गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
About this granth
Beyond the Bhagavad Gita, the epics and Puranas contain many other dialogues called 'Gitas'. Gita Sangraha (गीता-संग्रह, Gita Press book no. 1958) gathers twenty-five of them, each with its original text and a Hindi translation.
The contents show the range: the Ganesha Gita from the Ganesha Purana; the Bhikshu, Paramahamsa, Hamsa and Avadhuta Gitas from the Bhagavata; from the Mahabharata the Shadja, Pingala, Shampaka, Manki, Ajagara, Harita, Vritra, Putra, Kama and Narada Gitas, a second Hamsa Gita and the Uttara Gita; two Yama Gitas from the Vishnu and Agni Puranas; two Rama Gitas from the Adhyatma and Adbhuta Ramayanas; the Bhagavati (Parvati) Gita from the Devi Purana; and the Ashtavakra Gita and Dattatreya's Avadhuta Gita.
Many of these are short teachings on detachment, contentment, self-knowledge and devotion, such as the courtesan Pingala's awakening or the sage who lives like a python. The copy here is the sixth reprint, of Samvat 2074, and its 675 pages bring these scattered texts together in one volume.
* अष्टावक्रगीता * ४८७
प्रत्यक्षमप्यवस्तुत्वाद्विश्वं नास्त्यमले त्वयि।
रज्जुसर्प इव व्यक्तमेवमेव लयं व्रज ॥ ३ ॥
यद्यपि जगत् प्रत्यक्ष दीख रहा है तथापि तुम्हारे शुद्ध स्वरूपमें इसका अस्तित्व नहीं है। यह तो (भ्रमवश) रज्जुमें सर्पके समान दीखने लगा है—ऐसा निश्चय करके तुम मुक्त हो जाओ ॥ ३ ॥
समदुःखसुखः पूर्ण आशानैराश्ययोः समः।
समजीवितमृत्युः सन्नेवमेव लयं व्रज ॥ ४ ॥
तुम पूर्ण हो, तुम यह जानकर कि सुख-दुःख, आशा-निराशा और जीवन-मृत्यु समान ही हैं, मुक्त हो जाओ ॥ ४ ॥
॥ इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायामाचार्योक्तं लयचतुष्टयं नाम पञ्चमं प्रकरणं समाप्तम् ॥ ५ ॥
छठा प्रकरण
आत्मा और प्राकृतिक जगत्की समानताका अनुभव
आकाशवदनन्तोऽहं घटवत्प्राकृतं जगत्।
इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः ॥ १ ॥
मैं आकाशके समान अनन्त हूँ और प्राकृतिक जगत् घटके समान है। यही ज्ञान है, ऐसी अवस्थामें न तो इस जगत्का त्याग है, न ग्रहण है और न तो लय ही है। (अनन्त देशकी दृष्टिसे अल्प देश नहीं होता) ॥ १ ॥
महोदधिरिवाहं स प्रपञ्चो वीचिसन्निभः।
इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः ॥ २ ॥
मैं महासमुद्रके समान हूँ और यह प्रपंच तरंगके समान। यही ज्ञान है। ऐसी अवस्थामें न तो इस प्रपंचका त्याग है, न ग्रहण है और न तो लय ही है। (कारणकी दृष्टिसे कार्य पृथक् नहीं होता) ॥ २ ॥
अहं स शुक्तिसङ्काशो रूप्यवद्विश्वकल्पना।
इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः ॥ ३ ॥
मैं सीपके समान हूँ और मुझमें रजतके समान विश्वकी कल्पना
४८८ * गीता-संग्रह *
हुई है। यही ज्ञान है। ऐसी स्थितिमें न जगत्का त्याग है, न ग्रहण है और न तो लय ही है। (यहाँ जगत्को आत्माका विवर्त्त बतलाया है। भ्रान्तिजन्य कार्य-कारण आदि भाव नहीं होते) ॥ ३ ॥
अहं वा सर्वभूतेषु सर्वभूतान्यथो मयि।
इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः॥ ४॥
मैं समस्त भूतोंमें हूँ और सब भूत मुझमें हैं (सीपमें रजतके समान)—यही ज्ञान है। ऐसी अवस्थामें इस जगत्का न त्याग है, न ग्रहण है और न तो लय ही है॥ ४॥
॥ इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायां शिष्योक्तमुत्तरचतुष्कं नाम षष्ठं प्रकरणं समाप्तम् ॥ ६ ॥
सातवाँ प्रकरण
ज्ञानीकी जगत्से असम्बद्धता
मय्यनन्तमहाम्भोधौ विश्वपोत इतस्ततः।
भ्रमति स्वान्तवातेन न ममास्त्यसहिष्णुता ॥ १ ॥
