है कि चन्द्र में जो प्रकाश है वह सूर्य का है। चन्द्र के जिस भाग पर सूर्य की किरणें पड़ती हैं उसी भाग में प्रकाश उत्पन्न हो जाता है और वह किरणें जिस प्रकार बढ़ती जाती हैं, उसी प्रकार चन्द्र में प्रकाश बढ़ता जाता है। इससे स्पष्ट है कि चन्द्र में कलाओं का संचार सूर्य के ही प्रकाश से होता है।

जिस दक्षिणायन पक्ष में सूर्य की कलाओं का क्षय होता है तो वह क्षीणता चन्द्र में भी हो जाती है और वही क्षीणता वीर्य

इच्छानुसार सन्तान

१२४

वीरेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri