इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा
स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)
आहार
करना चाहिए, कुछ दिनों के अभ्यास के पश्चात् गति और मात्रा को अपनी शक्ति और सामर्थ्यानुसार बढ़ाते रहना चाहिए। प्राणायाम का समय प्रातः काल का उचित है। यह अपने गृह पर एकाग्रता और स्वच्छ कमरे में बैठ कर करना चाहिए, ग्रीष्म ऋतु में द्वार खिड़की आदि को खोल देना चाहिए और शरद ऋतु में बन्द कर सकते हैं। प्राणायाम के अभ्यासी को घी और दूध की मात्रा बढ़ा देनी चाहिए।
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आहार
भोजन हर प्राणी को जीवित रहने के लिए अत्यन्त आवश्यक है। भोजन से शरीर में रस, रक्त, मांस, मेष, अस्थि मज्जा और वीर्य पदार्थ बनकर मन, वाणी और तेज को प्राप्त होते हैं। भोजन से बल पुरुषार्थ और बुद्धि भी बनती है। जिस प्रकार का और जिस भावना के वातावरण के साथ मनुष्य भोजन करेगा। उसका मन, भावना और बुद्धि वैसी ही बन जायेगी। यदि भोजन करते समय मन को अन्दर काम भाव आये और आपने काम भावनाओं से युक्त चित्रों से सुसज्जित कमरे में बैठ कर भोजन किया है, तो आपकी काम भावना भोजन के पश्चात् पहले की अपेक्षा चौगुनी हो जायेगी। उसी प्रकार बुद्धि की तीव्रता, बल और तेज की प्राप्ति के लिए, जैसी आपकी इच्छा हो, वैसी ही भावना और वैसे ही चित्रों से सुसज्जित कमरे में बैठकर भोजन करें। आपको जैसा अपना मन, बुद्धि आदि बनानी हो, भोजन से और भोजन समय की भावनाओं से वैसा ही मन बन जाता है। भोजन समय की भावनाओं द्वारा मनुष्य अपने मन, बुद्धि को जिधर ले जाना चाहे ले जा सकते हैं।
अनमशितं त्रेधा विधीयते तस्य वः छान्दोग्य
स्यविस्तो धातुस्तत् पुरीष भवति, यो उपनिषद्
मध्यम स्तन्मा थं सं योऽणिष्ठस्तन्मनः॥ ६/५/१
इच्छानुसार सन्तान ५७ वीरेन्द्र गुप्ताः
CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
अर्थ- जब 'अन्न' खाना खाया जाता है, तो वह तीन प्रकार का बन जाता है उसका सबसे स्थूल भाग मल बन जाता है, जो मध्यम भाग है वह मांस और जो सबसे सूक्ष्म भाग है वह मन बन जाता है।
आपः पीता स्नेधा विधीयन्ते
तासां यः स्थविष्ठो धातु स्तन्मूर्त्रं भवति
यो मध्यम • स्तल्लोहितं
योऽणिष्ठः स प्राणः॥
छान्दोग्य ३- ६/५/२
अर्थ- जब जल पिया जाता है, तो वह तीन प्रकार का बन जाता है, उसका जो सबसे स्थूल भाग है वह मूर्त्र बन जाता है, जो मध्यम भाग है वह रुधिर और सबसे सूक्ष्म भाग है वह प्राण बन जाता है।
तेजोऽशितं त्रेधा विधीयते तस्य यः
स्थविष्ठो धातु स्तदस्थि भवति, यी
मध्यमः समज्जा योऽणिष्ठः सा वाक्॥
छान्दोग्य ३- ६/५/३
अर्थ- जब तेज (अर्थात् जो तेल घी आदि में है वा जो अन्न में मिला हो) खाया जाता है, तो वह तीन प्रकार का बन जाता है, जो स्थूल भाग है वह हृद्धी बन जाता है, जो मध्यम भाग है वह मज्जा और सबसे सूक्ष्म भाग है वह वाणी बन जाता है।
प्रत्येक वस्तु अन्न जल और तेज, तीनों की बनी हुई है, इस लिए जो कोई वस्तु खाता है, उसमें इन तीनों का भाग पाया जाता है, चाहे उनका न्यूनाधिक भाग कुछ ही हो।
उपरोक्त प्रणाली से आप अनुमान लगालें कि अन्न, जल और घी आदि भोजन से क्या-क्या बनता है। इसलिए संस्कारित शुद्ध और ताजा भोजन खाना चाहिए, बासी भोजन आलस्य उत्पन्न और बुद्धि को मन्द कर देता है।
इच्छासम्पन्न संततः तीर्थेन्द्र गुप्तः
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पुजितं हृशन नित्यं बलमूर्ज च यच्छति।
अपुजितं तु तद भुक्तमुभयं नाशयेदितम्।।
मनु २/५५
अर्थ- संस्कृत अन्न वीर्य को देता है और असंस्कृत अन्न बल, सामर्थ्य इन दोनों का नाश करता है। (इसलिए शुद्ध पवित्र भोजन बलिवैश्य यज्ञ करके खाना चाहिए)
भोजन का स्थान एकात्म, स्वच्छ, पवित्र और सुन्दर होना चाहिए। क्रोध तथा शोक के समय में खाया हुआ भोजन शरीर में रस के स्थान पर विष बनाता है। इसलिये क्रोध और शोक के समय भोजन न करना चाहिए। भोजन के पात्र सुन्दर, आकर्षक और स्वच्छ हों।