मुझ अनन्त महासमुद्रमें मनकी वायुसे प्रेरित होकर जगत्-रूप नौका इधर-उधर घूमती रहती है, इससे मुझे कोई चिढ़ नहीं है ॥ १ ॥
मय्यनन्तमहाम्भोधौ जगद्वीचिः स्वभावतः।
उदेतु वास्तमायातु न मे वृद्धिर्न च क्षतिः॥ २॥
मुझ अनन्त महासमुद्रमें यह जगत्की तरंग स्वभावसे ही उठे या न उठे। न तो इससे मेरी वृद्धि होती है और न कोई क्षति ॥ २ ॥
मय्यनन्तमहाम्भोधौ विश्वं नाम विकल्पना।
अतिशान्तो निराकार एतदेवाहमास्थितः ॥ ३ ॥
मुझ अनन्त महासमुद्रमें यह विश्व केवल कल्पनामात्र है, मैं अत्यन्त शान्त और नाम-रूपसे रहित हूँ, यही मेरी निष्ठा है ॥ ३ ॥
* अष्टावक्रगीता * ४८९
नात्मा भावेषु नो भावस्तत्रानन्ते निरञ्जने।
इत्यसक्तोऽस्पृहः शान्त एतदेवाहमास्थितः ॥ ४॥
शरीरादिमें मैं आत्मा नहीं हूँ और न तो मुझ अनन्त शुद्धात्मामें शरीरादि ही हैं, अतः मुझमें न तो आसक्ति है, न स्पृहा। मैं परम शान्त हूँ—यही मेरी निष्ठा है॥ ४॥
अहो चिन्मात्रमेवाहमिन्द्रजालोपमं जगत्।
अतो मम कथं कुत्र हेयोपादेयकल्पना ॥ ५॥
कैसा आश्चर्य है कि मैं केवल चित्स्वरूप हूँ और यह जगत् इन्द्रजालके समान है। अब मुझे क्यों और किसमें त्याज्य और ग्रहणकी कल्पना हो?॥ ५॥
॥ इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायामनुभवपञ्चकविवरणं नाम सप्तमं प्रकरणं समाप्तम् ॥ ७॥
आठवाँ प्रकरण
चित्तकी आसक्ति-अनासक्ति ही बन्धन-मोक्षका कारण
तदा बन्धो यदा चित्तं किञ्चिद्वाञ्छति शोचति।
किञ्चिन्मुञ्चति गृह्णाति किञ्चिद्धृष्यति कुप्यति ॥ १॥
जब चित्त कुछ चाहता है, किसीके लिये शोक करता है, किसी वस्तुको छोड़ता-पकड़ता है और किसी वस्तुसे रुष्ट एवं तुष्ट होता है, तभी बन्धन है॥ १॥
तदा मुक्तिर्यदा चित्तं न वाञ्छति न शोचति।
न मुञ्चति न गृह्णाति न हृष्यति न कुप्यति ॥ २॥
जब चित्त चाह, शोक, त्याग, ग्रहण, हर्ष और रोषसे रहित होता है, तभी मुक्ति है॥ २॥
तदा बन्धो यदा चित्तं सक्तं कास्वपि दृष्टिषु।
तदा मोक्षो यदा चित्तमसक्तं सर्वदृष्टिषु ॥ ३॥
जब चित्त किन्हीं दृष्टियोंमें आसक्त है, तब बन्धन है। जब
४९० * गीता-संग्रह *
चित्त किसी भी दृष्टिमें आसक्त नहीं है, तब मोक्ष है॥ ३॥
यदा नाहं तदा मोक्षो यदाहं बन्धनं तदा।
मत्वेति हेलया किञ्चिन्मा गृहाण विमुञ्च मा॥ ४॥
जब अहंभावका बाध है, तब मोक्ष है, जब कहीं भी अहंभाव है, तब बन्धन है—ऐसा जानकर अपेक्षासे न तो किसीको पकड़ो और न छोड़ो॥ ४॥
॥ इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायां गुरुप्रोक्तं बन्धनमोक्षव्यवस्था-नामाष्टमं प्रकरणं समाप्तम्॥ ८॥
नौवाँ प्रकरण
वासना ही सुख-दुःखादि द्वन्द्वोंका कारण
कृताकृते च द्वन्द्वानि कदा शान्तानि कस्य वा।
एवं ज्ञात्वेह निर्वेदाद् भव त्यागपरोऽव्रती॥ १॥
'यह किया और यह नहीं किया'—ये द्वन्द्व कब, किसके शान्त हुए हैं? (कभी किसीके नहीं) ऐसा जानकर निर्वेदसे त्यागपरायण हो जाओ, कोई व्रत मत लो। (दृश्यकी किसी प्रतीतिके प्रति कुछ करने या न करनेका आग्रह मत करो। ज्ञानका फल अनाग्रह है)॥ १॥
कस्यापि तात धन्यस्य लोकचेष्टावलोकनात्।
जीवितेच्छा बुभुक्षा च बुभुत्सोपशमं गता॥ २॥
हे तात! कोई बिरला ही धन्य महापुरुष ऐसा होता है, जिसकी लोगोंके रंग-ढंग देखकर जीनेकी, भोगनेकी और जाननेकी इच्छाएँ शान्त हो गयी हैं। (कर्तव्य, प्राप्तव्य, ज्ञातव्य आदि ज्ञानीको नहीं रहते)॥ २॥
अनित्यं सर्वमेवेदं तापत्रितयदूषितम्।
असारं निन्दितं हेयमिति निश्चित्य शाम्यति॥ ३॥
यह सम्पूर्ण जगत् मानसिक, दैविक एवं भौतिक तापसे दूषित तथा अनित्य है। इसमें कुछ सार नहीं है, यह निन्दित एवं त्याज्य
- अष्टावक्रगीता * ४९१
है, ऐसा निश्चय करके वह ज्ञानी शान्त हो जाता है॥ ३॥
कोऽसौ कालो वयः किं वा यत्र द्वन्द्वानि नो नृणाम्।
तान्युपेक्ष्य यथाप्राप्तवर्ती सिद्धिमवाप्नुयात् ॥ ४॥
