इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा
स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)
गर्भाधान
चांदहवीं रात्रि में उत्तम गुणवाला विद्या युक्त बालक।
पन्द्रहवीं रात्रि की कन्या राजपत्नी, सौभाग्यवती।
सोलहवीं रात्रि का पुत्र सम्पूर्ण विद्याओं और गुणों से युक्त राज्य करने हारा होता है।
मासिक धर्म से लेकर १६ रात्रि तक स्त्री का रजः दिन प्रतिदिन शुद्ध होता जाता है। रजः जितना शुद्ध होता है उतनी ही सन्तान उत्तम होती है।
देश की उन्नति चाहने वाले, दुराचार, भ्रष्टाचार, व्यभिचार और वर्णसंकर सन्तान न चाहने वाले पुरुषों यह सारे दोष तभी दूर हो सकते हैं। जब गर्भाधान के समय ४, ७, ११ और १३ रात्रियों को छोड़कर ५, ६, ८, ९, १०, १२, १४, १५ और १६ रात्रियों में ही गर्भाधान करें। फिर आप देखोगे कि २० वर्ष में जब ऐसा सन्तति प्रौढ़ होकर आगे बढ़ेगी तो वह सारे देश को ही नहीं संसार को पलट देगी। तब आप अनुभव करेंगे कि कलियुग में सत्युग जैसी सुख और शांति। परन्तु यह तभी सम्भव हो सकेगा जब आप इसे क्रियात्मक रूप दें।
श्री रामचन्द्र जी १२ कला के अवतार कहे जाते हैं और साथ में पुरुषोत्तम भी। श्री कृष्ण जी पूर्ण १६ कला के अवतार कहे जाते हैं। वह कलायें क्या हैं? क्या अब १२, १६ कला के पुरुष नहीं हो सकते? यह कलायें पुरुष को कैसे मिल सकती हैं, वह तो भगवान थे, हमारे बच्चे या हम वैसे कैसे बन सकते हैं?
एक बार महात्मा गांधी ने कहा था। हे मेरे भक्तों मेरी इच्छा है कि तुम मुझे भगवान मत बना देना। देखो आर्यों ने जिस प्रकार स्वामी दयानन्द को रखा है। तुम भी मुझे उसी प्रकार रखना।
कोन ऐसा व्यक्ति है जो पुरुष से भगवान की पदवी न चाहता हो। परन्तु महात्मा गांधी, राष्ट्रपिता, शान्ति के देवता ज्ञान के भण्डारी यह नहीं चाहते थे कि मुझे पुरुष की अपेक्षा भगवान की पदवी मिले। क्यों? वह ज्ञानी महात्मा गांधी पुरुषों की प्रवृत्ति इच्छानुसार सन्तान
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को जानते थे। उन्होंने जिसे भगवान मान लिया। बस वहीं उसे तथा उसके गुणों को ताला लगा दिया। जिस प्रकार हम यह कभी नहीं विचार सकते कि हमारे पुत्र भी १२, १६ कला के राम और कृष्ण हो सकते हैं। उसी प्रकार महात्मा गांधी को भी भगवान बनाने पर यह नहीं विचार कर सकते कि महात्मा गांधी जैसे और भी महान पुरुष हो सकते हैं। महात्मा गांधी चाहते थे, कि उन जैसे अनेक महान पुरुष भारत में जन्म लें।
प्रिय पाठको! यह कलायें आप अपने बच्चों में ला सकते हैं, इन कलाओं का बच्चों को प्रदान करना आपके हाथों में है। आप जिस कला के बच्चे चाहें बना सकते हैं, चौथी रात्रि से १६ रात्रि तक जो गर्भाधान का समय है यही चौथी कला से १६ कला तक का विज्ञान है। आप जिस रात्रि में गर्भाधान करेंगे उतनी ही कलायें बच्चे में आ जायेंगी। यदि आप चाहते हैं कि हमारा बच्चा १६ कला का पूर्ण और श्रीकृष्ण जैसा हो तो आप १६वीं रात्रि में ही गर्भाधान करें, तो आप निश्चय ही १६ कला का पुत्र प्राप्त करेंगे।
वसुदेव देवकी इस कला के विज्ञान को भली प्रकार जानते थे। जब कंस की कारागार में पड़े-पड़े अत्यन्त दुःखी हो गए और उनके कई बालकों को पंचतत्त्व में कंस ने लय कर दिए थे। तब उनके मन में कंस से प्रतिशोध लेने की ज्वाला अधिक तीव्रता से धधक उठी। तभी उन्होंने १६वीं रात्रि को समागम द्वारा श्री कृष्ण को जन्म दिया, जिसने अत्याचारी कंस को सदैव के लिए सुख की नींद सुला दिया।
