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इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा

स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)

Devanagarihipublished250 पृष्ठ

जन्म समय

उसे जल में अपनी और उसकी छाया से छाया मिलाकर दिखाया और समझाया। बेटा यह भेड़िये तो हमारा भोजन हैं और तु इनके साथ खेलता है। वही सिंह का बच्चा जो कुछ समय पूर्व भेड़ियों के साथ खेलता था वह अब उसे अपना भोजन समझने लगा।

देखिये! एक सिंह का बच्चा जो संगत से कुछ बदल गया था पुनः अपनी प्रकृति के अनुरूप बन गया। परन्तु भेड़ियों के बीच मानव का पला हुआ बच्चा अपना भोजन, बोली रहन सहन और प्रकृति आदि सभी कुछ छोड़ बैठा। वह अनेक प्रयत्न करने पर भी नहीं सुधर पाता।

इसी कारण मानव के निर्माण में हमारे महर्षियों ने संस्कारों की रचना की। मानव के बच्चे का स्वयं कोई स्वभाव नहीं होता, उसे संस्कारों द्वारा जैसा आप बनायेंगे वैसा ही बनकर तैयार होगा।

हम पीछे लिख आये हैं कि संस्कारों से ही उत्तम सन्तान होती है। गर्भाधान के पश्चात् पुंसवन संस्कार हो तत्पश्चात् सीमन्तोन्त्यन संस्कार होना चाहिए। यह संस्कार किस प्रकार किये जायें इसको लिखने की यहीं आवश्यकता नहीं क्योंकि महर्षि दयानन्द सरस्वती की लिखित संस्कार विधि में मनुष्यों के १६ संस्कार लिखे हैं उसी में से विधि देखकर करें।

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प्रसव

समय जानना-समय रहते प्रसव की उचित व्यवस्था करने के लिए ये आवश्यक है कि प्रसव का सम्भावित समय ज्ञात हो। यह समय गर्भ स्थिति से ठीक ९ मास १० दिन पश्चात् होता है। यदि गर्भ में विकार है तो इससे पूर्व तथा पश्चात् भी प्रसव हो सकता है। गर्भ में जब भ्रूण सर्व प्रथम हिलता है, तो उसके ४ मास २० दिन के पश्चात् प्रसव (बालक का जन्म) होता है। अन्तिम मासिक धर्म होने की तिथि से आगे सात दिन जोड़ने के

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CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

उपरान्त पीछे की ओर तीन मास गिनने से प्रसव का सम्भावित समय ज्ञात हो जाता है।

प्रसव स्थान- प्रसव काल से पूर्व ही यह निश्चय कर लेना चाहिए कि प्रसव कहाँ हो। चिकित्सालय अथवा प्रसूतिका गृह में प्रसव होना माँ और बच्चे दोनों के लिए ही हितकर है।

१- यह नहीं कहा जा सकता कि प्रसव काल में कब और कौसी आकस्मिक अवस्थायें उत्पन्न हो जायें। चिकित्सालय में ऐसी आकस्मिक अवस्थाओं की तत्काल उचित चिकित्सा हो सकती है।

२- कोई भी घर अथवा अन्य स्थान इतना स्वच्छ नहीं रहता जितना चिकित्सालय या प्रसूति का गृह आदि विशेष रूप से बनाये जाते हैं।

३- चिकित्सालय में माँ और बच्चे को हर प्रकार का आवश्यक परामर्श हर समय मिल सकता है।

४- चिकित्सालय में माँ को लगभग २ सप्ताह का पूर्ण विश्राम मिल जाता है। जो इस अवस्था में अधिक आवश्यक है।

प्रसव आरम्भ होने के लक्षण- प्रारम्भ में योनि से रक्त मिश्रित स्त्राव होता है इसके साथ साथ गर्भाशय का आर्कूचन प्रारम्भ होता है। जिसके कारण पेट में एक विशेष प्रकार की एंठन और दबाव का अनुभव होता है। जो कि पेट से चलकर रानों तक अनुभव होता है। यह एंठन पीठ से भी प्रारम्भ हो सकती है और जब पीठ से पेट की ओर, और पेट से नीचे रानों की ओर आती है। प्रारम्भ में यह एंठन बहुत अधिक नहीं होती और अधिक समय पूर्व होती है। धीरे-धीरे इसकी गति बढ़ती जाती है और यह तीव्र दर्द में परिणित होने लगती है, साथ ही बीच के अन्तर का समय भी कम होता जाता है। बस यही प्रसव का निकटतम समय है। ऐसे समय में बिलम्ब नहीं करना चाहिए, अपने जहाँ का निश्चय कर रखा हो प्रसव के लिए तत्काल ले जाना चाहिए। ***

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जन्म समय

प्रसव के पश्चात् स्त्री को निम्नलिखित योग दस बारह दिन तक देने से शरीर की समस्त व्याधियों से छुटकारा मिल जाता है।

पीपल छोटी १॥ तोला गाय के कच्चे दूध में भिगो दें इस दूध को दूसरे दिन बदल देना चाहिए इसी प्रकार १० दिन तक पीपलें दूध में भीगी रहें। १० दिन पश्चात् जल से धोकर मोटे कपड़े से भली प्रकार मसल कर पीपलों के दाने निकाल लें। इसके अभाव में ६४ प्रहरी पीपल के चूर्ण का प्रयोग कर सकते हैं।

उपरोक्त पीपल के दाने ६ माशा, स्वर्ण भस्म ३ रत्ती, रजत भस्म ६ रत्ती, इन तीनों वस्तुओं को खरल में डालकर घोटें जब बारीक होकर एक हो जायें तो इसकी २-२ रत्ती की मात्रा से पुड़ियाँ बनालें प्रसव के पश्चात् शरद् ऋतु में प्रातः सायं और ग्रीष्म ऋतु में केवल प्रातःकाल मधु में मिलाकर सेवन करायें।

बालक को स्वच्छ कर उष्ण जल से स्नान कराकर पिता अपनी गोद में लेकर बालक की जीभ पर घृत और मधु मिलाकर सोने की शलाका से (३%) अक्षर लिखें और दहिने कान में (वेदोसीति) तेरा गुप्त नाम वेद है ऐसा कहें। इस जातकर्म (जन्म समय) के संस्कार का विवरण संस्कार विधि में देखें और वैसा ही करें।

प्रसूतिका को प्रथम दिन आवश्यकता पड़ने पर केवल साँठ ३ माशा, अजवायन १॥ माशा, देसी पान १ नग, २॥ सेर जल में डाल कर दो उबाल का देना चाहिए और निरन्तर १० दिन पर्यन्त यही जल पीने को देना चाहिए ठंडा या गर्म ऋतु अनुसार तथा इच्छा पर निर्भर है।

इसके पश्चात् दो उबाल का सादा जल १५ दिन तक दें, फिर सादा जल में लोहे की किसी वस्तु को जिस पर जंग आदि न लगी हो लेकर १० बार अग्नि में तपाकर जल में बुझायें

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