भला ऐसा कौन-सा समय है अथवा कौन-सी अवस्था है, जब मनुष्य सर्दी-गर्मी, सुख-दुःखादिके द्वन्द्वोंसे आक्रान्त नहीं रहता ? इसलिये उनकी उपेक्षा करके जब-जो-जैसे मिले, उसीसे अपना काम चला ले। ऐसे पुरुषको ही सिद्धि मिलती है॥ ४॥
नाना मतं महर्षीणां साधूनां योगिनां तथा।
दृष्ट्वा निर्वेदमापन्नः को न शाम्यति मानवः ॥ ५॥
ऐसा कौन (विचारशील) मनुष्य होगा, जो महर्षि, साधु एवं योगियोंके अनेकों मतमतान्तर देख उनसे उदासीन होकर शान्त न हो जाय ?॥ ५॥
कृत्वा मूर्तिपरिज्ञानं चैतन्यस्य न किं गुरुः।
निर्वेदसमतायुक्त्या यस्तारयति संसृतेः ॥ ६॥
जो चैतन्यके स्वरूपका ज्ञान प्राप्त करके निर्वेद और समताकी युक्तिसे औरोंको भी संसार-सागरसे तार देता है, वह क्या गुरु नहीं है?॥ ६॥
पश्य भूतविकारांस्त्वं भूतमात्रान् यथार्थतः।
तत्क्षणाद् बन्धनिर्मुक्तः स्वरूपस्थो भविष्यसि ॥ ७॥
तुम पंचभूतोंके विकारोंको (देहेन्द्रियादिको) यथार्थमें पंचभूत-मात्र ही देखो। तब तुम तत्क्षण ही बन्धन-मुक्त होकर अपने स्वरूपमें स्थित हो जाओगे॥ ७॥
वासना एव संसार इति सर्वा विमुञ्च ताः।
तत्त्यागो वासनात्यागात् स्थितिरद्य यथा तथा ॥ ८॥
वासना ही संसार है, इसलिये इन सबका परित्याग कर दो। वासना-त्यागसे ही संसारका त्याग होता है। अब (शरीर, अन्तःकरण और
४९२ * गीता-संग्रह *
संसारकी) चाहे जैसी स्थिति हो, उससे कोई सम्बन्ध नहीं रहता ॥ ८ ॥
॥ इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायां गुरुप्रोक्तं निर्वेदाष्टकं
नाम नवमं प्रकरणं समाप्तम् ॥ ९ ॥
दसवाँ प्रकरण
तृष्णा ही बन्धन है
विहाय वैरिणं काममर्थं चानर्थसङ्कुलम्।
धर्ममप्येतयोर्हेतुं सर्वत्रानादरं कुरु ॥ १ ॥
अपने शत्रु काम-भोग और अनर्थ-संकुल अर्थ तथा इन दोनोंके कारण धर्मको भी छोड़कर सर्वत्र उपेक्षाका भाव रखो ॥ १ ॥
स्वप्नेन्द्रजालवत्पश्य दिनानि त्रीणि पञ्च वा।
मित्रक्षेत्रधनागारदारदायादिसम्पदः ॥ २ ॥
मित्र, जमीन, धन, महल, स्त्रियाँ, उत्तराधिकार आदि सम्पत्तियाँ—ये सब स्वप्न और इन्द्रजालके समान तीन या पाँच दिनकी वस्तु हैं, ऐसा देखो, समझो ॥ २ ॥
यत्र यत्र भवेत्तृष्णा संसारं विद्धि तत्र वै।
प्रौढवैराग्यमाश्रित्य वीततृष्णः सुखी भव ॥ ३ ॥
जहाँ-जहाँ तृष्णा है, वहीं-वहीं संसार है—ऐसा जानो। प्रौढ़ वैराग्यका आश्रय लेकर तृष्णाको छोड़ दो और सुखी (निश्चिन्त) हो जाओ ॥ ३ ॥
तृष्णामात्रात्मको बन्धस्तन्नाशो मोक्ष उच्यते।
भवासंसक्तिमात्रेण प्राप्तिस्तुष्टिर्मुहुर्मुहुः ॥ ४ ॥
केवल तृष्णा ही बन्धन है और उसके नाशका ही नाम मोक्ष है। संसारमें अनासक्त होते ही बार-बार कृतकृत्यता और आनन्दकी उपलब्धि होने लगती है ॥ ४ ॥
- अष्टावक्रगीता * ४९३
त्वमेकश्चेतनः शुद्धो जडं विश्वमसत्तथा।
अविद्यापि न किञ्चित्सा का बुभुत्सा तथापि ते॥ ५॥
तुम एक एवं शुद्ध चेतन हो और यह विश्व जड़ तथा असत् है। अविद्या भी कुछ नहीं है। फिर तुम किस वस्तुको जाननेकी इच्छा करते हो?॥ ५॥
राज्यं सुताः कलत्राणि शरीराणि सुखानि च।
संसक्तस्यापि नष्टानि तव जन्मनि जन्मनि॥ ६॥
राज्य, पुत्र, स्त्री, शरीर और सुख—इनमें तुम जन्म-जन्म आसक्त रहे हो, परंतु तुम्हारे आसक्त रहनेपर भी ये नष्ट हो गये॥ ६॥
अलमर्थेन कामेन सुकृतेनापि कर्मणा।
एभ्यः संसारकान्तारे न विश्रान्तमभून्मनः॥ ७॥
धन, भोग अथवा पुण्य-कर्म—ये सब अब बहुत हो चुके हैं, बस करो। इस संसारके घोर जंगलमें इन साधनोंसे मनको शान्ति नहीं मिली॥ ७॥
कृतं न कति जन्मानि कायेन मनसा गिरा।
दुःखमायासदं कर्म तदद्याप्युपरम्यताम्॥ ८॥
न जाने कितने जन्मोंतक तुमने शरीर, मन एवं वाणीसे परिश्रम और क्लेशप्रद कर्मोंका अनुष्ठान किया है, अब तो उनसे उपराम हो जाओ॥ ८॥
॥ इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायां गुरुप्रोक्तमुपशमाष्टकं नाम दशमं प्रकरणं समाप्तम्॥ १०॥
ग्यारहवाँ प्रकरण
शान्तिप्राप्तिके उपाय
भावाभावविकारश्च स्वभावादिति निश्चयी।