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गर्भाधान
ऋतु समय से १६ दिन तक गर्भाशय का मुख खुला रहता है और उसी समय में गर्भधारण करने की शक्ति उत्पन्न रहती है। इसके पश्चात् गर्भाशय का मुख बन्द हो जाता है जिसके पश्चात् गर्भधारण नहीं हो सकता।
स्थान- कमरा एकांत हो, सुन्दर चित्रों से या जिस विचार का पुत्र या पुत्री के लिए गर्भाधान करना हो, उसी प्रकार के चित्रों से सुसज्जित हो, साफ- सुथरा और सुगन्धित हो, सेज मुलायम गद्देदार हो, कमरे में हल्का प्रकाश हो।
समय- एक प्रहर रात्रि बीते समय से एक प्रहर रात्रि रहे समय तक, अर्थात् रात्रि को १० से १२, १ बजे तक का समय गर्भाधान के लिए उपयुक्त और उत्तम है।
आसन- स्त्री को चारपाई पर सीधे ही लेटकर टांगे घुटने के स्थान से मोड़ कर सीने के पास लगाना चाहिए और पैरों की एड़ियाँ नितम्ब से लगी रहें। इस प्रकार वीर्य ग्रहण करना चाहिए और अपनी कमर के नीचे तकिया भी लगा लेना चाहिये। किसी भी करवट, बैठकर या स्त्री पुरुष के ऊपर लेट कर वीर्य ग्रहण करेगी तो बालक कुछड़ा अंग बिहंग होगा। रजः और वीर्य के पात होते समय स्त्री ऊपर को संकोचन द्वारा वीर्य को खींचे और उस समय स्त्री पुरुष दोनों के मुख के सामने मुख, नासिका के सामने नासिका, नेत्रों के सामने नेत्र, हृदय के साने हृदय, नाभि के सामने नाभि अर्थात् दोनों शरीरों के अंग आम्ने-सामने हों ताकि वीर्य गर्भाशय में सुमन्ता से सीधा ही प्रविष्ट हो जावे। जब दोनों के शरीर तथा भीतरी नाड़ी की चेष्टा शिथिल हो जावे तब दोनों पृथक-पृथक हो जावें। अर्थात् वीर्य स्वलन के कुछ देर पश्चात् पृथक होवें। यदि वीर्य गर्भाशय में प्रविष्ट होते समय जिरह से टेढ़ा इच्छानुसार सन्तान
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आदि हो जायगा वही अंग बच्चे का विकृत हो जायगा। पुरुष का समागम के पश्चात् लघुशक्ति (मूत्र त्याग) के लिए अवश्य जाना चाहिए और इन्द्र की त्वचा को भी सीधा कर लें।
भोजन-जिस विचार की तथा जितनी विद्वान सन्तान को जन्म देना हो, उसी प्रकार का भोजन पूर्व लिखे अनुसार १॥ मास तक स्त्री पुरुष दोनों ब्रह्मचर्य के साथ सेवन करें। भोजन पाने के कम से कम २ घण्टे पश्चात् समागम करना चाहिए। रति के पश्चात् शतावर ६ माशा, छुहारा २ नग, १॥ पाव दूध १॥ पाव जल इन वस्तुओं को मिलाकर पकायें जब दूध मात्र रह जाये तो उसको ठण्डा करके समागम से पूर्व तैयार करके रख लें और रति से निवृत्त होकर इस दूध का पान करें या मिष्ठान खायें या २॥ तोला बहिया गुड़ भी खा सकते हैं। ऐसा करने से समागम से जा शक्ति क्षय होती है वह पुनः वापिस आ जाती है और कुछ न खाने से आँतों में रूक्षता आ जाती है जिस कारण पेट में विवन्ध हो जाता है।
भावना- समागम के समय स्त्री और पुरुष के जैसे भाव होते हैं, वही भाव सन्तान में अवश्य ही आ जाते हैं। देखा गया है कि माता-पिता तो धर्मात्मा हैं परन्तु उनका लड़का चोर डाकू। ऐसा क्यों? समागम समय में किसी डाकू की घटना याद आ गई और उसे सुनाना आरम्भ कर दिया। इसमें स्त्री के विचारों की अधिक प्रधानता है। इसलिये समागम समय निर्भयता, धार्मिक चित्र, योद्धाओं का ध्यान, शांति, प्रसन्नता, सात्विक विचार होते हैं तो सन्तान उत्तम, विद्वान, निर्भय, बलवान और धर्मात्मा होंगे। इसके विपरीत भावों से दुष्ट, दुराचारी, कुरूप, दरिद्री, पापी और हीन सन्तान होंगे।
एतत्कामफलं लोके यद्व्यापक चिन्तना।
अन्य चित्त कृते कामं शववौरिक संगमः॥
शृंगार शतक २९
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