भोजन के समय माता, पिता, वैद्य, मित्र, परिवार जन और पाककर्ता के अतिरिक्त अन्य किसी को समीप न रहने दो तथा मोर, चकोर, वानर, मुर्गा की दृष्टि के अतिरिक्त अन्य का दृष्टिपात योग्य नहीं।
भोजन करने के प्रथम अदरक और लवण की बनी चटनी खा लेनी चाहिए, इससे रुचि बढ़ती है और ग्रन्थियां खूब रस देने लगती हैं। यह रस पाचन में विशेष स्थान रखता है। तत्पश्चात् मधुर चिकना हलन्गरी घी, चावल, मीठा, फल, दही, रोटी उत्तम शाक के साथ धीरे-धीरे खाना चाहिए और अन्त में रुचिपूर्वक मिश्री युक्त दूध पियें। भोजन के आदि में जल पीने से मन्दाग्नि तथा भोजन के अन्त में जल पीने से विष सद्गुण और कफ को बढ़ाने वाला होता है। इसलिए भोजन के मध्य में थोड़ा सा जल धीरे-धीरे पीना चाहिए। जो अमृत के तुल्य है। भोजन के उपरान्त एक घण्टे के पश्चात् जल पीने से बल बढ़ता है।
अजीर्णं भैषजं वारि जीर्णं वारि बलप्रदम्।
भोजने चामृत वारि भोजनान्ते विषप्रदम्।।
चाणक्य नीति ८/७
इच्छानुसार सन्तान
५९
वीरेन्द्र गुप्तः
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अर्थ- जल अजीर्ण (कब्जा) में औषधि है, पच जाने पर बल देने वाला है भोजन के मध्य में जल अमृत के समान है, और वही भोजन के अन्त में विष का फल देता है।
भोजन करते समय इस बात का ध्यान रखना उचित है कि आधा पेट भोजन से भर लें और चतुर्थ भाग जल से तथा शेष चतुर्थ भाग वायु के लिए रिक्त रहने दें। इस प्रकार की मात्रा से भोजन कभी अजीर्ण नहीं करता और सदैव सुख देता है। अधिक प्यास लगी होने पर भोजन नहीं करना चाहिए। भोजन करने से गुल्म रोग हो जाता है, इसलिए जल पीकर एक घण्टे पश्चात् भोजन करें। भूख लगने पर जल नहीं पीना चाहिए। जल पी लेने से जलोदर हो जाता है। भोजन सदैव सादा हल्का शीघ्र ही पच जाने वाला खाना चाहिए। अधिक मसालेदार भोजन से हानि होती है। भोजन को भली प्रकार चबा-चबाकर खाना चाहिए। एक-एक ग्राम को ३२ बार चबाना चाहिए जिससे उसमें लार गिल्हियों का रस पूरी मात्रा में मिलकर पाचन क्रिया को ठीक रखे। प्रभु ने दंत भोजन पीसने को दिये हैं और आँतें पचाने के लिए। जो मनुष्य दंतों का काम आँतों से लेते हैं वह सदैव रोगी रहते हैं। उनकी आँतें शक्ति हीन होकर अपना भी कार्य करने में असमर्थ हो जाती हैं। भोजन सदैव निश्चित समय पर ही करना उचित है। कहावत है कि हजार काम छोड़ कर नहाना और सौ काम छोड़कर खाना। भोजन हाथ पैर और मुख थोकर करना चाहिए इससे आयु और बल बढ़ता है।
शतं विहाय भोकव्यं, सहस्रं स्नान माचरेत्।
लक्षं विहाय दातव्यं, कोटिं त्यक्त्वा हरि भजेत्॥
महाभारत
अर्थ- सौ काम छोड़कर भोजन करना, हजार काम छोड़कर स्नान करना चाहिये, लाख काम छोड़कर दान और करोड़ों कामों को त्यागकर प्रभु चिन्तन अर्थात् सन्ध्यापासनादि करना चाहिये।
इच्छानुसार सन्तान
६०
वीरेन्द्र गुप्तः
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आर्त्तादास्तु भुंजीत नाद्रपदास्तु सविशोत्।
आद्रपदिस्तु भुजानो दीर्घमायुखात्नयात्।।
मनु ४/७६
अर्थ- गीले पैर भोजन करे, किन्तु गीले पैर सोवे नहीं।
क्योंकि गीले पैर भोजन करने वाला दीर्घायु पाता है।
न स्नानमाचरेद्भुक्त्वा नातुरो न महानिधि।
न वासोभिः सुहजस्त्रं नाडविज्ञाते जलाशये।।
मनु ४/१२९
अर्थ- भोजन करके, रोग में, मध्य रात्रि में, कपड़ों के साथ और जहाँ पानी गहरा हो और विदित न हो ऐसे जलाशय तथा समय में स्नान न करे।
भोजन के पश्चात् हाथ मुख धोकर दोनों हाथों को मसल कर नेत्र और मुख पर फेरने से तेज और ज्योति बढ़ती है। मस्तिष्क और सर पर हाथ फेरने से बुद्धि बढ़ती है। भोजन करके १०० कदम टहलो कार्यवश बैठे रहने से शरीर भारी होता है, सीधे खाट पर लेटे रहने से अन्न नहीं पचता और दौड़ने वाले के साथ तो मानो मृत्यु ही दौड़ती है। रात्रि को सोते समय दूध अवश्य ही पीना चाहिए। क्योंकि दूध पीने से जो दिन में विदाही लवण, कटु, तिक आदि पदार्थ खाये जाते हैं, उनका विदाह शान्त होकर मीठा हितकारी पाक होता है।
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इच्छानुसार सन्तान
६१
वीरेन्द्र गुप्तः
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