निर्विकारो गतक्लेशः सुखेनैवोपशाम्यति॥ १॥
भावसे अभाव और अभावसे भावरूप विकार स्वभावसे ही होते रहते हैं। जो ऐसा निश्चय कर लेता है, वह विकार एवं क्लेशसे
४९४ * गीता-संग्रह *
रहित हो जाता है और उसे अनायास ही शान्ति प्राप्त होती है॥ १॥
ईश्वरः सर्वनिर्माता नेहान्य इति निश्चयी।
अन्तर्गलितसर्वाशः शान्तः क्वापि न सज्जते॥ २॥
ईश्वर ही सबका निर्माता है, दूसरा कोई नहीं। जो ऐसा निश्चय कर लेता है, उसकी सारी आशाएँ भीतर ही गल जाती हैं, वह शान्त हो जाता है और उसकी कहीं भी आसक्ति नहीं होती॥ २॥
आपदः सम्पदः काले दैवादेवेति निश्चयी।
तृप्तः स्वस्थेन्द्रियो नित्यं न वाञ्छति न शोचति॥ ३॥
समयपर आपत्तियाँ और सम्पत्तियाँ दैव (प्रारब्ध)-से होती हैं, ऐसा जो निश्चय कर लेता है, वह सदा तृप्त रहता है। उसकी इन्द्रियाँ सदा स्वस्थ रहती हैं। न तो वह अप्राप्तकी प्राप्तिकी इच्छा करता है और न तो नष्ट वस्तुके लिये शोक ही करता है॥ ३॥
सुखदुःखे जन्ममृत्यू दैवादेवेति निश्चयी।
साध्यादर्शी निरायासः कुर्वन्नपि न लिप्यते॥ ४॥
सुख-दुःख और जन्म-मृत्यु दैवसे ही होते हैं, जो ऐसा निश्चय कर लेता है, उसकी दृष्टिमें साध्य कुछ नहीं रहता। उसे परिश्रम नहीं होता और कर्म करनेपर भी वह लिप्त नहीं होता॥ ४॥
चिन्तया जायते दुःखं नान्यथेहेति निश्चयी।
तया हीनः सुखी शान्तः सर्वत्र गलितस्पृहः॥ ५॥
इस संसारमें चिन्तासे ही दुःख होता है, अन्यथा नहीं। जिसने ऐसा निश्चय कर लिया है, वह चिन्ताहीन साधक सुखी एवं शान्त हो जाता है, उसको कहीं भी स्पृहा नहीं होती॥ ५॥
नाहं देहो न मे देहो बोधोऽहमिति निश्चयी।
कैवल्यमिव सम्प्राप्तो न स्मरत्यकृतं कृतम्॥ ६॥
न मैं देह हूँ, न देह मेरा है, मैं तो शुद्ध बोधस्वरूप हूँ, जिसको
* अष्टावक्रगीता * ४९५
ऐसा निश्चय हो गया है, उसे मानो कैवल्यकी प्राप्ति हो गयी है। वह इस बातका स्मरण नहीं करता कि मैंने क्या किया और क्या नहीं किया ॥ ६ ॥
आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तमहमेवेति निश्चयी।
निर्विकल्पः शुचिः शान्तः प्राप्ताप्राप्तविनिर्वृतः ॥ ७ ॥
‘ब्रह्मासे लेकर तिनकेतक सब मैं ही हूँ’—ऐसा जिसका निश्चय है, वह संकल्प-विकल्पसे रहित, पवित्र एवं शान्त हो जाता है। प्राप्ति और अप्राप्ति दोनोंमें वह निश्चिन्त रहता है॥ ७ ॥
नानाश्चर्यमिदं विश्वं न किञ्चिदिति निश्चयी।
निर्वासनः स्फूर्तिमात्रो न किञ्चिदिति शाम्यति ॥ ८ ॥
अनेक आश्चर्योंसे परिपूर्ण यह संसार कुछ नहीं है—ऐसा जिसका निश्चय है, उसकी सारी वासनाएँ भस्म हो जाती हैं। वह स्फूर्तिमात्र बचता है और वह मानो कुछ नहीं है (निर्वाण ही निर्वाण है), इस प्रकार शान्त हो जाता है॥ ८ ॥
॥ इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायां ज्ञानाष्टकं नामैकादशं प्रकरणं समाप्तम् ॥ ११ ॥
बारहवाँ प्रकरण
आत्मस्वरूपमें स्थित पुरुषकी स्थिति
कायकृत्यासहः पूर्वं ततो वाग्विस्तरासहः।
अथ चिन्तासहस्तस्मादेवमेवाहमास्थितः ॥ १ ॥
पहले शारीरिक कर्मकी असहिष्णुता तदनन्तर वाणीके विस्तारकी और फिर चिन्ताकी असहिष्णुता हो गयी। इसलिये मैं यों ही ज्योंका-त्यों स्थित हूँ॥ १ ॥
प्रीत्यभावेन शब्दादेरदृश्यत्वेन चात्मनः।
विक्षेपैकाग्रहृदय एवमेवाहमास्थितः ॥ २ ॥
शब्दादि विषयोंमें प्रीति न होनेके कारण और आत्माके अदृश्य
४९६ * गीता-संग्रह *
होनेसे मैं विक्षेपके निमित्त उपस्थित होनेपर भी एकाग्र रहकर यों ही
स्थित हूँ॥ २॥
समाध्यासादिविक्षिप्तौ व्यवहारः समाधये।
एवं विलोक्य नियममेवमेवाहमास्थितः॥ ३॥
सम्यक् अध्यास आदिके कारण विक्षेप होनेपर समाधिके लिये
साधन करना होता है। ऐसा नियम देखकर मैं यों ही स्थित हूँ॥ ३॥
हेयोपादेयविरहादेवं हर्षविषादयोः।
अभावादद्य हे ब्रह्मन्नेवमेवाहमास्थितः॥ ४॥
त्याज्य-ग्राह्य, हर्ष और विषाद न होनेके कारण हे ब्रह्मस्वरूप !
मैं तो यों ही ज्यों-का-त्यों स्थित हूँ॥ ४॥
आश्रमाना श्रमं ध्यानं चित्तस्वीकृतवर्जनम्।
विकल्पं मम वीक्ष्यैतैरेवमेवाहमास्थितः॥ ५॥
यह आश्रम है और यह आश्रमका त्याग, यह ध्यान है और
यह विक्षेप, यह चित्तके द्वारा स्वीकार करनेयोग्य है और यह नहीं—
इन बातोंसे विकल्प ही होता है। ऐसा देखकर मैं तो यों ही स्थित
हूँ॥ ५॥
कर्मानुष्ठानमज्ञानाद्यथैवोपरमस्तथा ।
बुद्ध्वा सम्यगिदं तत्त्वमेवमेवाहमास्थितः॥ ६॥
जिस प्रकार कर्मानुष्ठान (कर्म करना) अज्ञानसे होता है, इसी
प्रकार कर्मका त्याग भी अज्ञानसे ही होता है, इस तत्त्वको यथार्थ
रीतिसे जानकर मैं इसी प्रकार (आत्मस्वरूपमें ही) स्थित हूँ॥ ६॥
अचिन्त्यं चिन्त्यमानोऽपि चिन्तारूपं भजत्यसौ।
त्यक्त्वा तद्भावनं तस्मादेवमेवाहमास्थितः॥ ७॥
अचिन्त्य आत्मतत्त्वका चिन्तन करनेसे भी वह चिन्तनरूप हो
जाता है। इसलिये उसका चिन्तन (भावना) छोड़कर मैं तो यों ही
- अष्टावक्रगीता * ४९७
अपने स्वतःसिद्ध स्वरूपमें स्थित हूँ॥ ७॥
एवमेव कृतं येन स कृतार्थो भवेदसौ।
एवमेव स्वभावो यः स कृतार्थो भवेदसौ॥ ८॥
जिसने अभ्यासके द्वारा अपनेको ऐसा बना लिया, वह कृतार्थ हो जाता है। जिसका ऐसा स्वभाव ही है, वह स्वतः कृतार्थ है॥ ८॥
॥ इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायामेवमेवाष्टकं नाम द्वादशं प्रकरणं समाप्तम्॥ १२॥
तेरहवाँ प्रकरण
स्वरूपस्थितिका आनन्द
अकिञ्चनभवं स्वास्थ्यं कौपीनत्वेऽपि दुर्लभम्।
त्यागादाने विहायास्मादहमासे यथासुखम्॥ १॥
‘आत्माके सिवाय अन्य कोई वस्तु है ही नहीं’—ऐसे बोधसे जो स्वरूपस्थिति प्राप्त होती है, वह केवल कौपीनधारी होनेपर भी दुर्लभ है। इसलिये त्याग-ग्रहणका परित्याग करके मैं मौजमें रहता हूँ॥ १॥
कुत्रापि खेदः कायस्य जिह्वा कुत्रापि खिद्यते।
मनः कुत्रापि तत्त्यक्त्वा पुरुषार्थे स्थितः सुखम्॥ २॥
कहीं तो शरीरको कष्ट होता है और कहीं जिह्वाको तथा कहीं मनको। इसलिये उन सबको छोड़कर मैं अपने स्वरूपमें सुखपूर्वक स्थित हूँ॥ २॥
कृतं किमपि नैव स्यादिति सञ्चिन्त्य तत्त्वतः।
यदा यत्कर्तुमायाति तत्कृत्वासे यथासुखम्॥ ३॥
शरीर, अन्तःकरणादिके द्वारा किया हुआ कर्म वस्तुतः कुछ नहीं है, ऐसा निश्चय करके जब जो कर्तव्य सामने आ जाता है, उसे करके मैं मौजमें रहता हूँ॥ ३॥
४९८ * गीता-संग्रह *
कर्मनैष्कर्म्यनिर्वन्धभावा देहस्थयोगिनः ।
संयोगायोगविरहादहमासे यथासुखम् ॥ ४ ॥
कर्मका संकल्प करो अथवा उसके त्यागका संकल्प करो—यह दुराग्रह तो देहाभिमानी साधकके लिये है। न मुझसे किसीका संयोग है और न तो वियोग, इसलिये मैं सुखपूर्वक रहता हूँ॥ ४॥
अर्थानर्थौ न मे स्थित्या गत्या न शयनेन वा।
तिष्ठन्गच्छन्स्वपंस्तस्मादहमासे यथासुखम् ॥ ५॥
स्थिति, गति अथवा शयनसे न मेरा कोई लाभ है न तो हानि; इसलिये उठते-बैठते-सोते मैं अपनी मौजमें रहता हूँ॥ ५॥
स्वपतो नास्ति मे हानिः सिद्धिर्यत्नवतो न वा।
नाशोल्लासौ विहायास्मादहमासे यथासुखम् ॥ ६॥
न सोनेसे मेरी कोई हानि है और न परिश्रम करनेसे कोई लाभ। इसलिये हानि और लाभकी बुद्धिका परित्याग करके मैं मौजमें रहता हूँ॥ ६॥
सुखादिरूपानियमं भावेष्वालोक्य भूरिशः।
शुभाशुभे विहायास्मादहमासे यथासुखम् ॥ ७ ॥
जगत्के किसी भी पदार्थमें, स्थितिमें यह सुख है—यह दुःख है, ऐसा नियम नहीं है—यह बात मैंने बार-बार देख ली है। इसलिये शुभ (हित) और अशुभ (अहित)-बुद्धिका परित्याग करके मैं मौजमें रहता हूँ॥ ७॥
॥ इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायां यथासुखसप्तकं नाम त्रयोदशं प्रकरणं समाप्तम् ॥ १३॥
- अष्टावक्रगीता * ४९९
चौदहवाँ प्रकरण
आत्मज्ञानी अवधूत पुरुषकी स्थिति
प्रकृत्या शून्यचित्तो यः प्रमादाद्भावभावनः ।
निद्रितो बोधित इव क्षीणसंसरणो हि सः ॥ १ ॥
जिसका चित्त स्वभावसे ही शून्य (विषयचिन्तनरहित) है और जो उपेक्षापूर्वक विषयोंमें इस तरह बरत लेता है कि मानो कोई गाढ़ी नींदसे जगाया हुआ पुरुष आलस्यभरे शरीरसे काम कर रहा हो—ऐसा पुरुष संसारसे रहित ही है॥ १॥
क्व धनानि क्व मित्राणि क्व मे विषयदस्यवः ।
क्व शास्त्रं क्व च विज्ञानं यदा मे गलिता स्पृहा ॥ २ ॥
जब मेरी स्पृहा ही नष्ट हो गयी तब धन क्या, मित्र क्या और मेरे लिये विषयरूप लुटेरे भी क्या? मेरे लिये शास्त्र क्या और विज्ञान भी क्या?॥ २॥
विज्ञाते साक्षिपुरुषे परमात्मनि चेश्वरे ।
नैराश्ये बन्धमोक्षे च न चिन्ता मुक्तये मम ॥ ३ ॥
साक्षी पुरुषको जो ईश्वर और परमात्मासे अभिन्न है, जान लेनेपर जब बन्ध और मोक्ष दोनोंकी आस्था नष्ट हो गयी, तब मुझे मुक्तिके लिये क्या चिन्ता हो सकती है?॥ ३॥
अन्तर्विकल्पशून्यस्य बहिः स्वच्छन्दचारिणः ।
भ्रान्तस्येव दशास्तास्तास्तादृशा एव जानते ॥ ४ ॥
जो भीतरसे तो विकल्पशून्य है और बाहरसे भ्रान्तपुरुषके समान स्वच्छन्द आचरण करता है, उसकी उन-उन अनिर्वचनीय अवस्थाओंको वैसे लोग ही जानते हैं॥ ४॥
॥ इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायां शान्तिचतुष्टयं नाम चतुर्दशं प्रकरणं समाप्तम् ॥ १४ ॥
५००
* गीता-संग्रह *
पन्द्रहवाँ प्रकरण
मोक्षका मर्म तथा अद्वैत निरूपण
यथातथोपदेशेन कृतार्थः सत्त्वबुद्धिमान्।
आजीवमपि जिज्ञासुः परस्तत्र विमुह्यति॥ १॥
सात्त्विक-बुद्धिसे सम्पन्न जिज्ञासु पुरुषको जैसे-तैसे थोड़ेमें भी समझा दो तो वह कृतार्थ हो जाता है और इससे हीन पुरुष तो जीवनभर जिज्ञासा करता फिरे तो भी मोहग्रस्त ही रहता है॥ १॥
मोक्षो विषयवैरस्यं बन्धो वैषयिको रसः।
एतावदेव विज्ञानं यथेच्छसि तथा कुरु॥ २॥
विषयोंका नीरस हो जाना ही मोक्ष है, विषयमें रस आना ही बन्धन है; बस इतना ही तत्त्वज्ञान है। (इसे जानकर) जो इच्छा हो करो॥ २॥
वाग्मिप्राज्ञमहोद्योगं जनं मूकजडालसम्।
करोति तत्त्वबोधोऽयमतस्त्यक्तो बुभुक्षुभिः॥ ३॥
यह तत्त्वबोध वक्ताको मूक, प्राज्ञको जड़ और महान् उद्योगीको आलसी बना देता है। इसलिये भोग चाहनेवालोंने इसका परित्याग कर दिया है॥ ३॥
न त्वं देहो न ते देहो भोक्ता कर्ता न वा भवान्।
चिद्रूपोऽसि सदा साक्षी निरपेक्षः सुखं चर॥ ४॥
न तुम देह हो और न देह तुम्हारा है, न तुम कर्ता हो और न तुम भोक्ता। तुम सदा एकरस चेतन साक्षी हो। निरपेक्ष होकर सुखसे विचरो॥ ४॥
रागद्वेषौ मनोधर्मौ न मनस्ते कदाचन।
निर्विकल्पोऽसि बोधात्मा निर्विकारः सुखं चर॥ ५॥
राग-द्वेष मनके धर्म हैं और यह मन कदापि तुम्हारा नहीं है।
- अष्टावक्रगीता * ५०१
तुम विकल्प एवं विकारसे रहित बोधस्वरूप हो। सुखसे विचरो॥५॥
सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
विज्ञाय निरहङ्कारो निर्ममत्वं सुखी भव॥६॥
समस्त पदार्थोंमें अपने-आपको और समस्त पदार्थोंको अपने-आपमें जानकर अहंकार और ममतासे रहित एवं सुखी हो जाओ॥६॥
विश्वं स्फुरति यत्रेदं तरङ्गा इव सागरे।
तत्त्वमेव न सन्देहश्चिन्मूर्ते विज्वरो भव॥७॥
हे चित्स्वरूप! जिस अधिष्ठान चैतन्यमें यह विश्व समुद्रमें तरंगके समान चमक रहा है, वह तुम ही हो; इसमें सन्देह नहीं। तुम निश्चिन्त हो जाओ॥७॥
श्रद्धस्व तात श्रद्धस्व नात्र मोहं कुरुष्व भोः।
ज्ञानस्वरूपो भगवानात्मा त्वं प्रकृतेः परः॥८॥
वत्स! श्रद्धा करो, श्रद्धा करो, इस सम्बन्धमें भूल मत करो। तुम प्रकृति से परे ज्ञानस्वरूप और परमात्मा ही हो॥८॥
गुणैः संवेष्टितो देहस्तिष्ठत्यायाति याति च।
आत्मा न गन्ता नागन्ता किमेनमनुशोचसि॥९॥
गुणोंसे लपेटा हुआ यह शरीर ही रहता है, यही आता-जाता है। आत्मा न कहीं आता है, न जाता है; फिर तुम इसके लिये क्यों शोक करते हो?॥९॥
देहस्तिष्ठतु कल्पान्तं गच्छत्वद्यैव वा पुनः।
क्व वृद्धिः क्व च वा हानिस्तव चिन्मात्ररूपिणः॥१०॥
चाहे यह शरीर कल्पपर्यंत रहे और चाहे आज ही मर-मिट जाय, इससे तुम्हारी हानि अथवा लाभ ही क्या है? तुम केवल चित्-स्वरूप हो॥१०॥
५०२ * गीता-संग्रह *
त्वय्यनन्तमहाम्भोधौ विश्ववीचिः स्वभावतः।
उदेतु वास्तमायातु न ते वृद्धिर्न वा क्षतिः॥ ११॥
तुम अनन्त महासमुद्र हो और तुममें यह विश्व एक नन्हीं-सी तरंग। यह स्वभावसे ही उठे या न उठे, इससे न तो तुम्हारा कोई लाभ है और न हानि॥ ११॥
तात चिन्मात्ररूपोऽसि न ते भिन्नमिदं जगत्।
अतः कस्य कथं कुत्र हेयोपादेयकल्पना॥ १२॥
वत्स! तुम केवल चित्स्वरूप हो। यह जगत् तुमसे भिन्न नहीं है। ऐसी स्थितिमें किसे, कहाँ, क्यों हेय और उपादेयकी कल्पना हो॥ १२॥
एकस्मिन्नव्यये शान्ते चिदाकाशेऽमले त्वयि।
कुतो जन्म कुतः कर्म कुतोऽहङ्कार एव च॥ १३॥
तुम एक अविनाशी, शान्त एवं निर्मल चिदाकाश हो। तुममें जन्म कहाँ? कर्म कहाँ? और अहंकार ही कहाँ?॥ १३॥
यत्त्वं पश्यसि तत्रैकस्त्वमेव प्रतिभाससे।
किं पृथग्भासते स्वर्णात्कटकाङ्गदनूपुरम्॥ १४॥
जो कुछ तुम देखते हो उस दीखनेवाले पदार्थके रूपमें एकमात्र तुम्हीं प्रतीत हो रहे हो। क्या कड़े, बाजूबन्द और पायजेब स्वर्णसे पृथक् प्रतीत होते हैं?॥ १४॥
अयं सोऽहमयं नाहं विभागमिति सन्त्यज।
सर्वमात्मेति निश्चित्य निःसङ्कल्पः सुखी भव॥ १५॥
यह मैं हूँ, यह मैं नहीं हूँ, इस बँटवारेको छोड़ दो। सब आत्मा ही है—ऐसा निश्चय करके निःसंकल्प और सुखी हो जाओ॥ १५॥
तवैवाज्ञानतो विश्वं त्वमेकः परमार्थतः।
त्वत्तोऽन्यो नास्ति संसारी नासंसारी च कश्चन॥ १६॥
तुम्हारे निज स्वरूपके अज्ञानसे ही विश्वकी सत्ता है। परमार्थतः
* अष्टावक्रगीता * ५०३
एकमात्र तुम ही हो, तुमसे भिन्न न तो कोई संसारी (जीव) है और न कोई असंसारी (ईश्वर) ॥ १६ ॥
भ्रान्तिमात्रमिदं विश्वं न किञ्चिदिति निश्चयी।
निर्वासनः स्फूर्तिमात्रो न किञ्चिदिव शाम्यति॥ १७॥
यह विश्व भ्रान्तिमात्र है। वस्तुतः कुछ नहीं है। जिसका ऐसा निश्चय हो गया है, उसकी वासनाएँ नष्ट हो जाती हैं। वह स्फूर्ति-मात्र रहता है, वह ‘न कुछ’ के समान निर्वाणका अनुभव करता है॥ १७॥
एक एव भवाम्भोधावासीदस्ति भविष्यति।
न ते बन्धोऽस्ति मोक्षो वा कृतकृत्यः सुखं चर॥ १८॥
इस संसार-समुद्रमें एक ही था, है और रहेगा। न तुम्हारा बन्धन है और न तो मोक्ष। तुम कृतकृत्य हो, सुखसे विचरो॥ १८॥
मा सङ्कल्पविकल्पाभ्यां चित्तं क्षोभय चिन्मय।
उपशाम्य सुखं तिष्ठ स्वात्मन्यानन्दविग्रहे॥ १९॥
हे चित्स्वरूप! संकल्प और विकल्पके द्वारा अपना चित्त क्षुब्ध मत करो। उपशम—शान्त हो जाओ और अपने आनन्दस्वरूप आत्मामें सुखसे रहो॥ १९॥
त्यजैव ध्यानं सर्वत्र मा किञ्चिद्धृदि धारय।
आत्मा त्वं मुक्त एवासि किं विमृश्य करिष्यसि॥ २०॥
तुम कहीं भी किसीका भी ध्यान मत करो। कहीं कुछ भी हृदयमें धारण मत करो। तुम नित्य मुक्त आत्मा हो। विचार करके भी क्या करोगे॥ २०॥
॥ इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायां तत्त्वोपदेशविंशतिकं नाम पञ्चदशं प्रकरणं समाप्तम्॥ १५॥
५०४ * गीता-संग्रह *
सोलहवाँ प्रकरण
स्वरूपस्थितिमें सुख-शान्ति
आचक्ष्व शृणु वा तात नानाशास्त्राण्यनेकnames/शः।
तथापि न तव स्वास्थ्यं सर्वविस्मरणादृते ॥ १॥
वत्स! चाहे तुम बार-बार अनेक शास्त्रोंका अध्ययन करो या श्रवण करो। फिर भी जबतक तुम सबको भूल नहीं जाओगे, तबतक तुम्हारी स्वरूप-स्थिति नहीं हो सकती ॥ १॥
भोगं कर्म समाधिं वा कुरु विज्ञ तथापि ते।
चित्तं निरस्तसर्वाशमत्यर्थं रोचयिष्यति ॥ २॥
विवेकी! तुम भोग करो, कर्म करो या समाधि लगाओ। तुम्हें परम सुख-शान्तिका अनुभव तो तभी होगा, जब तुम्हारे चित्तसे सभी आशाएँ सर्वथा मिट जायँगी ॥ २॥
आयासात्सकलो दुःखी नैनं जानाति कश्चन।
अनेनैवोपदेशेन धन्यः प्राप्नोति निर्वृतिम् ॥ ३॥
कर्म-प्रयत्नसे ही सब दुःखी हैं, परंतु इस बातको कोई समझता ही नहीं है। शुद्धान्तःकरण पुरुष केवल इसी उपदेशसे परम सुख-शान्तिकी प्राप्ति करते हैं ॥ ३॥
व्यापारे खिद्यते यस्तु निमेषोन्मेषयोरपि।
तस्यालस्यधुरीणस्य सुखं नान्यस्य कस्यचित् ॥ ४॥
जो महापुरुष आँख खोलने और मूँदनेमें भी खेदका अनुभव करता है, उसी आलसी-शिरोमणिको सुख है और किसीको नहीं ॥ ४॥
इदं कृतमिदं नेति द्वन्द्वैर्मुक्तं यदा मनः।
धर्मार्थकाममोक्षेषु निरपेक्षं तदा भवेत् ॥ ५॥
'जब यह किया और यह नहीं किया'—इन द्वन्द्वोंसे मन मुक्त हो जाता है, तब वह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थोंसे निरपेक्ष हो जाता है ॥ ५॥
* अष्टावक्रगीता * ५०५
विरक्तो विषयद्वेष्टा रागी विषयलोलुपः।
ग्रहमोक्षविहीनस्तु न विरक्तो न रागवान्॥ ६॥
विरक्त पुरुष विषयमें द्वेष करता है और रागी पुरुष विषयोंके लिये मचलता रहता है, परंतु जो ग्रहण और त्यागके भावसे रहित है, वह तो न विरक्त है और न रागी है॥ ६॥
हेयोपादेयता तावत्संसारविटपाङ्कुरः।
स्पृहा जीवति यावद्वै निर्विचारदशास्पदम्॥ ७॥
त्याज्य और ग्राह्यका भेद संसाररूप वृक्षका अंकुर है, जबतक अविवेकजन्य स्पृहा जीवित रहती है, तभीतक इसका अस्तित्व रहता है॥ ७॥
प्रवृत्तौ जायते रागो निवृत्तौ द्वेष एव हि।
निर्द्वन्द्वो बालवद्धीमानेवमेव व्यवस्थितः॥ ८॥
प्रवृत्तिमें राग हो जाता है और निवृत्तिमें द्वेष हो जाता है, परंतु विवेकी पुरुष तो बालकके समान निर्द्वन्द्व होकर यों ही (प्रवृत्ति-निवृत्तिमें समान) रहता है॥ ८॥
हातुमिच्छति संसारं रागी दुःखजिहासया।
वीतरागो हि निर्दुःखस्तस्मिन्नपि न खिद्यति॥ ९॥
रागी पुरुष दुःखसे छूटनेकी इच्छासे संसारका त्याग करना चाहता है, परंतु वीतराग पुरुष दुःखरहित होनेके कारण संसारमें भी खेदका अनुभव नहीं करता॥ ९॥
यस्याभिमानो मोक्षेऽपि देहेऽपि ममता तथा।
न च योगी न वा ज्ञानी केवलं दुःखभागसौ॥ १०॥
जिसको अपनी मुक्तिका भी अभिमान है और शरीरमें भी ममता है—वह न तो योगी है न ज्ञानी, केवल दुःखका ही वह हकदार है॥ १०॥
५०६ * गीता-संग्रह *
हरो यद्युपदेष्टा ते हरिः कमलजोऽपि वा।
तथापि न तव स्वास्थ्यं सर्वविस्मरणादृते ॥ ११ ॥
चाहे तुम्हें शिवजी, भगवान् विष्णु अथवा ब्रह्मा ही उपदेश क्यों न करें; फिर भी सबका विस्मरण हुए बिना तुम्हारी स्वरूप-स्थिति नहीं हो सकती ॥ ११ ॥
॥ इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायां विशेषोपदेशं नाम षोडशं प्रकरणं समाप्तम् ॥ १६ ॥
सत्रहवाँ प्रकरण
जीवन्मुक्त महापुरुषके लक्षण
तेन ज्ञानफलं प्राप्तं योगाभ्यासफलं तथा।
तृप्तः स्वच्छेन्द्रियो नित्यमेकाकी रमते तु यः॥ १ ॥
जो अपने आपमें तृप्त है, जिसकी इन्द्रियाँ पवित्र हैं और जो हमेशा अपने एकाकीपनेमें ही रमता है, उसने ज्ञानका तथा योगाभ्यासका फल प्राप्त कर लिया ॥ १ ॥
न कदाचिज्जगत्यस्मिंस्तत्त्वज्ञो हन्त खिद्यति।
यत एकेन तेनेदं पूर्णं ब्रह्माण्डमण्डलम् ॥ २ ॥
बड़े आश्चर्यकी बात है कि तत्त्वज्ञ पुरुष इस जगत्में कभी खेदका अनुभव नहीं करता; क्योंकि उस एकके ही द्वारा यह समस्त ब्रह्माण्ड-मण्डल परिपूर्ण हो रहा है ॥ २ ॥
न जातु विषयाः केऽपि स्वरामं हर्षयन्त्यमी।
सल्लकीपल्लवप्रीतमिवेभं निम्बपल्लवाः॥ ३ ॥
आत्माराम पुरुषको दृश्य जगत्के कोई भी विषय कभी हर्षित करनेमें समर्थ नहीं हैं, ठीक वैसे ही जैसे मीठी-मीठी सल्लकी लताके पत्तोंसे तृप्त हाथीको नीमके कड़वे पत्ते ॥ ३ ॥